आशीष पाण्डेय
हिमालय... जहां चोटियों ने ओढ़ी है, बर्फ की चादर जहां धूप गुनगुनाती...गाती हुई पिघलाती है, इन्हें एक नर्म एहसास के साथ। यह स्पीति घाटी है। हिमालय की गोद में बसी स्पीतियन लोगों की सरजमीं।
स्पीतियन लोगों का एक लंबा इतिहास है, जो वक्त-दर-वक्त इनके साहस और मजबूत इरादे से बनता चला आया है। इनका यह इतिहास सदियों से बर्फ की ठंडी तासीर के साथ-साथ धूप के मखमली छूवन से जवान हुआ है। ऐसी ठंड भरी जगह को अपना ठौर-ठिकाना बनाया स्पीतियन लोगों ने। स्पीति को संसार का जीवाश्म/फासेल गार्डेन भी कहा जाता है। स्पीति की सरहदें एक तरफ तो जम्मू-कश्मीर को छूती है, वहीं दूसरी तरफ स्पीति की सीमाएं खुद को तिब्बत की ड्योढ़ी पर समेट लेती हैं।
इतिहास के आइने में देखें तो स्पीति पर सेन राजा का शासन हुआ करता था। इस दौरान वक्त तेजी से करवटें बदलता रहा और नवीं शताब्दी में तिब्बत साम्राज्य का उदय हुआ, इसके साथ ही एक नई दास्तां शुरू हुई लद्दाख सल्तनत की। महाराजा स्काईद-लदे ने इस सल्तनत की बुदियाद रखी। इसी सल्तनत के तीसरी पीढ़ी के राजा इस्काईद-लदे नी माम्गों ने लद्दाख की सरहदों को बढ़ाते हुए इसमें लाहौल और स्पीति को मिला लिया।
राजा स्काईद-लदे नी माम्गों ने यहां के सेन राजा को स्पीति के तीन गांव दिये और अपने प्रशासक के तौर पर कुछ परिवारों को स्थायी अधिकार दे दिये। आगे चलकर यही प्रशासक ‘नोनो‘ कहलाए। वैसे अगर देखा जाए तो लद्दाख राजा के अलावा यहां मुगल और पंजाब के राजा रंजीत सिंह भी आए, और शासन किया, लेकिन स्पीतियन लोगों ने किसी की गुलामी ज्यादा दिनों तक नहीं सही।
सन् 1947 में देश की आजादी के बाद यह पंजाब के कांगड़ा जिले का हिस्सा हुआ करता था। सन् 1960 में यह लाहौल- स्पीति नामक नए जिले के रूप में, एक नए प्रदेश यानी हिमाचल प्रदेश के साथ जुड़ा। बाद में स्पीति को सबडिविजन बनाया गया और काजा बना इस सबडिविजन का हेडक्वार्टर। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार 13835 वर्ग किलामीटर में फैले इस जिले की जनसंख्या 31294 थी और जनसंख्या घनत्व 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर।
स्पीति यह एक ऐसी घाटी है जहां जिन्दगी जीने के लिए जी-जान से मशक्कत करनी पड़ती है। स्पीतियन लोगों की तकदीर उनके हाथों की लकीरों में नहीं होती बल्कि उनकी तकदीर उन्हें अपनी मेहनत, हौसले और बुद्धम शरणम् गच्छामी की प्रेरणा से मिलती है। इनके जीवन का मूलमंत्र है भगवान बुद्ध का तप..... ज्ञान और दर्शन।
स्पीतियन लोगों के लिए यह बौद्ध मान्यताएं केवल आस्था और विश्वास ही नहीं, बल्कि उससे बढ़कर उनके रोजमर्रा की जिंदगी है। सदियों से बौद्ध परम्परा की गवाह रही यह स्पीति घाटी अपनी कई मोनेस्ट्रियों के लिए देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपना विशेष स्थान रखती है। यहां कई मोनेस्ट्रियों ऐसी हैं, जिनकी स्थापना सदियों पहले की गई थी। इनमें ताबो, ‘की‘ और धनकर मोनेस्ट्यिां प्रमुख हैं।
ताबो मोनेस्ट्री की स्थापना लगभग दशवीं शताब्दी में राजा येश्हे ओब ने की थी, और अभी बीते वर्षों में यानी सन् 1996 में इस मोनेस्ट्री ने अपने जीवन के 1000 वर्ष पूरे किये हैं। स्पीति की यह मोनेस्ट्री कला और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। सागर तल से करीब दस हजार फीट की उचाई पर स्थित इस मोनेस्ट्री का ऐतिहासिक महल इसलिए भी विशेष है क्योंकि हिंदू और बौद्ध सभ्यताएं एक-दूसरे को जानने के लिए यहां आया करती थीं। इस मोनेस्ट्री के सामने कई छोटी-बड़ी गुफाएं हैं, जो ताबो मोनेस्ट्री के इतिहास की गवाह रहीं हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब सदियों पहले यहां ताबो मोनेस्ट्री का निर्माण नहीं हुआ था। तब दूर-दूर से आये लामा लोगों ने इसी गुफा में रहते हुए ताबो मोनेस्ट्री का निर्माण किया था। मोनेस्ट्री की बनावट पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार है, मोनेस्ट्री के भीतरी दीवारों पर भगवान बुद्ध के जीवन, ज्ञान और दर्शन को थंका चित्रकला द्वारा प्रदर्शित किया गया है। बौद्ध शिक्षा का सदियों से प्रचार-प्रसार कर रही यह ताबो मोनेस्ट्री हमारी अमूल्य और ऐतिहासिक धरोहर है।
भगवान बुद्ध सदियों पहले इस भूमि पर आए और भक्ति की ऐसी ज्योत जला गए, जो आज भी स्पीति घाटी को ध्रुव तारे की तरह प्रकाशित कर रही है। कुछ ऐसे ही प्रकाश बिखेर रही है ‘की‘ मोनेस्ट्री। सागर तल से करीब 13500 फीट की उचाई पर काजा सबडीविजन के पास इस मोनेस्ट्री में लगभग 300 लामा अपनी धर्मविद्या और पाली की शिक्षा ले रहें हैं। धर्म के साथ कला का अद्भुत् समायोजन इस मोनेस्ट्री के निमार्ण शैली में दिखाई देती है। मोनेस्ट्री की दीवारों पर भगवान बुद्ध सहित अन्य देवी-देवताओं को दुर्लभ चित्रों और लिपियों के जरिए दर्शाया गया है। यह मोनेस्ट्री इतनी पुरानी है कि इसका निर्माण कब हुआ यह बता पाना बड़ा ही मुश्किल है। धर्म, ज्ञान और दर्शन को जानने के साथ-साथ यहां थंका चित्रकला की विश्वप्रसिद्धि कृतियों को देखा जा सकता है।

वैसे तो पूरी स्पीति घाटी अपने मोनेस्ट्रीयों के लिए प्रसिद्ध है, परन्तु उनमें धनकर मोनेस्ट्री अपनी खास पहचान रखता है। अगर हम धनकर मोनेस्ट्री के बीते इतिहास पर नजर डाले तो सातवीं और आठवीं शताब्दी के मध्य बने किलेनुमा मोनेस्ट्री की बड़ी अनोखी दास्तां है। उस जमाने में स्पीति वासियों के पास आत्मरक्षा की तकनीकें नहीं थी और न ही संचार के कोई साधन।
इसलिए सागर तल से 12774 फीट उंचे इस मोनेस्ट्री में आग जलाकर लोगों को इकठ्ठा करते थे और यहीं छुपकर अपनी जान बचाते थे। अगर आज स्पीति के मूललोग मौजूद है तो इसका श्रेय कहीं न कहीं धनकर मोनेस्ट्री को अवश्य जाता है। यहां भगवान बुद्ध की ध्यानमय मूर्ति और थंका चित्रकला देखने योग्य हैं। इस मोनेस्ट्री से कुछ ही दूरी पर एक सुंदर झील है, जो इसकी आध्यात्मिकता को शिखर की उंचाई प्रदान करता है। यही वजह है कि स्पीतिवासियों के जीवन में बुद्ध का ज्ञान रचा-बसा है।
सीधे और सच्चे हृदय वाले स्पीतियन लोगों की जिंदगी बर्फीली हवाओं के थपेड़ों से गुजरते हुए इसी घाटी में आने वाले कल के सपने देख रही है। सपनों की अपनी जुबां या कहें उनकी अपनी भाषा होती है। ठीक उसी तरह स्पीतियन लोगों की अपनी भाषा है...... ‘भोटी‘। स्पीतियनों की भाषा ‘भोटी’ तिब्बती से इतनी मिलती-जुलती है कि इसे तिब्बतन का दूसरा रूप भी कहते हैं। भोटी लाहौल और स्पीति में समान रूप से बोली जाती है, लेकिन भौगोलिक परिवेश और रहन-सहन में अंतर की वजह से दोनों जगहों की भाषाओं में थोड़ा अन्तर है। पाली भाषा जिसमें मूलतः बुद्ध साहित्य और उपदेशों की रचना हुई है। भोटी भाषा से काफी भिन्न है, लेकिन भोटी भाषा ने पाली मूल के कुछ शब्दों को अपनाया भी है।
समाजिक संरचना के तौर पर स्पीतियन लोगों के गांव बसाने का तरीका भी अपनी तरह का है। घरों से मिलकर गांव बनते है, और कई गांवों को मिलाकर कोठियां बनती हैं। पूरी स्पीति घाटी में पारंपरिक रूप से पांच कोठियां हैं। स्पीतियन समाज की जीवन शैली उन्हें अपने विरासत से मिली है। स्पीतियन लोग जाति व्यवस्था हिन्दू मूल की प्रवृत्ति है और बौद्ध धर्म ऐसे किसी मान्यता के लिए कोई जगह नहीं है। परन्तु सामाजिक स्तर पर वर्ग संरचना जरूर है। वर्ग के तौर पर स्पीतियन लोग दो वर्गों में विभाजित हैं। पहला...उच्च वर्ग और दूसरा...निम्न वर्ग। उच्च वर्ग में भी तीन अलग-अलग स्तर होते हैं...नोनो, खांग्चेन और खांग्चांग।
इनमें नोनो सबसे उच्च दर्जे के होते हैं, जिनके पूर्वज कभी स्पीति पर शासन किया करते थे या यहां के वजीर रहे थे। खांग्चेन उन लोगों का वर्ग है, जो पुराने समय से बड़े मकानों में रहते आये हैं, और इसी तरह खांग्चांग ऐसे वर्ग में आते हैं, जिनके मकान खांग्चेन वर्ग से छोटे होते हैं। इनके मकानों में कौन से बड़े श्रेणी में आते हैं, और कौन से छोटे श्रेणी में, इसका निर्धारण स्पीतियन लोग अपनी परंपरा के आधार पर करते हैं।
निम्न वर्ग में दस्तकार, पेशेवर लोहार और भूमिहीन किसान आते हैं। इन्हें जोव और बेटा कहते हैं। जोव लोग पुश्तैनी रूप से लोहारी का काम करते हैं। वहीं बेटा लोगों का मुख्य पेशा नाच-गाना है। सदियों से इन विरान वादियों को गुनगुना कर गाकर हंसते-हंसाते आए हैं। साल के जिन दिनों में यह अपने पेशे से दूर रहते है, उस समय उच्च वर्गों की खेतिहर मजदूरी पर जीवन यापन करते हैं।

स्पीतियन लोगों के घर, दो से तीन मंजिल के होते हैं। इन घरों को कांगचिंपा कहा जाता है। इन घरों में भूतल का प्रयोग जानवरों को रखने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इस भूतल का प्रयोग उन पशुओं के चारा रखने और ईधन रखने के लिए भी किया जाता है। स्पीतियन परिवार उपरी मंजिल का प्रयोग अपने रहने के लिए करते हैं। इस मंजिल पर तीन कमरे होते हैं और उन कमरों के साथ एक बरामदा भी होता है। यह बरामदा, दरवाजों के जरिए तीनों कमरों के साथ जुड़ा होता है। इन तीनों कमरों में बीच के कमरे का प्रयोग परिवार के सदस्य रहने के लिए करते हैं, जबकि दाहिने कमरे का प्रयोग बतौर पूजा घर के रूप में होता है। स्पीति भाषा में इस घर को ’चापेल’ कहतें हैं। बायें कमरे का प्रयोग, स्पीतियन लोग, भोजन कक्ष के रूप में करतें हैं। घर अगर बड़ा है तो अन्य कमरों का प्रयोग परिवार के सदस्य के रहने के लिए करते हैं। इन घरों को बनाने के लिए स्पीति के लोग बहुत हद तक अपने भौगोलिक परिवेश पर निर्भर रहतें हैं।
घरों को बनाने में लकड़ियों का प्रयोग ज्यादा होता है, क्योंकि लकड़िया इन्हें आसानी से मिल जाती हैं। मगर घर की दीवारों के मामले में स्पीतियन लोगों की सेाच थोड़ी हटकर है। दीवार बनाने के लिए यह पत्थरों का प्रयोग नहीं करते, बल्कि पत्थरों की जगह कठिन परिश्रम से बनाऐ गए ईटों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। इसके पीछे स्पीतियन लोगों का मानना है कि पत्थरों की बजाय ईंटों से बने घर ज्यादा गर्म होतें हैं। इन घरों के लगभग पास ही छोटे घरों का प्रयोग, वह माता-पिता करते हैं, जो अपने बच्चों की शादी-विवाह करके, सारे दायित्वों से, मुक्त हो चुके होते हैं।
स्पीतियन घर, शिल्प और कला के अद्भुत उदाहरण हैं। इनमें नोनो वर्ग के घर, साज-सज्जा में सबसे आगे हैं। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार, विभिन्न रंगों से अपने घर की पुताई कराते हैं और साथ-साथ घरों में प्रयोग हुई लकड़ियों पर सुंदर नक्काशी कराते हैं। चापेल यानी पूजा घर। आस्था और विश्वास का स्थल। स्पीतियन लोग इस कमरे की साज-सज्जा में बौद्ध मान्यताओं का खासा ख्याल रखते हैं। चापेल को घर की महिलाओं द्वारा झूमर और झालर बनाकर, विशेष रूप से सजाया जाता है। इसके साथ ही मोनेस्ट्रियों से लाई गई थंका पेंटिंग से चापेल यानी पूजाघर आध्यात्मिक रूप दिया जाता है।
सभी स्पीति वासियों के घर पर एक झंडा होता है,जिस पर काले याक की पूंछ बंधी होती है। इसके पीछे यहां के लोगों का यह मानना है कि यह झंडा बुरी नजरों और दुष्ट आत्माओं से इनकी रक्षा करता है। स्पीतियन समाज में संयुक्त परिवार का प्रचलन है। लेकिन पीढ़ियां जैसे-जैसे जवान होती हैं, परिवार टूट कर बिखर जाते हैं। इसका मूल कारण इनकी अपनी प्रथा मेुं छुपा हुआ है। किसी परिवार में जब सबसे बड़े बेटे की शादी होती है, तो माता-पिता उस बेटे को अपनी सारी जिम्मेदारी देकर स्वतंत्र हो जाते हैं। इसके बाद वह अपने मुख्य घर के करीब ’कांग-छुंग’ में रहने के लिए चले जातें हैं। परिवार के अन्य सदस्य, मसलन छोटे भाई-बहन चाहें तो बड़े भाई के साथ रह सकतें हैं या फिर माता-पिता के साथ भी जा सकते हैं। लेकिन छोटे भाई-बहन इन दोनों जगहों की बजाय बौद्ध मोनेस्ट्री में चले जातें हैं।
स्पीतियन समाज में अधिकांश लामा यानी पुरूष सन्यासी और चेमो यानी महिला सन्यासिनी, ऐसे ही घरों के सदस्य होतें हैं, जो अपने परिवार के बिखरने के बाद भगवान बुद्ध की शरण में आ जाते हैं। स्पीतियन परिवार में महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक है। महिलाएं सामान्य रूप से घर के अंदर और बाहर दोनों जगह समान रूप से काम करती हैं। सिलाई, बुनाई, खाना पकाने के साथ-साथ कृषि कार्यों में भी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पारिवारिक मसलों पर निर्णय लेने का अधिकार तो महिलाओं के पास नहीं होता, परन्तु सभी मसलों पर उनकी राय बहुत अहम होती है।

वर्ग विभाजन स्पीतियन समाज के आपसी सम्बन्धों और शादी-विवाह में काफी मायने रखती है। मसलन नोनो परिवार की शादियां आज भी नोनो परिवारों में ही होती हैं। मगर नोनो परिवार आज केवल गिनती के रह गए हैं। इसलिए, वह अपने वैवाहिक संबंध, खंाग्चेनों परिवारों में भी बनाते हैं। लेकिन इसमें भी नोनो परिवार अपनी बेटियों की शादी उनके घरों में करते हैं, मगर खांग्चेगों परिवार की बेटियों की शादी अपने परिवार में नहीं करते। खांग्चागों और खांग्चेगों अपनी शादियां अपने-अपने वर्गों में ही करते हैं। स्पीतियन समाज में शादियां दो तरह से होती हैं। एक-जो समाज की रजामंदी से होती है और दूसरा-प्रेम विवाह, जिसे ’खादुम’ कहतें है।
पारंपरिक शादी में युवक और युवती के परिवार ज्यातिषियों से मिलते हैं। उनसे विवाह के बारे में परामर्श करते हैं। इन ज्योतिषियों को स्पीति भाषा में झोया कहतें हैं। इसके बाद युवक का पिता विवाह प्रस्ताव लेकर युवती के माता-पिता से मिलता है। विवाह प्रस्ताव मंजूर होने पर सगाई मानी जाती है। इस रस्म को ’मिंगे और छंग’ कहतें हैं। इस मौके पर पारंपरिक शराब ’छंग’ और ’अराक’ की दावत होती है। इसके बाद निश्चित तारीख को लड़के की बरात, लड़की के घर रवाना होती है। लेकिन इस बारात में सबसे दिलचस्प पहलू यह होता है, कि इसमें दूल्हा और उसका पिता शामिल नहीं होते। बल्कि उनकी जगह बारात को लेकर कोई बुजूर्ग या सुलझा हुआ आदमी जाता है, जिसे ’न्येखॅान’ कहते हैं। यह न्येखान अपने साथ दो वीर, दुल्हन के घर ले जाता है और उनमें से एक वीर, दुल्हन की मां को वैवाहिक प्रमाण के तौर पर देता है। वहीं ’खादुम’ यानी, प्रेम विवाह, समाज और माता-पिता की इच्छा के खिलाफ होता है। प्राचीन समय में, इस तरह के विवाहों का कड़ा विराध होता था, और लड़के-लड़कियों को संपत्ति के अधिकार से भी वंचित कर दिया जाता था। लेकिन बदलते वक्त के साथ इस तरह के विवाहों को भी देर-सवेर मान्यता मिल जाती है।
स्पीतियन समाज में महिलाओं के गहने ऐसे हैं कि विवाहित औरतों और अविवाहित लड़कियों को आसानी से पहचाना जा सकता है। विवाह के बाद औरतें अपने सिर पर चांदी से बने हुए ’बैरख’ पहनती हंै। जिसमें बेशकीमती पत्थरों और फिरोजा की लड़ियां पिरोई जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ अविवाहित लड़कियां फिरोजे को अपने गले में बांधती हैं। इनके गहनों में गउ, पिचुक, दीक्रा, धोंचा और उल्दिक का विशेष चलन है। महिलाएं अक्सर बुरी नजरों से बचने के लिए चांदी से मढ़े या कपड़े से बने ताबीज को पहनती हैं। जिन्हें श्रंुग्वा कहा जाता है। यह कान में कौंदा पहनती हैं और इन्हें युक्जुर भी बहुत पसंद है। ’न्यांग्थंग’ इनके गले का हार होता है और नाक पर सजती है ’फुली’। जब इतना श्रृंगार हो तो भला हाथों की उगलियां कैसे सूनी रहें ? इनकी उंगलियों में सजती है अंगुठियां।
स्पीतियन पुरूष भी इन अंगुठियों और मुरकियों को पहनने का शौक रखतें हैं। स्पीति के पुरूष, कमरबंद पहनते हैं और इस कमरबंद के साथ वह तरह-तरह की चीजें बांधतें हैं। जैसे....लोहे की पाइप, म्यान में चाकू, जंजीर से बंधा चकमक पत्थर, चम्मच और चाभियों के गुच्छे। स्पीतियन पुरूष और महिलाओं के कपड़े, वातावरण के अनुसार होतें हैं। पुरूष अपने पारंपरिक पहनावे पहनते हैं, सर पर छोटी टोपी, कुर्ता-पायजामा, चोंगा, कमर पर कपड़े या चमड़े का कमरबन्द और पैरों में मोजे-जूते होतें हैं। वहीं महिलाएं खंजक पहनतीं हैं, जो बिल्कुल कोट की तरह होता है, इस खंजक के उपर यह लोक्पो पहनतीं हैं। ढीला कुर्ता-पायजामा के साथ-साथ सुरमच भी इनके पहनावे का अहम हिस्सा है। यह सुरमच घाघरे की तरह होता है। इसके अलावा भीषण ठंड से बचने के लिए लंबा चोंगा, कपडे़ का कमरबंद और पैरों में मोजे- जूते पहनतीं हैं।
स्पीतियन लोगों का खान-पान, इनके भौगोलिक परिवेश के आधार पर होता है। खान-पान का यह तरीका काफी हद तक, तिब्बती खान-पान से मिलता हुआ नजर आता है। इनके खाने में सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन और शाम का खाना शामिल है। सुबह के नाश्ते को ’केन’ कहते हैं। यह शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों प्रकार का होता है। थुंग्पा में अगर सब्जियां हैं तो शाकाहारी और मांस मिला है तो मांसाहारी। दोपहर के भोजन को ’शोड’ कहा जाता है। दोपहर के खाने में, जौ के सत्तू के साथ-साथ उबले आलू और सब्जियों का प्रयोग भी करते हैं। इसके साथ ही ’सुमेकेसी’ यानी रोटी को भी अपनी थाली में शामिल करतें हैं। दोपहर का खाना शाकाहारी भी हो सकता है और मांसाहारी भी। ’शोड’ यानी दोपहर के भोजन के बाद, छाछ परोसने का इनका रिवाज भी बहुत पुराना है। स्पीतियन लोग रात के खाने को ’गान-गाल कहतें हैं। इसमें ’काल्हु’ यानी मेथी की रोटियों के साथ सब कुछ दिन के खाने के जैसा ही होता है। रात में केवल छांछ नहीं होती। छांछ की जगह ले लेती है, छंग या अराक, जो इनकी पारंपरिक शराब होती है। इस छंग या अराक को केवल रात के खाने के साथ ही नहीं लिया जाता बल्कि पर्व-त्योहार, शादी-विवाह, उत्सव और त्योहार पर भी यह जम कर पी जाती है। इन खानों के अलावा मक्खनियां चाय इनके खान-पान का अहम हिस्सा है। यह चाय इनके दैनिक जीवन का हिस्सा है, वहीं दूसरी तरफ मेहमान नवाजी के लिए मेहमान नवाजी के लिए भी यह मक्खनिया चाय बहुत जरूरी है। इस चाय को बनाने के लिए लकड़ी के विशेष बर्तन का प्रयोग किया जाता है। जिसे ’डोंग्मो’ कहतें हैं।

स्पीतियन लोग अपने लिए चाय की खेती खुद ही करतें हैं। मक्खन की इस चाय का स्वाद मीठा और नमकीन दोनों तरह का होता है। पुराने समय में चाय मीठा बनाने के लिए शहद का प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब शहद की जगह चीनी या गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है। स्पीतियन लोगों में चाय का सिलसिला सुबह से शुरू होता है और देर रात तक चलता रहता है। दरअसल, ठंड भरे मौसम में यह चाय इनके शरीर में, पानी की उचित मात्रा को बनाये रखती है। यही वजह है कि स्पीतियन लोग चाय के खासे शौकीन होतें हैं। इनके खाने में सबसे विशेष व्यंजन है, ’मोग-मांग’ और ’क्यारी’। यह दोनों व्यंजन माँसाहारी और लगभग एक जैसे होते हैं। मोग-मंाग आंटे की छोटी-छोटी गोलियों जैसी होती हैं, जिनमें मांस भरा होता है। इन्हें पकौड़ियों की तरह सूखा और शोखे में डुबो कर खाते हैं। उसी तरह क्यारी भी चावल की छोटी-छोटी गोलियों जैसी होती हैं, और इनके भीतर भी मांस भरा होता है। इसे भी पकौड़ियों की तरह सूखा या शोखे में डूबो कर खाते हैं।
कृषि स्पीतियन लोगों के लिए व्यवसाय तो नहीं, परन्तु जीविका चलाने के लिए, एक जरिया जरूर है। स्पीतियन समाज में ज्यादातर कृषक उच्च वर्गों से ही आते है। खेतों पर नोनो, खांग्चेनों और खांग्चागों वर्ग का ही कब्जा रहा है। लेकिन यह लोग स्वयं खेती-बाड़ी का काम नहीं करते। यह बेटा वर्ग के लोगों से खेती का काम कराते हैं, और उन्हें इसके लिए मजदूरी देते हैं। साल के कुछ महीने जब मौसम ठीक हो तो यहां जौ, गेंहू, मेथी और सरसों के साथ-साथ सब्जियों की अच्छी पैदावार होती है। स्पीतियन लोग प्राचीन समय से कामगार पशुओं को पालते आए है। जरूरत दूध की हो या माल ढोने की या फिर खेतों के लिए खाद की, यह पशु इनकी सारी जरूरतों को पूरा करते हैं। यहां ठंड ऐसी है कि हड्डियों तक को जमा कर रख दे और इससे बचने के लिए चाहिए, उन और यह भी पशुओं से मिलता है। इसलिए अपनी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, यह याक, गाय, खच्चर, गधा, भेड़ और बकरियों को पालतें हैं। इनके खेतों को जोतने के लिए यह लोग याक और गाय के मेल से बने नरे संकर का प्रयोग करतें हैं।
स्पीतियन समाज में चिकित्सा की पद्धति अतिप्राचीन और प्राकृतिक है। स्पीति घाटी अपने कई तरह के आर्युवेदिक जड़ीबूटियों के लिए जाना जाता है। सिबाथन और आईबैक जैसे कई ऐसे पौधे हैं जो बिमारियों को दूर करने में सहायक होतें हैं। स्वास्थ्य संबंधी शिकायत होने पर लोग चिकित्सक से मिलते हैं, जो इन्हें प्राकृतिक रूप से तैयार की गई दवाओं को मंत्रों के साथ देते हैं। इन दवाओं को देते समय चिकित्सक बिमारी को ध्यान में रखते हुए मंत्र बोलतें हैं, ताकि बिमारी जल्द दूर हो सके।
स्पीतियन लोगों की परंपराओं ने अतीत से वर्तमान तक एक लंबा सफर तय किया है। स्पीतियन समाज में व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद चोरटन बनाने की परंपरा है। यह चोटरन एक स्तूप होता है जिसे मृत व्यक्ति की याद में बनवाया जाता है। अपनों की याद को एक स्तूप के जरिए संजोने की यह परंपरा बुद्ध सभ्यता का जीता-जागता उदाहरण है। इसके अलावा स्पीतियन लोगों का अंधविश्वास पर भी इतना गहरा विश्वास है कि इस समाज में जादू-टोना और तंत्र विद्या का भी अच्छा खासा चलन है। ताना-माना यानी जादू-टोने का प्रयोग आमतौर पर बिमारी में ही किया जाता है। ऐसा माना जाता है, कि बिमार व्यक्ति पर बुरी आत्मा का साया है और उसे ठीक करने के लिए तांत्रिक तंत्र-मंत्र के साथ कर्मकाडों का भी सहारा लेतें हैं।
स्पीतियन लोगों के हाथों का हुनर देखने से ऐसा लगता है, कि ये सही मायने में कला के पुजारी हैं। ’किल्टा’ यानी ऐसी टोकरी जिसे पीठ पर बांधकर सामाप ढोने के लिए प्रयोग किया जाता है। इस किल्टे को यह अपने हाथों से बनाते हैं। इनकी कला की एक और मिसाल है फूला, घास से बने जूतों को फूला कहतें हैं। जिसके तलवे भेड़ या बकरे की खाल से बनाये जाते हैं। यह जूते पैरों को बेहद गर्म रखते हैं और बर्फबारी के समय पैरों को फिसलने नहीं देते।
स्पीतियन लोगों को कपड़े के रंग-रोगन में भी खासी महारत हासिल है और इनके कपड़ों के रंगाई की धूम तिब्बत तक फैली है। हथकरघे लगभग सभी स्पीतियन लोगों के घरों में होते हैं। ठंड के दिनों में जब घरों से निकलना मुश्किल होता है, तो इन करघों पर यह बुनाई का काम करते हैं। इनके बुने हुए सूती और उनी कपड़ों की मांग अन्य जगहों पर अच्छी-खासी मांग है।
थंका पेंटिंग..... स्पीतियन समाज की एक महत्वपूर्ण कला, जिसने विश्व में अपनी विशेष पहचान बनाई है। थंका पेंटिंग मूलतः, नेपाली कला है, जिसे स्पीतियन समाज ने तिब्बत से प्रभावित होकर, अपना बना लिया। थंका केवल पेंटिंग नहीं है, बल्कि यह बौद्ध धर्म की आस्था, विश्वास और मूल्यों से जुड़ी हुई है। थंका पेंटिंग, सूती कपड़े और कैनवस पर बनाई जाती है। चटक रंगों के सुंदर समन्वय से भगवान बुद्ध के जीवन दर्शन और ज्ञान के साथ-साथ कई तरह की धार्मिक कथाओं को पेंटिंग के जरिए दर्शाया जाता है। धार्मिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए इन पेंटिगों का बखूबी प्रयोग किया जाता है। थंका पेंटिंग को बौद्ध मोनेस्ट्री में या फिर स्पितियन लोगों के पूजाघर यानी चापेल में लगाया जाता है। काल चक्र, ध्यान बुद्ध, बुद्ध जीवन यात्रा और यात्रा थंका पेंटिंग मोनेस्ट्री में लामा और चेमों ही बनाते हैं। सदियों से मोनेस्ट्री में फलती-फूलती आई यह कला आज भी अपने सफर को जारी रखे हुए है।
संसार की हर बात से बेखबर स्पीतियन लोगों की जिंदगी में पर्व और मेले खुशियों का पैगाम लाते हैं। झूमना...नाचना ...गाना-जिंदगी के हर गम को ’छंग’ और ’अराक’ की दावतों में उड़ाना। यही खासियत है इन मेलों, त्योहारों की और स्पीतियन लोगों की। यह मेला इनकी जिंदगी का सुनहरा पहलू तो है ही साथ ही इनके व्यापार का जरिया भी, इनका सबसे विख्यात मेला लादरचा किब्बेर के पास हर साल मनाया जाता है। यह मेला पशु व्यापार का भी सबसे बड़ा मेला है। इस मेले में गाय, खच्चर, गधे, भेड़ के अलावा याक तक की खरीदारी की जाती है। तरह-तरह के सामानों से सजी-धजी दूकानें, लोगों की चहल-पहल और सबके चेहरे पर मुस्कान.......यही है लादरचा मेले की शान। स्पीति घाटी में ज्यादातर, मेले और पर्व, मोनेस्ट्रियों से जुड़े हैं। इनमें सिस्सु, जिगजेद और गटोर पर्व प्रमुख है। ताबो मोनेस्ट्री में हर चौथे साल मनाये जाने वाला ’चख्र पर्व’ विश्व प्रसिद्ध है। दुनियाभर से लोग इस मेले में शामिल होने के लिए स्पीति घाटी पहुंचते हैं।

सरगम की सुरों पर थिरकते पैर और वादियां गूंजती है, स्पीतियन लोगों के लोकगीतों से। स्पीतियन समाज को गीत-संगीत में इतनी रूचि है, कि इनका एक इस गीत-संगीत को सदियों से कर्म की तरह पूजता है। ’बेटा’ वर्ग की पुश्तैनी परंपरा है....नृत्य, गीत और संगीत। बेटा वर्ग सात अलग-अलग नृत्यों में माहिर माने जाते हैं। इनमें गार, जाब्रू, मुकनार और दानवी नृत्य प्रमुख है। गार नृत्य महिलाए और पुरूष दोनों ही अलग-अलग करते हैं, लेकिन जाब्रू एक ऐसा नृत्य है, जिसे महिलाएं और पुरूष मिलकर एक साथ करते हैं। वहीं ’मुकनार’ नृत्य को महिलाए और पुरूष समूहों में अलग-अलग करते हैं। ग्रुथोर पर्व पर, लामाओं द्वारा किये जाने वाला, दानवी नृत्य अपने तरह का खास नृत्य है, जिसमें लामा दुष्ट आत्माओं का मुखौटा पहने हाथों में खुखरी लिए करते हैं। मुखौटा पहन कर एक और नृत्य किया जाता हैं, जिसे ’छम’ कहते हैं। यह नृत्य मोनेस्ट्रीयों में लामाओं के द्वारा किया जाता है। नृत्यों में प्रयोग होने वाले मुखौटों को भी लामा लोग स्ंवय तैयार करते हैं। छम एक धार्मिक नृत्य है और इसमें बौद्ध धर्म की विभिन्न कथाओें का समावेश देखा जा सकता है। स्पीतियन समाज के इन नृत्यों को खोवो, बांसुरी और नगाड़़ा जैसे कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों की सहायता से किया जाता है।
यह स्पीति घाटी है, वक्त के झरोखे से देखें तो यह आज भी वैसी ही है, जेसी सदियां पहले। इसी तरह स्पीतियन लोग, आज भी वैसे ही हैं, जैसे सदियों पहले थे। अपनी परंपरा को गाते-गुनगुनाते, जिंदगी के ताने-बाने पर आने वाले कल का ख्वाब बुनते सीधे-सच्चे स्पीतियन लोग और उनसे गुलजार यह स्पीति घाटी।