27 सितम्बर 2011

ग़ज़ल की पहली किताब

स्वप्निल तिवारी

अभी दो तीन रोज पहले अखबार में पढ़ने को मिला की जगजीत सिंह को ब्रेन हैमरेज हो गया है और वो अस्पताल में हैं यह खबर पढ़ते ही लगा की अपने भीतर कहीं कुछ उदास होना शुरू हो गया है और इस उदासी की वजह थी अतीत में जगजीत सिंह से रहा बेहद लगाव

आज मैं मेहदी हसन और नुसरत फ़तेह अली खान को अधिक सुनता हूँ लेकिन इनको सुनना जगजीत सिंह को सुने बिना संभव नहीं था और मेरे लिए तो बिलकुल ही नहीं था। वजह ये की उर्दू की कोई खास समझ नहीं थी और छोटी उम्र में शास्त्रीय गायन से लगाव की तो बात ही छोडिये नींद अलबत्ता आने लगती थी।

मुझे याद मैंने खुद से गाने प्ले करना और उन्हें सुनना बारहवीं में शुरू किया था और उन दिनों ‘राज़’ ‘हाँ मैंने भी प्यार किया है’ के गाने बहुत अधिक पसंद थे (अब लगता है की मेरी भी हद्द थी क्या क्या पसंद था मुझे) बारहवीं पास करते करते लगा कि भाई बढ़िया म्यूजिक या तो पुराना वाला है या तो ए आर रहमान का है। 

बारहवीं के बाद मैं बनारस गया मेडिकल की तैयारी करने (और सही बताऊँ तो जगजीत सिंह को सुनने के चक्कर में ही मैं डॉक्टर नहीं बना और अब लगता है कि अच्छा हुआ नहीं बना।) एक बार छुट्टियों में घर से बनारस लौटते हुए घर पे पड़ा हुआ एक कैसेट उठा लाया जिसका नाम था “फीलिंग्स ऑफ लव”। इसमें सारी ग़ज़लें जगजीत सिंह की गयी गाई फ़िल्मी ग़ज़लें थीं जिसे किसी और गायक ने गाया था। उस नकली आवाज़ में भी जगजीत सिंह की वो ग़ज़लें सुन कर मैं दीवाना हो गया। हालाँकि कभी कभी रंगोली में कुछ ग़ज़लें देखी सुनी हुई थी पर उस समय उनका प्रभाव एक दम अलग था। मेरे अंदर के लगभग सभी हार्मोन्स पर उस कैसेट के गीतों का नियंत्रण हो गया था। जल्दी ही मुझे पता चल गया कि यह आवाज़ नकली है और ये गीत जगजीत सिंह की आवाज़ में और अच्छे हैं। खैर अब जगजीत सिंह की आवाज़ की दीवानगी में मैं उनके नगमें ढूँढने निकला और खुद से पहली कैसेट खरीदी जो थी ‘सहर’।

सहर को सुनना शुरू किया और ‘तेरे आने की जब खबर महके” नें मुझे अपना दीवाना कर लिया बाकि ग़ज़लें उस वक्त मेरे लिए बहुत कठिन थीं। सहज सरल शब्द होने के बावजूद उनके मानी तक पहुँच पाना मेरे बस के बाहर की चीज़ थी। एक दोस्त बलजीत की मदद से कुछ शेर समझ मैंने, फिर अपनी माँ की मदद से कुछ और शेर समझे। जैसे जैसे मैं इस एल्बम के गीतों समझता गया वैसे वैसे जगजीत सिंह के लिए मेरा लगाव बढ़ता गया। धीरे धीरे ‘चिट्ठी न कोई सन्देश’ और ‘होश वालों को खबर क्या’ जैसे गीतों गज़लों के जरिये वो मेरे पसंदीदा सिंगर बन गए।

उस समय लगता था कि जगजीत सिंह का अकेला फैन मैं ही हूँ और इनकी गायकी की खासियत को मेरे अलावा किसी नें महसूस ही नहीं किया है कुल मिलाकर सिर्फ जगजीत सिंह को सुनने की वजह से मैं अपने आप को ‘खास’ मानता था। खैर जल्दी ही ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया क्यूंकि उसी समय मेडिकल की ही तैयारी करने वाले एक लड़के “नागेन्द्र दूबे” (बन्दा अब डॉक्टर बन गया है) से मुलाकात हुई उसी के घर जाने पर एक दिन देखा कि जगजीत सिंह के कैसेटों से उसका कलेक्शन भरा पड़ा है। मुझे पहली बार इन्फीरियर फील हुआ खैर लजाते लजाते मैंने ‘मरासिम’ उठाई और उससे पूछ लिया कि यह कैसेट कैसी है। और उसने कहा “साले..जगजीत सिंह कभी बुरा गाते हैं”। खैर ..मैंने मरासिम उससे उधार मांगी और सुनने लगा। 

कुछ आसान शेरों ‘एक पुराना मौसम लौटा” “शाम से आँख में नमी सी है” नें तो एक दम धाक जमा ली मेरे ऊपर। सारे दिन मैं यही गुनगुनाता रहता था। गुलज़ार साब को उनके लिखे गीतों के ज़रिये तो मैं पहले से ही जानता था (विविध भारती का शुक्रिया जिस पर गीत सुनाते हुए गीतकारों के नामों का भी उल्लेख होता था आज एफ एम् के जमाने में ये शराफत गायब हो चुकी है) लेकिन इस एल्बम के ज़रिये मैं उन्हें बहुत अधिक पसंद करने लगा यहीं से शुरआत हुई जगजीत और गुलज़ार के कॉम्बिनेशन को ढूँढने की। 

मेरे साथ साथ मेरे रूम मेट मनीष को भी भयंकर लत लग गयी। एक कैसेट सुनते और दूसरा खरीदते यही सिलसिला चल निकला। आर्चीस में घूमते हुए एक दिन मिर्ज़ा ग़ालिब एल्बम दिखाई दिया। दिमाग में घुसेगा या नहीं ये सोचे बिना ही बस जगजीत-गुलज़ार का नाम देखकर ही उसे खरीद लिया गया। रूम पे ला कर जब उसे सुनने लगे तो वो एल्बम भी ‘बल्लीमारान के पेचीदा दलीलों की सी गालियाँ’ जैसा साबित हुआ। और सबसे अधिक दिक्कत हुई “कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक’। अरे भाई लाख सर पटक लो ज़ुल्फ़ कभी सर में तब्दील नहीं होगी। खैर पूरे एल्बम में एक आधे शेर समझ आये पर उसका म्यूजिक इतना रूहानी था कि बस सुनते जाने को जी करता था।

धीरे-धीरे महसूस हुआ कि जो सुन रहा हूँ वो समझ भी तो आना चाहिए। तो बस उसी के एल्बम को समझने के लिए “दीवान ए ग़ालिब” खरीद लाया। सबसे पहले ग़ालिब की उन गज़लों को समझने की कोशिश की जो जगजीत सिंह ने गयी थी और बाद में दूसरी गज़लों को।

उस किताब को पढ़ने के बाद जगजीत सिंह की गायी दूसरी गज़लों को समझने में मुझे शायद ही कभी कोई दिक्कत हुई। और जब ग़ालिब को पढ़ने लगा तो टूटे फूटे शेर कहने का भी दिल हुआ। तब से लेकर आज तक मैं भी थोड़े बहुत शेर कह रहा हूँ। इस तरह से देखा जाए तो मेरी ग़ज़ल की पहली किताब जगजीत सिंह ही हैं। और मैं दिल से यही दुआ करता हूँ इस किताब में और भी पन्ने जुड़ते रहें। भगवान उन्हें लंबी उम्र दें।

24 सितम्बर 2011

आगंतुक

रंगनाथ सिंह

इस फिल्म (आगंतुक) की सबसे खास बात यह है कि यह सत्यजीत रे की आखिरी फिल्म है। उनकी विश्व-विख्यात यथार्थवादी फिल्मों के इतर यह फिल्म एक अति-बौद्धिक बहसतलब विषय पर केन्द्रित है। फिल्म का ज्यादातर हिस्सा एक घर के कुछ कमरों में घटित होता है। मुख्य-गौण दोनों मिलाकर कुछ गिने-चुने पात्र हैं। कहानी में कोई खास उतार-चढ़ाव या नाटकीयता नहीं है। फिर भी यह फिल्म खास है क्योंकि इस फिल्म के माध्यम से रे की एक खास सोच जाहिर होती है। यह महान फिल्मकार अपने आखिरी समय में सख्त बिमार होने के बावजूद इस  फिल्म को बनाता रहा आखिरकार क्यों ?  ऐसा क्या था जो रे इस फिल्म के माध्यम से दुनिया से कहना चाहते थे ? इन प्रश्नों का मुकम्मल जवाब आपको यह फिल्म देखकर ही मिलेगा। 

फिल्म की शुरुआत एक चिट्ठी से होती है। अनीला को एक चिट्ठी मिलती है। चिट्ठी लिखने वाला का दावा है कि वह अनिला का छोटा मामा मनमोहन मित्रा है और वह एक हफ्ते अनीला के परिवार के  साथ रहना चाहता है. मनमोहन उस वक्त घर छोड़कर चला गया था जब अनिला की उम्र मात्र 2 साल थी। जाहिर है, अनीला को अपने छोटे मामा की कोई याद नहीं। उसने बस सुना है कि वो जीवन में कभी द्वितीय नहीं आए। वह स्नातक करके घर छोड़कर चले गए थे। घर से जाने के बाद वो उनके एक पारिवारिक मित्र से सम्पर्क में थे। जिसके माध्यम से अनीला और उसके परिवार को पता चला था कि मनमोहन मित्रा किसी पश्चिमी देश में रहते हैं।

अनीला और उसके पति सुधीन्द्र भद्र-लोक के वासी हैं। वर्गीय चरित्र के अनुरूप सुधीन्द्र के मन में एक अनचाहे-अजनबी मेहमान के लिए गहरी शंका है। वहीं अनीला के तर्क-बुद्धि पर बिछड़े हुए मामा से मिलने की खुशी हावी है। 

नियत दिन पर चिट्ठी लिखने वाले तथाकथित बिछड़े मामा (उत्पल दत्त) अनीला और सुधीन्द्र के घर आ जाते हैं। इसके बाद एक रहस्य-रोमांच का खेल शुरू होता है। अनीला अपने मामा के सेवा में लिप्त हो जाती है और सुधीन्द्र मामा की असलियत की खुफिया जांच में। अनीला को कथित मामा का ज्ञान,भला स्वभाव प्रभावित करता है। जबकि मामा के हाजिरजवाबी और प्रत्युत्पन्नमति से सुधीन्द्र की आशंका को और बल मिलता है।

फिल्म का बड़ा हिस्सा इसी असली मामा - नकली मामा के बीच डोलता है। इसी बहाने फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि प्रमाणपत्र आदमी के बारे में क्या प्रमाणित करते हैं ?

अपने अंत तक पहुंचते-पहुंचते यह फिल्म सभ्यता विमर्श बन जाती है। शुरू से मनोविनोद और कौतुक जगाने वाली यह फिल्म अपनी परिणति से पूर्व अत्यधिक गंभीर हो जाती है। सुधीन्द्र के वकील मित्र उसके घर आते हैं कि वह जिरह करके सच उगलवाने में माहिर होने के नाते मामा का सच बात ही बात में निकलवा लेंगे। वकील साहब और मामा की यह बहस घूम-फिर कर आधुनिक सभ्यता बनाम आदिवासी सभ्यता के आपसी द्वंद्व पर जा टिकती है। वकील साहब आधुनिक सभ्यता को श्रेष्ठ मानते हैं और मामा आदिम सभ्यता को। यह बहस कटु होती जाती है जिसकी परिणति मामा के घर छोड़ने और फिल्म के अंत की तरफ बढ़ने के रूप में होती है।  

मामा की असलियत क्या है ? सभ्यता-विमर्श पर इस फिल्म के माध्यम से रे क्या कहना चाहते हैं ? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए यह फिल्म देखें। इन सवालों का जवाब दे कर मैं इस फिल्म को देखने के प्रथम अनुभव को फीका नहीं करना चाहता। वैसे,सिनेमा के कद्रदानों को  यह फिल्म देखने के लिए एक यही वजह काफी है कि यह सत्यजित रे की आखिरी फिल्म है !

*इस लेख के प्रकाशन के लिए  अनुवादक की सहमति आवश्यक है.

20 सितम्बर 2011

सआदत हसन की नजर में मंटो


मंटो के विषय में अब तक बहुत लिखा और कहा जा चुका है। उसके पक्ष में कम और विपक्ष में ज्यादा। ये विवरण अगर दृष्टिगत रखे जाएं तो कोई बुद्धिमान व्यक्ति मंटो के विषय में केाई सही राय कायम नहीं कर सकता। मैं यह लेख लिखने बैठा हूं और समझता हूं कि मंटो के विषय में अपने विचार व्यक्त करना बड़ा कठिन काम है। लेकिन एक दृष्टि से आसान भी है। इसलिए कि मुझे मंटो के निकट रहने का सौभाग्य मिला है और सच पूछिए तो मैं मंटो का हमजाद हूं।

अब तक इस व्यक्ति के विषय में जो लिखा गया है मुझे उस पर कोई आपत्ति नहीं है,लेकिन मैं इतना समझता हूं  कि जो कुछ इन लेखों में बताया गया है, वह वास्तविकता से परे है। कुछ इसे शैतान कहते हैं,कुछ गंजा फरिश्ता। जरा ठहरिए, मैं देख लूं,कहीं वह कमबख्त सुन तो नहीं रहा। नहीं-नहीं, ठीक है। मुझे याद आ गया कि यह वक्त है जब वह पिया करता है। उसको शाम छः बजे कड़वा शरबत पीने के आदत है।

हम इकट्ठे पैदा हुए और ख्याल है कि इकट्ठे ही मरेंगे; लेकिन यह भी हो सकता है कि सआदत हसन मर जाए और मंटो न मरे और सदा मुझे यह डर बहुत दुख देता है। इसिलिए मैंने उसके साथ अपनी निभाने में कोई कसर उठा नहीं रखी। अगर वह जीवित रहा और मैं मर गया तो ऐसा होगा कि अण्डे का खोल तो बचा हुआ है और उसके अन्दर की जर्दी और सफेदी लुप्त हो गई।

अब मैं अधिक भूमिका में नहीं जाना चाहता। आपसे साफ कह देता हूं कि मंटो ऐसा वन-टू आदमी है, मैंने अपनी जिन्दगी में कभी नहीं देखा। जिसे यदि जमा किया जाए तो वह तीन बन जाए। त्रिकोण के विषय में उसका ज्ञान काफी है,लेकिन मैं जानता हूं कि अभी इसकी जरूरत नहीं हुई। ये संकेत ऐसे हैं कि जिन्हें केवल सुविज्ञ ही समझ सकते हैं।

यूँ तो मंटो को उसके जन्म से ही जानता हूं। हम दोनों इकट्ठे एक ही समय 11 मई 1912 को जन्म लिया किन्तु उसने सदा यह कोशिश की कि खुद को कुछ भी बनाए रखे,जो एक बार अपना सिर और गर्दन भीतर छुपा ले तो आप लाख ढूंढते रहें,इसका पता नहीं मिले। लेकिन मैं भी आखिर उसका हूं। मैंने उसकी प्रत्येक गतिविधि का मुआयना कर ही लिया है।

लीजिए,अब मैं आपको बताता हूं कि यह वैशाखनन्दन कहानीकार कैसे बना ? लेखक,रचनाकार,बड़े लम्बे-चैड़े लेख लिखते हैं। अपने व्यक्तित्व का प्रमाण देते हैं। शोपेनहावर,फ्रायड,हीगल,नीत्से,मार्क्स का उल्लेख करते हैं, मगर वास्तिविकता से कोसों दूर रहते हैं। मंटो का कथानक दो विरोधी तत्वों के संघर्ष का परिणाम है। उसके पिता,खुदा उन्हें माफ करे, बड़े कठोर थे और उसकी मां अत्यंत दयावान। इन दानों पाटों के बीच पिसकर यह गेहूं का दाना किस रूप् में बाहर निकला होगा, इसका अनुमान आप लगा सकते हैं। 

अब मैं इसके स्कूल के जीवन की तरफ आता हूं। वह बहुत बद्धिमान बालक था और अत्यंत नटखट। उस समय उसका कद अधिक से अधिक 3 फुट 6 इंच होगा। वह अपने पिता की आखिरी संतान था। उसे अपने मां-बाप की मोहब्बत तो प्राप्त थी,लेकिन उसके तीन बड़े भाई,जो उम्र में उससे बहुत बड़े थे और विलायत में शिक्षा पा रहे थे,उनसे उसको भेंट करने का अवसर नहीं मिला था,इसलिए  कि वे सौतेले थे। वे चाहता था कि वे उससे मिलें, उससे बड़े भाइयों जैसा व्यवहार करें,लेकिन उसे यह व्यवहार उस समय मिला जब साहित्य-संसार उसे बहुत बड़ा कहानीकार स्वीकार कर चुका था।

अच्छा,अब उसकी कहानीकारी के विषय में सुनिए,वह अव्वल दर्जे का फ्राड हैं पहली कहानी उसने 'तमाशा' शीर्षक के अन्तगर्त लिखी जो जलियांवाला बाग की खूनी दुर्घटना के विषय में थी। यह उसने अपने नाम से नहीं छपवाई। यही कारण है कि वह पुलिस के चंगुल से बच गया।

इसके बाद उसके उर्वर मस्तिष्क में एक लहर पैदा हुई कि वह और अधिक शिक्षा प्राप्त करे। यहां यह कहना रुचिकर होगा कि उसने इण्टर परीक्षा दो बार फेल होकर पास की थी, वह थी थर्ड डीविजन में। और आपको यह सुनकर भी अचम्भा होगा कि वह उर्दू के पर्चे में नाकाम रहा।

अब लोग कहते हैं कि वह उर्दू का बहुत बड़ा अदीब हैं और मैं यह सुनकर हंसता हूं,इसलिए कि उर्दू अब भी नहीं आती। वह अल्फाज के पीछे ऐसे भागता है जैसे कोई जाली शिकारी तितलियों के पीछे। वे उसके हाथ नहीं आतीं। यही कारण है कि उसके लिखने में खूबसूरत अल्फाज की कमी है। वह लट्ठमार है लेकिन जितने लट्ठ उसकी गर्दन पर पड़े हैं उसने बड़ी खुशी से सहन किए हैं।

उसकी लट्ठबाजी लोकोक्ति के अनुसार जाटों की लट्ठबाजी नहीं है। वह बाजीगर और फकैत है। वह एक ऐसा आदमी है जो साफ और सीधी सड़क पर नहीं चलता बल्कि वह तने हुए रास्ते पर चलता है। लोग समझते हैं,अब गिरा,अब गिरा, लेकिन वह कमबख्ता आज तक नहीं गिरा- शायद गिर जाए औधें मुंह- कि फिर न उठे। लेकिन मैं जानता हूं कि मरते वक्त लोगों से कहेगा कि मैं इसलिए गिरा था कि पतन की निराश समाप्त हो जाए।

मैं इसके पूर्व कह चुका हूं कि मंटो अव्वल दर्जे का फ्राड है। इसका अन्य प्रमाण यह है कि वह अक्सर कहा करता है कि वह अफसाना नहीं सोचता,स्वयं अफसाना उसे सोचता है- यह भी फ्राड है। चुनांचे, मैं जानता हूं कि जब उसे कहानी लिखनी होती है तो उसकी वही हालात होती है जब किसी मुर्गी को अण्डा देना होता है। वह अण्डा छुपकर नहीं देता,सबके सामने देता है। उसके यार-दोस्त बैठे होते हैं,उसकी तीन बच्चियां शोर मचा रही होती हैं और वह अपनी खास कुर्सी पर उकड़ूं बैठा अण्डे देता जाता है,जो बाद में चूं-चूं करते अफसाने बन जाते हैं। उसकी पत्नि उससे बहुत नाराज है। वह उससे प्रायः कहा करती है कि तुम कहानी लिखना छोड़ दो और कोई दुकान खोल लो, लेकिन मंटो के दिमाग में जो दुकान खुली है, उसमें मनियारी के सामान से भी अधिक सामान मौजूद है। इसलिए वह प्रायः सोचा करता है कि वह कभी कोई स्टोरेज यानि शीतघर न बन जाए जहां उसके तमाम विचार और भावनाएं जम जाएं।

मैं यह लेख लिख रहा हूं और मुझे डर है कि मंटो मुझसे नाराज हो  जाएगा। उसकी हर चीज सहन की जा सकती है लेकिन नाराजगी नहीं सही जा सकती। नाराजगी होने पर वह शैतान बन जाता है, लेकिन कुछ मिनटों के लिए और ये कुछ मिनट अल्लाह की पनाह........

कहानी लिखने के विषय में वह नखरे जरूर दिखाता है लेकिन मैं जानता हूं,क्योंकि उसका हमजाद हूं, वह फ्राड कर रहा है। उसने एक बार स्वयं लिखा था कि उसकी जेब में अनगिनत कहानियां पड़ी होती हैं। वास्तविकता इसके ठीक उल्टी है।

जब उसे कहानी लिखनी होगी तो वह रात को सोचेगा। उसकी समझ में कुछ नहीं आएगा। सुबह पांच बजे उठेगा और अखबारों से किसी कहानी का रस चूसने का ख्याल करेगा, लेकिन उसे नाकामी होगी। फिर वह गुसलखाने में जाएगा।वहां वह अपने शोर-भरे सिर को ठण्डा करने की कोशिश करेगा कि वह सोचने के योग्य हो सके, लेकिन नाकाम रहेगा। फिर झुंझलाकर अपनी पत्नी से बेकार का झगड़ा करना शुरू कर देगा। वहां से भी नाकामी होगी तो पान लेने चला जाएगा। पान उसकी मेज पर पड़ा रहेगा, लेकिन कहानी का कथानक उसकी समझ में फिर भी नहीं आएगा। अन्त में वह उसके मस्तिष्क में आएगा उसकी कहानी का श्री गणेश कर देगा। 'बाबू गोपिनाथ', 'टोबा टेक सिंह', 'हतक', 'मम्मी', 'मोजेल' - ये कहानियां उसने इसी फ्राड तरीके से लिखी हैं।

यह अजीब बात है कि लोग उसे बड़ा विधर्मी,अश्लील व्यक्ति समझते हैं और मेरा भी ख्याल है कि वह किसी हद तक इस कोटि में आता है। प्रायः वह बड़े गन्दे विषय पर कलम उठाता है और ऐसे शब्द अपनी रचना में प्रयोग करता है जिन पर आपत्ति की गुंजाइश भी हो सकती है। लेकिन मैं जानता हूं कि जब भी उसने कोई लेख लिखा,पहले पन्ने के शीर्ष पर 786 अवश्य मिला जिसका मतलब है बिस्मिल्ला और यह व्यक्ति जो खुदा को न मानने वाला नजर आता है,कागज पर मोमिन बन जाता है। परन्तु वह कागजी मंटो है जिसे आप कागजी बादाम की तरह केवल अंगुलियों से तोड़ सकते हैं अन्यथा वह लोहे के हथौड़े से भी टूटने वाला आदमी नहीं है।

अब मैं मंटो के व्यक्तित्व की तरफ आता हूं- वह चोर है,झूठा है,विश्वाशघातक और भीड़ इकट्ठी करने वाला है। उसने प्रायः अपनी पत्नी की गफलत से लाभ उठाते हुए कई-कई सौ रुपए उठाए हैं। इधकर आठ सौ लाकर दिए और चोर आंखों से देखता रहा कि उसने कहां रखे हैं और दूसरे दिन उनमें से एक हरा नोट गायब ! उस बेचारी को जब अपने उस नुकसान का पता लगा तो उसने नौकरों को डांटना-डपटना शुरू कर  दिया।

यूं तो मंटो के विषय में मशहूर है कि वह साफ-साफ कहने वाला है, लेकिन मैं इससे सहमत होने के लिए तैयार नहीं। वह अव्वल दर्जे का झूठा है। शुरू-शुरू में उसका झूठ उसके घर चल जाता था इसलिए कि उसमें मंटो का एक विशेष टच होता था,लेकिन बाद में उसकी पत्नी को पता चल गया कि अब तक उसे विशेष बात के विषय में जो कुछ कहा जाता था,झूठ था। मंटो झूठ खूब खुलकर बोलता है, लेकिन मुसीबत है कि उसके घरवाले अब यह समझने लगे हैं कि उसकी हर बात झूठी है। उस तिल की तरह जो किसी औरत ने अपने गाल पर सुरमे से बना रखा है।

वह अनपढ़ है- इस दृष्टि से कि उसने कभी मार्क्स का अध्ययन नहीं किया। फ्रायड  की कोई पुस्तक आज तक उसकी दृष्टि से नहीं गुजरी। हीगल का वह केवल नाम ही जानता है। हैबल व एैमिस को वह नाम मात्र से जानता है। लेकिन मजे की बात यह है कि लोग,मेरा मतलब है कि आलोचक यह कहते हैं कि वह तमाम चिन्तकों से प्रभावित है। जहां तक मैं जानता हूं मंटो किसी दूसरे के विचारों से प्रभावित होता ही नहीं। वह समझता है कि समझाने वाले सब चुगद है। दुनिया को समझाना नहीं चाहिए,उसको स्वयं समझना चाहिए।

स्वयं को समझा-समझाकर वह एक ऐसी समझ बन गया है जो बुद्धि और समझ के परे है। कदाचित वह ऐसी उटपटांग बातें करता है कि मुझे हंसी आती है।

मैं आपसे पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मंटो,जिस पर अश्लील लेख के विषय में कई मुकदमे चल चुके हैं,बहुत शीलपसंद है। लेकिन मैं यह भी कहे बिना नहीं रह सकता कि वह एक ऐसा पायदान है, जो स्वयं को झाड़ता-फटकारता है।

सआदत हसन 'मंटो'

18 सितम्बर 2011

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर


कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा.

हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए,
हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा.

इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें,
हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा.

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर,
जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा.

तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ हम और तुझ से बद-गुमाँ,
हम ने तो पूछा था ज़रा ये वक्त क्यूँ ठहरा तेरा.

हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र,
रस्ता कभी रोका तेरा दामन कभी थामा तेरा.

दो अश्क जाने किस लिए, पलकों पे आ कर टिक गए,
अल्ताफ़ की बारिश तेरी अक्राम का दरिया तेरा.

हाँ हाँ, तेरी सूरत हँसी, लेकिन तू ऐसा भी नहीं,
इस शख़्स के अश‍आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा.

बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है,
तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा.

बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल,
आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, 'इन्शा' तेरा.



इब्ने इंशा की इस गज़ल को जगजीत सिंह की आवाज में डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक्क करें.

17 सितम्बर 2011

इस शहर में जी का लगाना क्या




इंशा जी उठो अब कूच करो,
इस शहर में जी का लगाना क्या
वहशी को सुकूं से क्या मतलब,
जोगी का नगर में ठिकाना क्या

इस दिल के दरीदा दामन में
देखो तो सही, सोचो तो सही
जिस झोली में सौ छेद हुए
उस झोली को फैलाना क्या

शब बीती चाँद भी डूब चला
ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े पे
क्यों देर गये घर आये हो
सजनी से करोगे बहाना क्या

जब शहर के लोग न रस्ता दें
क्यों बन में न जा बिसराम करें
दीवानों की सी न बात करे
तो और करे दीवाना क्या



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16 सितम्बर 2011

यह बच्चा किसका बच्चा है

यह नज़्म एक सूखाग्रस्त, भूखे, मरियल बच्चे ने कवि से लिखवाई है

1.
यह बच्चा कैसा बच्चा है
यह बच्चा काला-काला-सा
यह काला-सा, मटियाला-सा
यह बच्चा भूखा-भूखा-सा
यह बच्चा सूखा-सूखा-सा
यह बच्चा किसका बच्चा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है
जो रेत पर तन्हा बैठा है
ना इसके पेट में रोटी है
ना इसके तन पर कपड़ा है
ना इसके सर पर टोपी है
ना इसके पैर में जूता है
ना इसके पास खिलौना में
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है कोई झूला है
ना इसकी जेब में धेला है
ना इसके हाथ में पैसा है
ना इसके अम्मी-अब्बू हैं
ना इसकी आपा-खाला है
यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है

2.
यह सहरा कैसा सहरा है
ना इस सहरा में बादल है
ना इस सहरा में बरखा है
ना इस सहरा में बाली है
ना इस सहरा में खोशा है
ना इस सहरा में सब्ज़ा है
ना इस सहरा में साया है

यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का सहरा है

3.
यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है
यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किसकी दुनिया है

4.
इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है
कहीं बादल घिर-घिर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं
कहीं महफ़िल है, कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे
यह रेशम है, यह दीबा है
कहीं गल्ले के अम्बार लगे
सब गेहूँ धान मुहय्या है
कहीं दौलत के सन्दूक़ भरे
हाँ ताम्बा, सोना, रूपा है
तुम जो माँगो सो हाज़िर है
तुम जो चाहो सो मिलता है
इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सपना है ?
वो किस धरती के टुकड़े हैं ?
यह किस दुनिया का हिस्सा है ?

5.
हम जिस आदम के बेटे हैं
यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
वह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बन्दे हैं
सब बन्दों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फ़र्क़ नहीं
इस धरती पर हक़ सबका है

6.
 यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जो यहाँ बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
{क्या मुश्किल है, हो सकता है)
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
(हाँ दूध यहाँ बहुतेरा है)
इस बच्चे का कोई तन ढाँके
(क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है ?)
इस बच्चे को कोई गोद में ले
(इन्सान जो अब तक ज़िन्दा है)
फिर देखिए कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है

7.
इस जग में सब कुछ रब का है
जो रब का है, वह सबका है
सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं
हर चीज़ में सबका साझा है
जो बढ़ता है, जो उगता है
वह दाना है, या मेवा है
जो कपड़ा है, जो कम्बल है
जो चाँदी है, जो सोना है
वह सारा है इस बच्चे का
जो तेरा है, जो मेरा है

यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा सबका बच्चा है
 



इब्ने इंशा

12 सितम्बर 2011

प्रेमचंद की पहली रचना


उस वक्त मेरी उम्र कोई १३ साल की रही होगी। हिन्दी बिल्कुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था। मौलाना शरर, पं० रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनाल्ड के उपन्यासों की धूम थी। उर्दू में उनके अनुवाद धड़ाधड़ निकल रहे थे और हाथों-हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व० हजरत रियाज़ ने जो उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे और जिनका हाल में देहान्त हुआ है, रेनाल्ड की एक रचना का अनुवाद ‘हरम सरा’ के नाम से किया था। उस जमाने में लखनऊ के साप्ताहिक ‘अवध-पंच’ के सम्पादक स्व० मौलाना सज्जाद हुसेन ने, जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनाल्ड के दूसरे उपन्यास का अनुवाद ‘धोखा’ या ‘तिलस्मी फ़ानूस’ के नाम से किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ीं और पं० रतननाथ सरशार से तो मुझे तृप्ति न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं।

 उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आठवें में पढ़ता था, जो तीसरा दरजा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दूकान पर जा बैठता था और उसके स्टाक से उपन्यास ले-लेकर पढ़ता था; मगर दूकान पर सारे दिन तो बैठ न सकता था, इसलिए मैं उसकी दूकान से अँग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लडक़ों के हाथ बेचा करता था और इसके मुआवजे में दूकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। दो-तीन वर्षों में मैंने सैकड़ों ही उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टाक समाप्त हो गया, तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से निकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े, और ‘तिलस्मी होशरुबा’ के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद् तिलस्मी ग्रन्थ के १७ भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपररायल के आकार के दो-दो हज़ार पृष्ठों से कम न होगा। और इन १७ भागों के उपरान्त उसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें से भी मैंने पढ़े। जिसने इतने बड़े ग्रन्थ की रचना की, उसकी कल्पना-शक्ति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं, ये कथाएँ मौलाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमें कितना सत्य है, कह नहीं सकता; लेकिन इतनी वृहद् कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी तो अपने ६० वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे, तो नहीं कर सकता। रचना तो दूसरी बात है।

उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी-कभी हमारे यहाँ आया करते थे। अधेड़ हो गये थे; लेकिन अभी तक बिन-ब्याहे थे। पास में थोड़ी-सी जमीन थी, मकान था, लेकिन घरनी के बिना सब कुछ सूना था। इसलिए घर पर जी नहीं लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे, और सबसे यही आशा रखते थे, कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके लिए सौ-दो-सौ खर्च करने को भी तैयार थे। क्यों उनका ब्याह नहीं हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे-खासे हृष्ट-पुष्ट आदमी थे, बड़ी-बड़ी मूँछें, औसत कद, साँवला रंग। गाँजा पीते थे, इससे आँखें लाल रहती थीं। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ भी थे। शिवजी को रोजाना जल चढ़ाते थे। और माँस मछली नहीं खाते थे।

आख़िर एक बार उन्होंने भी वही किया, जो बिन-ब्याहे लोग अक्सर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन-बाणों से घायल हो गये। वह उनके यहाँ गोबर पाथने, बैलों को सानी-पानी देने और इसी तरह के दूसरे फुटकर कामों के लिए नौकर थी। जवान थी, छबीली थी, और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भाँति प्रसन्न मुख और विनोदनी थी। ‘एक समय सखि सुअरि सुन्दरि’ वाली बात थी। मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गयी। ऐसी अल्हड़ न थी। और नखरे करने लगी। केशों में तेल भी पडऩे लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो। आँखों में काजल भी चमका, ओठों पर मिस्सी भी आयी, और काम में ढिलाई भी शुरू हुई। कभी दोपहर को आयी और झलक दिखाकर चली गयी, कभी साँझ को आयी और एक तीर चलाकर चली गयी। बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे देते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्योंकर? वहाँ तो अब प्रेम उदय हो गया था। होली में उसे प्रथानुसार एक साड़ी दी; मगर अबकी गजी की साड़ी न थी, खूबसूरत-सी सवा दो रुपये की चुँदरी थी। होली की त्योहारी भी मामूल से चौगुनी दी। और यह सिलसिला यहाँ तक बढ़ा कि वह चमारिन ही घर की मालकिन हो गयी।

एक दिन सन्ध्या-समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे! एक इन लाला के बाप थे कि कभी किसी मेहरिया की ओर आँख उठाकर न देखा, (हालाँकि यह सरासर ग़लत था) और एक यह हैं कि नीच जाति की बहू-बेटियों पर भी डोरे डालते हैं! समझाने-बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं, उलटे और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। इसलिए निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिए कि हमेशा के लिए याद हो जाए। इज्जत का बदला खून ही चुकाता है, लेकिन मरम्मत से भी कुछ उसकी पुरौती हो सकती है।

दूसरे दिन शाम को जब चम्पा मामू साहब के घर में आयी तो उन्होंने अन्दर का द्वार बन्द कर दिया। महीनों के असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यावहारिक रूप देने का निश्चय किया था। चाहे कुछ हो जाय, कुल मरजाद रहे या जाय, बाप-दादा का नाम डूबे या उतराय!

उधर चमारों का जत्था ताक में था ही। इधर किवाड़ बन्द हुए, उधर उन्होंने द्वार खटखटाना शुरू किया। पहले तो मामू साहब ने समझा, कोई असामी मिलने आया होगा, किवाड़ बन्द पाकर लौट जाएगा; लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुना तो घबड़ाये। जाकर किवाड़ों की दराज से झाँका। कोई बीस-पचीस चमार लाठियाँ लिए द्वार रोके खड़े किवाड़ों को तोडऩे की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें? भागने का कहीं रास्ता नहीं, चम्पा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गये कि शामत आ गयी। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलाएगी यह क्या जानते थे, नहीं इस चमारिन पर दिल को आने ही क्यों देते। उधर चम्पा इन्हीं को कोस रही थी-तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, मेरी तो इज्जत लुट गयी। घर वाले मूड़ ही काटकर छोड़ेंगे, कहती थी, कभी किवाड़ बन्द न करो, हाथ-पाँव जोड़ती थी, मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था। लगी मुँह में कालिख कि नहीं?

मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आये थे। कोई पक्का खिलाड़ी होता तो सौ उपाय निकाल लेता; लेकिन मामू साहब की तो जैसे सिट्टी-पिट्टी भूल गयी। बरौठ में थर-थर काँपते ‘हनुमान-चालीसा’ का पाठ करते हुए खड़े थे। कुछ न सूझता था।

और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था, यहाँ तक कि सारा गाँव जमा हो गया। बाम्हन, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने के लिए आ पहुँचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवद्र्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द एक औरत के साथ घर में बन्द पाया जाए! फिर वह चाहे कितना ही प्रतिष्ठित और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती। बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाड़े गये और मामू साहब भूसे की कोठरी में छिपे हुए मिले। चम्पा आँगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे नहीं बोला। मामू साहब भागकर कहाँ जाते? वह जानते थे, उनके लिए भागने का रास्ता नहीं है। मार खाने के लिए तैयार बैठे थे। मार पडऩे लगी और बेभाव की पडऩे लगी। जिसके हाथ जो कुछ लगा-जूता, छड़ी, छाता, लात, घँूसा अस्त्र चले। यहाँ तक मामू साहब बेहोश हो गये और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझकर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गये, तो गाँव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्टीदारों के हाथ आएगी।

इस दुर्घटना की खबर उड़ते-उड़ते हमारे यहाँ भी पहुँची। मैंने भी उसका खूब आनन्द उठाया। पिटते समय उनकी रूप-रेखा कैसी रही होगी, इसकी कल्पना करके मुझे खूब हँसी आयी।

एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्योंही चलने-फिरने लायक हुए, हमारे यहाँ आये। यहाँ अपने गाँव वालों पर डाके का इस्तग़ासा दायर करना चाहते थे।

अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखायी होती, तो शायद मुझे हमदर्दी हो जाती; लेकिन उनका वही दम-खम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देखकर बिगडऩा और रोब जमाना और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था! अब तो मेरे पास उन्हें नीचा दिखाने के लिए काफी मसाला था!

आखिर एक दिन मैंने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनायी। सब-के-सब खूब हँसे। मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ-साफ लिखकर वह कापी मामू साहब के सिरहाने रख दी और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डरता भी था, कुछ खुश भी था और कुछ घबराया हुआ भी था। सबसे बड़ा कुतूहल यह था कि ड्रामा पढक़र मामू साहब क्या कहते हैं। स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टँगा हुआ था। छुट्टी होते ही घर चला गया। मगर द्वार के समीप आकर पाँव रुक गये। भय हुआ, कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठें; लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लडक़ों में न था।

मगर यह मामला क्या है! मामू साहब चारपाई पर नहीं हैं, जहाँ वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर चले गये? आकर कमरा देखा वहाँ भी सन्नाटा। मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अन्दर जाकर पूछा। मालूम हुआ, मामू साहब किसी जरूरी काम से घर चले गये। भोजन तक नहीं किया।

मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा मगर मेरा ड्रामा-मेरी वह पहली रचना-कहीं न मिली। मालूम नहीं, मामू साहब ने उसे चिरागअली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गये?

8 सितम्बर 2011

पीले जूते वाली लड़की


दैट गर्ल इन येलो बूट एक ऐसी लड़की रूथ की कहानी है जो विदेश से मुंबई अपने उस पिता की खोज में आई है जो उसके परिवार को तब छोड़ आया जब वह लड़की बहुत ही छोटी थी फिल्म में रूथ का किरदार कल्कि कोचलिन नें निभाया है। रूथ के पास वीसा और वर्क परमिट नहीं है और मुंबई जैसे शहर में बिना जॉब के रह पाना उसके लिए मुश्किल हो जाता है, इसलिए वह अपने बॉय फ्रेंड प्रशांत की मदद से एक मसाज पार्लर में काम करने लगती है, जहाँ वह अपने ग्राहकों को अतिरिक्त 1000 रुपये के बदले उन्हें हैंड जॉब देती है। रूथ के पास पार्लर में आने वाले ग्राहकों की कई किस्में हैं जिसमें शरीफ शहरी, शर्माने वाले युवा और सिर्फ हैंड जॉब के उद्देश्य से आने वाले लोग हैं। ये विभिन्न चरित्र मसाज पार्लरों की प्रकृति बताने के लिए रखे गए हैं। नसीरुद्दीन शाह के चरित्र का उस पार्लर में यह बताने के लिए रखा गया है कि इन पार्लरों में सिर्फ मसाज भी होता है।

रूथ के बॉय फ्रेंड प्रशांत पर एक कन्नड़ तस्कर का २ लाख रुपया उधार बाकी है और जब वह प्रशांत से पैसे वसूलने और ढूँढने में नाकाम होता है तो वह रूथ के घर आ कर उसके पैसे छीन ले जाता है और बाकी पैसों के लिए एक बार में 1000 रुपये के हिसाब उसे हैंड जॉब देने के के लिए कहता है। रूथ उस तस्कर से बहुत चालाकी से बचती है। रूथ की यह चालाकी सिर्फ यहीं नहीं दिखती, बल्कि वह जिस तरह से पिता की खोज के दौरान मिलने वाले भ्रष्ट आफिसरों को डील करती है वहाँ भी दिखती है। वह जानती है कि यहाँ हर काम पैसे दे कर कराया जा सकता है।

मुख्य कहानी के अलावा फिल्म कुछ उप कहानियाँ भी हैं जिसमें रूथ के बॉय फ्रेंड का ड्रग एडिक्ट होना और ड्रग से छुटकारा पाना के लिए प्रयास करना, नसीरुद्दीन शाह का रूथ से स्नेह हो जाना और यह पता चलने पर कि वह मात्र 1000 रुपये के लिए हैंड जॉब देने जैसा काम करती है तो दुखी होना व पारलर से जाना, तस्कर के पिता का उसके बचपन में मर जाना और रूथ का इस बात का फायदा उठाना। ये सारी उप कहानियां मुख्य कहानी में बहुत ही अच्छी तरीके से बुनी हुई हैं।

फिल्म की कहानी बहुत डार्क है लेकिन फिल्म का ट्रीटमेंट माहौल को हल्का बनाये रखता है। पार्लर की मालकिन के चरित्र को इस तरह से बुना गया है कि वह कई जगह सहज हास्य पैदा करता है इस वजह से इतनी डार्क कहानी होने के बावजूद दर्शक तनाव में नहीं आता। फिल्म के क्लाइमैक्स में जो बातें सामने आती हैं उनसे ब्लादिमीर नोबोकोव के उपन्यास लोलिता एवं एक अन्य भारतीय फिल्म थैंक्स माँ की याद ताज़ा हो जाती है। पिता की खोज के साथ ही फिल्म खत्म हो जाती है लेकिन यह साफ़ नहीं होता कि प्रशांत ड्रग्स की आदत छोड़ पाया या नहीं? प्रशांत और रूथ से उस तस्कर नें अपने पैसे वसूल किये या नहीं? कुल मिलकर मेरे विचार में फिल्म का क्लाइमैक्स ही फिल्म का सबसे कमजोर पहलू है हाँ उसे दिखाने के लिए जो ताना बाना अनुराग और कल्कि नें बुना है वह बहुत ही अच्छा है।

अनुराग कश्यप की फिल्मों में कैमरे के साथ बहुत खेला जाता है यह फिल्म भी अपवाद नहीं है। कुछ जगह तो यह प्रयोग बहुत अच्छा लगता है लेकिन कुछ जगहों पर खीझ पैदा करता है। किसी ने लिखा था कि आमिर खान के देल्ही बेली बना कर बॉलीवुड को “बड़ा” कर दिया है मेरे मानना है कि उन लोगों को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए। गालियाँ वही हैं, लोग भी हिन्दुस्तान के हैं, सेंसर का सर्टिफिकेट भी वही है, लेकिन फिर भी इस फिल्म में ऐसी फिल्म बनाने का एक सलीका मौजूद है।

स्वप्निल तिवारी

6 सितम्बर 2011

मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है ?



मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है? बोल फिल्म का यह सवाल उठता तो एक मुल्क़,मज़हब विशेष में मगर हो जाता है कई मुल्क़ों,मज़हबों का। जिन्होंने शोएब मंसूर की खुदा के लिए देखी होगी वो इस फिल्म के ज़रिये निर्देशक के मन में चल रही कहानियों और बेचैनियों को महसूस कर सकते हैं। बोल में कथाओं का इतना संगम और टकराव है कि आप एक साथ कई तरह के समय और सवालों में उलझते चले जाते हैं।

टेक्नॉलजी और एडिटिंग के दम पर यह फिल्म फिल्म नहीं बनती बल्कि अपनी कथाओं के सहारे फिल्म बनती चली जाती है। लाहौर की सड़कें,छतें और गलियों से निकलती कहानियां हिन्दुस्तान के सिनेमाघर में देखते हुए अपने शहरों की लगने लगती है। यह फिल्म एक हिन्दुस्तानी को जो पाकिस्तान कभी नहीं गया, उसके समाज से परिचय कराती है। वर्ना मीडिया से जो पाकिस्तान हमें विरासत में मिला है उसमें सिर्फ हुक्मरानों,फौजियों,आतंकवादियों,क्रिकेटरों,गायकों की तस्वीरें हैं। घर और समाज नहीं है। बोल पाकिस्तान को लेकर हमारी चुप्पी को भी तोड़ देती है। यह फिल्म सहजता से ऐसे मुश्किल सवालों को अपने मुल्क के सामाजिक परिवेश में उठा देती है जिसकी आवाज़ हमें किसी और चैनल से इस तरफ नहीं सुनाई पड़ती। सच कहूं तो पहली बार किसी फिल्म को देखकर लगा कि इधर के हों या उधर के,मसले दोनों के एक हैं। 


कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। 


सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं। हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिद की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं।


कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है। यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। 


फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।


रवीश कुमार 
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5 सितम्बर 2011

गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है

शिक्षक दिवस पर विशेष 


अधूरे खाबों की परछाईयाँ जब पीछा करती हैं 
धूल भरी पगडंडियों पर सुनसान दोपहर में 
जब टूटते हुए वायदों की चीखें 
बन कर बवंडर उड़ा ले जाती हैं मेरा जीस्त
तब दफ़न कर अपनी लाज
बुझे हुए क़दमों से
लांघ कर सारे कुंठाओं के पहाड़
हाथ की फटी हुई लकीरें लिए
फिर चला आता हूँ मैं
तुम्हारे पास
अपनी ग्लानियों की ग्रंथियां लिए


जब उठने लगता है अपने ऊपर से भरोसा
हार के भय से काँप जाती है रूह
जब टूट जाता है मेरा झूठा गर्व
तब फिर लाद कर कंधों पर लाशें
पराजित स्वप्नों की
चला आता हूँ मुंह लटकाए बहाने लेकर
तुम्हारे पास


तब उदास ताम्बई चेहरे पर उग आयी दरारों में
बोते हो ज्ञानबीज, धोते हो मेरे घाव
फुसलाकर कानों में डाल देते हो सिद्ध मंत्र
ठोक कर छातियाँ मेरी मल देते हो भाल पर
अपनी जली हुई अस्थियों के राख
रच देते हो अल्पनायें मेरी पीठ पर
भालों की नोंक से, लिख देते हो
पेशानियों पर मेरा प्रारब्ध
फिर फेंक आते हो रणभूमि में
देकर हाथों में कटार
बंद कर मुट्ठियों में साहस के ताबीज

लड़ता हूँ दम साध कर, रातों को दिन बना कर  
मंझधारों में पर जब फंस जाता हूँ  मैं
भग्न हो जाते हैं असि, आयुध मेरे
छिन्न हो जाता है मेरा राजसी यौवन
तब फिर कर लेता हूँ आवाहन
उस अमूर्त स्वरूप का जो भरता है
पुरुषार्थ-पुंज थक चुकी चेतना में
उस स्नेहिल धारा का जो सींचती है
मेरे सूख चुके प्राण


मैंने नहीं देखा है तुम्हें बरसों से
नहीं छुआ है तुम्हारे हाथों की उंगलियाँ 
हवाओं के पार बैठे हो तुम
इस पार मैं बुन लेता हूँ
हवाओं पर तुम्हारी आकृति
घोल कर पी लेता हूँ सारा ज्ञान
जीत लाता हूँ सारे अविजित दुर्ग
धर देता हूँ चरणों में काट कर 
शिखरों पर लहराते झंडे
फिर भी नहीं पसीजते हो तुम
नहीं छू पाता हूँ तुम्हारी देह
मैं काट लाता हूँ हजारों नर मुंड
खड़ा हो कर टीलों पर उनके
चमकाता हूँ अपना खडग
पर फिर भी नहीं आती है चेतना उस छाया में
जिसकी ओट में छिप कर गढ़ता हूँ अपना रण-कौशल


पराजित हो फिर अपनी विजय से
जीर्ण हो कर गर्व में अपने
पलायन कर जाता हूँ जंगलों में
छोड़ कर सारे राज मार्ग 
भटकता हूँ कंटकाकीर्ण वीथियों में
नंगे पाँव, अधमरा, रूग्ण सा 
उसी कस्तूरी की तलाश में
जिसमें बंद है मेरा संदीपन 


पर एक मोह जो पीछे हो लेता है मेरे
एक सघन नीरवता जो झांकती है 
मस्तिष्क के अंधेरों में
एक धृष्टता और फिर उसकी
सालती हुई गहरी टीसें 
एक प्रचंड दावानल जिसमें झुलसती
है यह देह, यह आत्मा मेरी
आँखों में उड़ कर चले आते हैं
 राख के काले बवंडर


जब धूमिल हो जाते हैं सारे गंतव्य
फीके हो जाते हैं सारे जीवन दर्शन
अंत में काट कर यह शीश अपना
धर देता हूँ चरणों में तेरे
मिल जाता हूँ उसी छाया में
ढूँढता हुआ वह दीप्ताभ
जिसने गढ़ी है मेरी प्रतिभा 

दीपांकर 

2 सितम्बर 2011

चुका भी हूँ मैं नहीं


चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैनें प्रेम
अभी.
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफन उठेंगे
सात सागर.
किंतु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैनें साज
अभी.
सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
हृदय ।
निकटतम सबकी
अपर शौर्यों की
तुम
तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी तब
प्राप्य जय !

शमशेर बहादुर  सिंह