23 नवम्बर 2011

रस्सी में अटका अस्तित्व


संदीप मुदगल
दुनिया में जीने का अधिकार आखिर किसे है ? मानवीय आधार पर इस प्रश्न का उत्तर है, सबके पास। दूसरी ओर, चाल्र्स डार्विन के ‘सर्वाइवल आॅफ द फिटेस्ट’ सिद्धांत के बारे में आम धारणा है कि उसमें शक्ति संपन्न को ही जीने का अधिकार होने की सिफारिश की गई है। डार्विन जैसे मानवतावादी के इस सिद्धांत के बारे में यह गलत धारणा दरअसल बरसों-बरस की सोची-समझी राजनीतिक साजिश का नतीजा रही है। ‘सर्वाइवल...’ सिद्धांत से डार्विन का आशय था, बदलते समय के साथ-साथ जो प्राणी स्वयं को सकारात्मक तौर पर बदल सके, वही जिंदा रहने के लिए सबसे ‘आदर्श पात्र’ (फिटेस्ट) साबित होता है।

जीवविज्ञानी डार्विन ने यह सिद्धांत आदिकालीन प्राणिजगत के लिए दिया था, जो लाखों वर्ष पूर्व नई अस्तित्व में आई पृथ्वी पर हो रहे तीव्र भौगोलिक परिवर्तनों से बचने का प्रयास करते किसी तरह से ‘सर्वाइव’ कर रहे थे। परंतु सच यह है कि इनसान पर भी यह सिद्धांत लागू होता है, जिससे मतांतर केवल विशिष्ट मठीय पूर्वाग्रहों के दबाव में थकी हुई और पिटी-पिटाई सोच ही कर सकती है।

बहरहाल, इसमें कोई दोराय नहीं कि जीने का हक सबका है। तो फिर कत्ल जैसी घटनाएं क्यों होती हैं ? वहीं अगर कोई हत्या सिर्फ यह फलसफा आजमाने के लिए की जाए कि कोई व्यक्ति शारीरिक, बौद्धिक या आर्थिक तौर पर दूसरे से कमतर है तो उसे क्या कहा जाएगा! मात्र यही विषयवस्तु है अल्फ्रेड हिचकाॅक की फिल्म ‘रोप’ की! 

हिचकाॅक के फिल्मकार के बारे में कई धारणाएं हैं, अधिकांश लोग उन्हें सस्पेंस का बादशाह मानते हैं। यदि एक बार को हम हिचकाॅक के समूचे सिने संसार का समग्र मूल्यांकन करें तो पता चलता है उन्होंने सस्पेंस के प्रचलित माने जाने वाले फाॅर्मूले से अपनी खासी दूरी बनाए रखी थी। वह मनोविज्ञान को अधिक तरजीह देते थे। मनोविज्ञान का एक छुपा हुआ अंश सस्पेंस का बेहद होता है, परंतु मनोविज्ञान मूलतः वैज्ञानिक विषय है।

दूसरी बात, हिचकाॅक रोमांस को बहुत खूबी से उकेरते थे। उनके प्रिय विषय - खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कानून और खलनायकों से बचकर भागते नायक को नायिका विपरीत परिस्थितियों में ही मिलती है। ‘द 39 स्टैप्स’, ‘सैबोट्यूर’, ‘नाॅर्थ बाय नाॅर्थवैस्ट’, ‘नोटोरियस’, ‘रैबैका’, ‘स्पैलबाउंड’ जैसी कई फिल्मों में उनका नायक विपरीत परिस्थितियों में भी रोमांस के पल तलाश लेता है। यह भी अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक घटना ही कही जा सकती है, नायक के बचाव का एक मार्ग, जो केवल उसके लिए ही नहीं, नायिका के साथ-साथ दर्शकों के मनोविज्ञान को बचाए रखने का सामान होता है। इसके विपरीत, ‘रोप’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें कानून के साथ गंभीर खिलवाड़ तो है, परंतु वहां भी दोनों नायक (या खलनायक) और एक श्रेष्ठ नायक के बीच खींचतान नैतिकता और श्रेष्ठताबोध को लेकर दिखती है। फिल्म में रोमांस के छिटपुट अंश हैं, जो मुख्य कथा से अलग बीते कल की बात दिखते हैं। पूरी फिल्म उपरोक्त फलसफे पर आधारित है - जीने का अधिकार। 


फिल्म से जुड़े कुछ अन्य तथ्य भी हैं, पहला, यह हिचकाॅक का बनाया हुआ प्रथम रंगीन चलचित्र था। दूसरा, पूरी फिल्म एक ही घर, या कहें कि एक ही कमरे में फिल्माई गई है और तीसरा व सबसे बड़ा तथ्य कि फिल्म एक ही कैमरा एंगल से बनी है। फिल्म का तीसरा तथ्य यकीनन सबसे चौंकाऊ है। फिल्म इतिहास में आज तक जितने भी प्रयोग हुए हैं, हिचकाॅक का यह प्रयोग उन सबके बीच कहीं दब सा गया है। ‘रोप’ पर जितनी बात होनी चाहिए थी, नहीं हुई। हालांकि तकनीकी दृष्टि से यह फिल्म उससे पहले और बाद की कई फिल्मों से श्रेष्ठ है।

रोप के दोनों मुख्य पात्र समलिंगी परंतु विरोधाभासी हैं। हत्या करने वाला एक युवक उच्छृंखल (साजिश रचने वाला) और दूसरा अंतर्मुखी है। साजिश रचने वाले का कथन है कि वह हत्या एक प्रयोग के तौर पर की गई है, मरने वाला एक कमजोर व्यक्ति था इसलिए उसे जीने का कोई हक नहीं था। इस फलसफे पर शुरू में उसका अंतर्मुखी साथी हामी भरता है परंतु जब उसका साथी लाश को उसी कमरे में छुपाने की बात कहता है, जहां कुछ देर बाद एक दावत शुरू होने वाली है तो वह परेशान हो जाता है। अंतर्मुखी व्यक्ति के तौर पर फार्ले ग्रेंजर का अभिनय ध्यान देने लायक है। वह कम उम्र, अनुभवहीन, जल्द दूसरे व्यक्ति के असर में आ जाने वाला चरित्र है। पार्टी शुरू होने के साथ-साथ उसका तनाव भी बढ़ता जाता है। प्रत्येक नए व्यक्ति के आगमन पर उसके चेहरे पर एक अतिरिक्त सलवट दिखती है, जिसे कोई पकड़ नहीं पाता। परंतु उसके दोस्त को इंतजार है एक खास व्यक्ति का, जो दोनों का गुरु रहा है। दर्शनशास्त्र का अध्यापक, और अब दर्शन पर पुस्तकें प्रकाशित करता है, ‘बेहतरीन समीक्षाएं लेकिन शून्य बिक्री’, दोनों की महिला दोस्त (मृतक की मंगेतर) आमफेहम लेकिन अनजाने में सटीक और व्यंग्यात्मक तंज कसती है।

मृतक के पिता और अन्य दोस्तों के बाद दर्शन गुरु भी पधारता है, तनाव हद से ज्यादा बढ़ जाता है अंतर्मुखी हत्यारे के लिए। कुछ अंतराल के बाद उसके चेहरे के भाव धीरे-धीरे उसका गुरु पढ़ता जाता है। उधर सबको इंतजार है एक ही व्यक्ति का जो अब मर चुका है। पार्टी के बीच-बीच हंसी-मजाक, छींटाकशी और न आने वाले के लिए बेचैनी भरे संवाद सुनाई पड़ते हैं। इस बीच दर्शन गुरु अपने चेले के चेहरे के भावों को पढ़ता रहता है और खुद एक अदद निष्कर्ष पर जा पहुंचता है, लेकिन वह नतीजा क्या है, इसका खुलासा नहीं करता, शायद वह खुद पसोपेश में है कि उसका शिष्य तनावग्रस्त क्यों है, या वह सबकुछ जान गया है, या वह अपने चेले के तनावग्रस्त चेहरे में उसी के अतीत का कोई अंश तलाश रहा है, या इन सब से इतर, अपने चिर-परिचित ‘सनकी’ स्वरूप में किसी नए दार्शनिक अध्याय को ही लिखने का मन बना रहा है। लेकिन उसके चेहरे के भाव शको-शुबह के बढ़ते जाने को दिखाते हैं।

हिचकाॅक ने चेहरे के भावों से अभिनय बहुत ही कम अवसरों पर इससे बेहतर कराया है। इसका कारण, हिचकाॅक एक ‘एक्टर्स डायरेक्टर’ न होकर साधारण ‘स्टोरी टैलर’ थे, जिसका लक्ष्य कहानी को सीधे-सादे तरीके से कहना होता था। अभिनय की गुणवत्ता का फैसला वह दर्शकों पर छोड़ देते थे। कहना न होगा कि हिचकाॅक की फिल्में मूलतः अभिनय के लिए न होकर उनके ‘प्लाॅट्स’ और मनोवैज्ञानिक उठा-पटक के लिए याद की जाती हैं। बहुत कम अवसरों पर हिचकाॅक अभिनेताओं से इससे बेहतर अभिनय ले सके हैं और ऐसा फिल्म के एक कमरे में बंद परिवेश के कारण हुआ है।

कथानक के बारे में इतना भर बता देना भी शायद कुछ ज्यादा हो जाता है। वैसे ‘रोप’ ‘हू डन इट’ नहीं है, हिचकाॅक की अधिकांश फिल्में ‘हू डन इट’ नहीं होती। इसलिए दर्शक अधिकांशतः उनकी फिल्में देखते हुए संभावित अंत को आधे रास्ते में ही भांप लेते हैं। ‘रोप’ इस मामले में बहुत भिन्न नहीं है, लेकिन फिल्म के अंत में रहस्य के पत्ते किस तरीके से खुलेंगे, पर पर्दा पड़ा रहता है। मनोविज्ञान को पीछे छोड़ शुद्ध ढंके-छुपे सस्पेंस को उकेरने का हिचकाॅक का यह अप्रतिम प्रयास है।

तो आखिर ‘रोप’ क्या और क्यों है ? इतना ही जान लेना काफी है कि आम जनजीवन में अपने से कमतर चरित्र पर रौब डालना गाहे-बगाहे हरेक व्यक्ति का प्रिय शगल बन जाता है! यह आदत जाने-अनजाने हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन जाती है। रोप में हत्या एक रस्सी से की जाती है, एक आम इस्तेमाल की चीज। साजिश रचने वाला हत्यारा उसी रस्सी में लपेट कर कुछ पुस्तकें मृतक के पिता को भेंट करता है, एक अजीबोगरीब और हृदयहीन घटना! यह निश्चय ही एक बहुत भद्दा मजाक है, जायका बिगाड़ देने की हद तक भद्दा! रस्सी में बंधी पुस्तकों के सहारे हिचकाॅक समूची कथित सभ्यता पर सवाल दागते हैं, एक बहुआयामी सवाल! रस्सी में बंधी किताबें मानवीय विरोधाभास को दर्शाती हैं। एक आम इस्तेमाल की वस्तु और ज्ञान का पुलिंदा, मासूमियत और ज्ञान, कितनी मासूमियत और कितना ज्ञान!! यह ज्ञान किसके लिए है, मासूमियत किसकी है, ज्ञान किसके काम आएगा और मासूमियत कब तक कायम रहेगी!! सवाल दर सवाल उठते हैं। हिचकाॅक के सिने संसार में ऐसा दहला देने वाला बिंब बहुत कम देखने को मिलता है।

रोप का एक और रोचक तथ्य उसका फिल्मांकन है। जैसा कि बताया गया कि फिल्म पूरी तरह एक ही कैमरा एंगल से फिल्माई गई है। इस दृष्टि से फिल्म एक लंबा दृश्य हो जाती है, जिसमें कोई दूसरा दृश्य नहीं है। इसके बावजूद, फिल्म में कुछ दृश्य सर्वथा नए सिरे से शुरू होते हैं। प्रसिद्ध फ्रांसीसी निर्देशक फ्रांकोइ त्रुफो को दिए गए लंबे इंटरव्यू (पुस्तक रूप में प्रकाशित) में हिचकाॅक ने फिल्म के कई तकनीकी पहलुओं पर ध्यान दिलाया है। वह सबसे पहले यह कहते हैं कि फिल्म उनके लिए परंपरा से हटकर थी, वह इसे बनाने की ओर कैसे मुड़े, इसका स्वयं उन्हें इल्म नहीं, लेकिन वह ‘रोप’ को किसी कीमत पर एक असफल प्रयोग मानने को राजी नहीं। वह कहते हैं कथा 7ः30 से 9ः15 तक चलती है और दावतखाने (डायनिंग रूम) से झांकती खिड़कियों से बाहरी रोशनी आती है। धीरे-धीरे कर अंधेरा छाता है (कहानी के मूड के अनुसार) और बाहर छाते जा रहे अंधेरे को कहानी में पिरोना बहुत जरूरी था। दूसरी बात, फिल्म एक लंबा सिंगल शाॅट है।

हिचकाॅक बताते हैं कि हरेक रील के अंत में जब कैमरा रीलोड करने की बारी आती तो वह किसी पात्र को कैमरे के आगे से निकालते और जिससे कैमरे के आगे अंधेरा छा जाता और इस दौरान रील बदली जाती। दूसरे शब्दों में कहें तो कैमरे को किसी की कमीज पर गहराई से फोकस किया जाता और अगली रील को उसी किरदार की उसी मुद्रा से शुरू किया जाता था। तो कह सकते हैं ‘रोप’ यकीनन एक असफल प्रयोग नहीं है। यह मंझी हुई निर्देशकीय दृष्टि का प्रमाण है, जिसके अनेकानेक नवीन पहलू हैं।

रोप मंच पर खेला गया एक नाटक है, जिसे फिल्म में तब्दील करते समय हिचकाॅक ने नाटक की शर्तों को सख्ती से पूरा किया है। ‘डायल एम फाॅर मर्डर’ में वह नाटक की शर्तों को तोड़ देते हैं, लेकिन यहां कथानक में ही ऐसी गुंजाइश नहीं है कि वह अपनी ओर से कुछ बदलाव कर सकते। ‘रोप’ के कथानक की गांठें सख्ती से एक दूसरे के साथ जुड़ी हैं, जिन्हें हिलाना मुमकिन नहीं। 

कथानक एक फलसफे के सहारे जुड़ा है। सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्योंकर एक सकारात्मक कथानक नहीं बुना जा सकता ? किसी समस्या के हल की तलाश में क्यों पहले कई सारी दुर्घटनाएं अवश्यंभावी हो जाती हैं ? उन दुर्घटनाओं को रोकने के अतिरिक्त प्रयास क्यों नहीं होते ? ‘रोप’ के कथानक में नकारात्मकता का अतिरेक क्यों है ? हत्या के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रस्सी जान बचाने का काम भी कर सकती है, गिरते को संभालने या डूबते को बचाने के लिए, फिर वह रस्सी फंदा ही क्यों बनती है ? ऐसे ही कुछ मुद्दों पर दर्शन गुरु अंततः हत्यारे चेलों के साथ बहस करता है, परंतु क्या वह उन्हें कुछ समझा पाता है ? अंतिम दृश्य में उसके गोली चलाने से निर्देशक की क्या मुराद है ? क्या हिंसा रूपी अंतिम विकल्प किसी भी मुबाहिसे के दौरान बहुत जल्द आ धमकता है, या हमारा सारा दार्शनिक चिंतन अभी तक इतना परिपक्व भी नहीं हो सका कि वह समाज में जीवन-मृत्यु के अधिकार पर बहस को एक सही अंजाम देने की कूव्वत रखता हो ? दर्शन से जुड़े इन बिंदुओं को हमें पूरे सभ्यता विमर्श और राजनीतिक बहस के केंद्र में रखकर देखना जरूरी हो जाता है। ‘रोप’ के कथानक के यह दार्शनिक पहलू देर तक दर्शक को बेचैन रखते हैं।

17 नवम्बर 2011

गद्दी

आशीष पाण्डेय
पर्वतों पर दूर तक फैली धुंध.....ठंण्डी हवाओं के झोंके और सूरज के धूप की गर्माहट सदियों से लाहौल घाटी में आंख मिचैली खेल रही है। लाहौल घाटी हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले का वह हिस्सा है जहां लाहौली जनजाती के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने इतिहास को जीते चले आए हैं। तमाम कठिनाईयों के बावजूद लाहौलियों के चेहरे पर न तो शिकन है, न कोई थकान। अपनी माटी से गहरे लगाव ने इनके चेहरे पर मुस्कान बिखेरी और अपने हौसले की बदौलत यह कदम-दर-कदम जिंदगी के सफर को तय कर रहे हैं।

सन् 1960 में पंजाब के कांगड़ा जिले से कुछ हिस्सों को अलग करके उन्हें लाहौल-स्पीति के नाम से नये जिले के रूप में हिमाचल प्रदेश से मिला दिया गया। 1991 की जनगणना के अनुसार 13835 वर्ग किमी0 में फैले इस जिले की जनसंख्या 31294 है और जनसंख्या घनत्व 2 व्यक्ति वर्ग किमी0 है।

प्राचीन समय में महाराजा हर्ष की मृत्यु के बाद भारतीय राज सत्ता बिखरने लगी और लाहौल में सामंती व्यवस्था का उदय हुआ। उस समय लाहौल पर कोलोंग, गुमरांग, घांेडला और बारबोग नाम से चार जमिंदार परिवार शासन किया करते थे। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1000 ईसा पूर्व में कोलोंग परिवारों ने तीन-चार सौ वर्षों तक लाहौल पर शासन किया। परन्तु कोलोंग परिवार का वह शासन स्पीति राजा के अधीन हुआ करता था और बाद में लाहौल  भी स्पीति की तरह लद्दाख सल्तनत से जुड़ गया।

बदलते वक्त के साथ सत्ता के कई पड़ावों से गुजरते हुए 1947 में देश की आजादी के वक्त लाहौल का शासन संबंधी काम नायब तहसीलदार देखा करते थे और शासन का मुख्यालय हुआ करता था कोलांग। जब लाहौल-स्पीति को जिला बनाया गया तो कोलोंग को तहसील का दर्जा दिया गया।

लाहौल, हिन्दु और बौद्ध धर्म की सभी विरासत को समेटे सदियों से एकता की अद्भुत मिसाल रहा है। जहां बौद्ध धर्म तिब्बत से आया वहीं दूसरी तरफ हिन्दू धर्म पंजाब के प्रभाव से लाहौल की आबोहवा में घुल गया। लाहौल की पट्टन घाटी में हिन्दु आस्था से जुड़े लोग रहते हैं, जबकि रंगोली और गारा घाटियों में बौद्ध मंत्र गुंजते हैं। पट्टन घाटी में लाहौली जनजाति के लोग शिव और दुर्गा यानी शक्ति  की पूजा में विश्वास रखते हैं। लाहौल का अतीत तिब्बत से जुड़ा है और यही वजह है कि इस घाटी में बौद्ध सभ्यता और संस्कृति फलती-फूलती नजर आती है। लाहौली जनजाति के लोगों में बौद्ध धर्म मुख्यतः तीन संप्रदाय प्रचलित है- पहला- न्योंग्मापा, दूसरा- कग्युद्पा और तीसरा- गेलुग्पा। न्यींग्मापा संप्रदाय सबसे प्राचीन है। गेलुग्पा संप्रदाय बौद्ध समाज में पीत संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें लामा लोग पीली टोपी पहनते हैं। कग्युद्पा संप्रदाय भी लाहौली जनजाति के लोगों के लिए आस्था और विश्वास से जुड़ा ज्ञान मूल मंत्र है।

इसके अलावा लाहौलियों की प्रकृति के साथ अद्भुत जुड़ाव है। नतीजन लाहौली जनजाति के लोग प्रकृति की पूजा भी करते हैं। सब्दगके रूप में जहां ये पर्वतीय चट्टानों की पूजा करते हैं, वहीं गुफाओं की पूजा यह व्राॅग्मों के रूप में करते हैं। इनकी परम्परा में पेड़-पौधों को भी सम्मानीय स्थान दिया गया है। फालाएक ऐसा ही पेड़ है, जो लाहौली जनजाति में देवता की तरह पूजा जाता है। इनके अलावा लाहौली जनजाति के लोगों के अपने कुल देवता भी होते हैं। यह कुल देवता इनके घर के किसी कोने में पत्थर या खम्भे के रूप में स्थापित होते हैं। अन्य समाजों की तरह लाहौली जनजाति के लोगों में अपने धर्म की मान्यताएं जीवन का सार्वभौमिक सत्य भी है, और आधार भी।

लाहौली जनजाति समाज में जाति व्यवस्था का प्रचलन पुरातन समय से चला आ रहा है। धार्मिक आस्था के लिहाज से लाहौली हिन्दू और बौद्ध परंपरा के अनुयायी है, और इन्हीं दोनों मान्यताओं के अनुसार यहां जाति व्यवस्था का प्रचलन है। यहां जातियों के वर्गिकरण का आधार वंशावली पद्धति यानी उच्च और निम्न जाति व्यवस्था के आघार पर की गई है। उच्च जाति के ताल्लुक रखने वाले ठाकुर, स्वांगला और ब्राह्मण लोग खान-पान  और शादी-विवाह जैसे संबंध अपनी ही जाति में बनाते हैं। इन उच्च जातियों में ब्राह्मण  वर्ग केवल पट्टन घाटी तक सीमित है और शेष लाहौल में इनकी उपस्थिति  नाम मात्र की भी नहीं है। पिछड़ी जातियों में वर्गीकरण का निर्धारण उनके पेशे के आधार पर हुआ है। लाहौली जनजाति समाज में लोहार लोगों को डोम्बाबुनकरों को बेडाऔर बारारस। धरकार को वालरसकहते हैं। उच्च जनजातियों के खेतों पर मजदूरी करने वाले भूमिहीन मजदूरों को हेस्सीका नाम दिया गया है।

लाहौली जनजाति में अनेक तरह की भाषाओं का चलन है। बौद्ध और हिन्दू संस्कृति के मुहाने पर बसी लाहौल घाटी की जुबान में भी मिली-जुली खुशबु आती है। करीब आधा दर्जन बोलियों के जरिये अपनी बातों को कहने वाले लाहौली जनजाति के लोगों की प्रमुख भाषाएं भोटी और चिनाली या डोम्बाली हैं। भोटी भाषा, पर तिब्बती भाषा का प्रभाव है वहीं चिनाली या डोम्बाली संस्कृत भाषा की उपज लगती है। इन भाषाओं का प्रभाव भी क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग दिखाई पड़ता है। भोटी भाषा लाहौली की रंगोली और गारा घाटियों में बोली जाति हैं। वैसे इन इलाकों में और बोलियां प्रचलित हैं, जैसे पुनान, हिनान और चिनाली। पट्टन घाटी में मनचाड़ का प्रचलन बहुतायत है।

लाहौल घाटी में घरों का निर्माण और इनकी शैली काॅलोनी की तरह होती है। मकानों का समूह, ब्लाक के जैसा होता है, ताकि बर्फबारी के दिनों में लोगों का जुड़ाव एक-दूसरे से बना रहे। लाहौली जनजाति के लोगांे का घर तीन मंजिल तक बने होते हैं। घर के भूतल का प्रयोग पशुओं के रहने के लिए किया जाता है और इन्हीं कमरों का प्रयोग पशुओं के चारा रखने के लिए भी किया जाता है। घर की उपरी मंजिल का प्रयोग लाहौली परिवार अपने रहने के लिए करते हैं। उपरी मंजिल पर एक भीतरी कमरा होता है, जिसका प्रयोग जाड़े के दिनों ठंड से बचने के लिए होता है। बौद्ध संप्रदाय को मानने वाले लाहौली लोगों के मकानों के उपरी मंजिल पर इनके पूजा का कमरा होते है, जिसे चोखंाग के कहते हैं। लाहौल घाटी के निचले हिस्सों में मकान के निर्माण की शैली लगभग समान होती है, लेकिन इन मकानों में रहने के उपरी घाटी के मकानों की अपेक्षा बड़े, खुले और हवादार होते हैं और इन मकानों  में रौशनी के भी बेहतर इंतजाम होते हैं, जो उपरी मंजिल के मकानों में उपरी मंजिल पर बरामदे का होना भी बड़ा जरूरी माना जाता है। इन घरों पर चूने से सफेदी की जाती है और कहीं-कहीं रंगों का प्रयोग भी दिखाई देता है। घर के भीतरी हिस्सों की सजावट लाहौली जनजाति के लोग अपनी परंपरा के अनुसार करते हैं। कमरों की साज-सज्जा में पूजा घर यानी चोखागका विशेष स्थान है। चोखागमें बुद्ध के जीवन और दर्शन से संबंधित तमाम पेंटिगों के साथ-साथ थंका पेंटिग की मौजूदगी अवश्य रहती है।

लाहौली समाज में संयुक्त परिवार की अवधारणा प्राचीन समय से चलती आ रही है। चाहे वह हिंदू समाज हो या बौद्ध समाज। उच्च जनजाति हो या निम्न जनजाति से। सभी परिवार एक ही छत के नीचे रहते हैं। लाहौल के रंगोली और गारा घाटियों में संयुक्त  परिवार का प्रचलन हैं। परिवार में न केवल माता-पिता, पुत्र-पुत्री बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची  और उनके बच्चे भी एक साथ रहते हैं। पट्टन घाटी में पारिवारिक संरचना थोड़ी अलग सी है।  यह परिवार में बड़े लड़के की शादी के बाद पिता घर से संन्यास ले लेता है, और उस घर को त्याग कर दूसरे घर में रहने चला जाता है। संपति उत्तराधिकार के मामले में लाहौली जनजाति भारतीय सभ्यता के काफी करीब नजर आते हैं। लाहौली जनजाति में पिता की मृत्यु के बाद सम्पति को सभी बेटों में बराबर-बराबर बांट दिया जाता है। यदि कोई पुत्रहीन हो तो उसकी मृत्यु के बाद संपति को अन्य भाईयों में बाट दिया जाता है, परन्तु मृत व्यक्ति की पत्नी है तो मृतक की संपत्ति पर उसका अधिकार होता है।

लाहौली जनजाति में सगोत्रीय विवाह नहीं होते परन्तु सजातीय विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। लाहौल की पट्टन घाटी में ब्राह्मण मौसेरी, ममेरी और फुफेरी बहनों से वैवाहिक संबंध नहीं बनाते, लेकिन अन्य जातियों में ऐसे भी विवाहों को मान्यता है। लाहौली जनजाति में तीन प्रकार के विवाह प्रचलित हैं- पहला-मोथे विवाह, दूसरा-कोवांची विवाह और तीसरा-कुंची विवाह। मोथे और कोवांची विवाह लगभग एक जैसे होते हैं और दोनों में माता-पिता की मंजूरी होती है। मोथे विवाह केवल  भव्यता के आधार पर कोवांची से भिन्न होता है। कुंची विवाह अन्य घाटियों की अपेक्षा गारा और रंगोली में ज्यादा प्रचलित है। कुंची आधुनिक समाज के प्रेम विवाह के जैसा है, जिसमें लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद करते हों। इसके बाद लड़का, लड़की की सहमती से उसका छद्म अपहरण कर लेता है। बाद में दोनों पक्षों की रजामंदी से लड़के और लड़की का विवाह होता है, जिसे कुंची विवाह कहा जाता है।

विवाह की विधि चाहे मोथे हो या कुंची हो, इनकी पारंपरिक पेय छंग और अराक इसमें जरूर शामिल रहता है। कोवांची विवाह लाहौली समाज का ऐसा विवाह है, जिसमें ज्यादा ताम-झाम नहीं होता। इस विवाह में बहुत ही कम लोग शामिल होते है, और यहां तक की इस विवाह में दूल्हा तक अपनी बारात में नहीं जाता। दूल्हे की जगह उसकी छोटी बहन बारात लेकर जाती है, और शादी के बाद दुल्हन की विदाई करा कर चली आती है। लाहौली समाज में महिलाओं की स्थ्तिी पुरूषों के समकक्ष ही है। महिलाएं केवल घरेलू कामों तक ही नहीं सिमटी होती है, बल्कि यह पुरूषों के साथ खेती-बाड़ी में भी बखूबी साथ देती है और घर के सभी फैसलों में महिलाओं की राय बड़ी मायने रखती है। प्रायः सभी समाज में महिलाओं को गहनों से बेहद लगाव होता है और इस मामले में लाहौली महिलाएं भी कम नहीं होती हैं। किरकिस्टीइनका खास गहना होता है, जो सोने या चांदी का बना होता है। यह किरकिस्ती इनके सिर की शोभा बढ़ाता है, वैसे सिर पर पहनने वाला एक और गहना इनके बीच काफी लोकप्रीय है, जिसे पोशाल कहते हैं। लाहौली महिलाएं गले में चांदी की जंजीर पहनती है, जिसे 'न्यान्ग्थांग' कहते हैं। इसके अलावा इन नाक और कानों की सुंदरता बढ़ाते हैं फुलीऔर अलोंग।

लाहौली पुरूष भी उंगलियों में अंगूठी, कानों में मुरकी और गले में क्यांटी पहनने का शौक रखते हैं। लाहौली पुरूषों का पारंपरिक परिधान इनके भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बना है। ऊनी कपड़े का पायजामा, कपड़े का ही गाउन की तरह का कोट, कमरबन्द जैसा पटका, ऊनी  सदरी, मोजे, पुआल के जूते और सिर पर गिलगिट जैसी टोपी। लाहौली महिलाएं पायजामा और कुर्ता पहनती हैं। कुर्ते के ऊपर गाउन की तरह डुग्पोपहनती है, जिसकी लंबाई घुटनों तक होती है और इनके किनारों पर बारीक कढ़ाई होती है। महिलाएं डुग्पोंको कसा रखने के लिए कमर पर पटका भी बांधती है। पैरों में ऊनी मोजे और पुआल के बने जूते होते हैं। जिसे पुलकहते हैं। भोटी महिलाओं को छोड़कर स्वांग्ला, शिप्पी और लोहार जनजाति की महिलाएं गोल टोपी पहनती हैं।

लाहौली जनजाति के खान-पान में भी भारतीय और तिब्बती परंपरा के असर दिखाई देते हैं। लाहौली लोगों के सुबह के नाश्ते को शेमाकहते हैं, जिसमें थुंग्पानामक व्यंजन खाया जाता है। थंग्पा जौ के भुने हुए आंटे से बनता है। यह शाकाहारी और मांसाहारी दोनों विधियों से बनाया जाता है, फर्क सिर्फ एक है, एक में सब्जी मिली होती है और दूसरे में मांस। लाहौलियों के दोपहर के भोजन को छिक्किनकहते हैं। छिक्किनमें जौ के भुने हुए आंटे की रोटियों के साथ आलू की सब्जी होती है। आलू लाहौलियों का पारंपरिक खाना नहीं है, लेकिन गुजरते वक्त के साथ आलू ने भी लाहौली थाली में अपना स्थान बना लिया है। छिक्किन खत्म होने के बाद बारी आती है छांछ की। छांछ लाहौली लोगांे के दोपहर के जरूर शामिल होती है। रात के खाने को लाहौलियों ने यंग्स्किन नाम दिया। रात का यह खाना छिक्किन यानी दोपहर के खाने की तरह ही होता। इसमें केवल छांछ को नहीं शामिल किया जाता है। जाड़े के दिनों में इन्हें मांस मिलने में कठिनाई नहीं हो, इसके लिए ठंड आने से पहले ही मांस को सुखा कर रख लेते हैं। मांस के संरक्षण की यह विधि लाहौलियों के परंपरा की विशेषता है।

इसके अलावा इनके खान-पान में दो और महत्वपूर्ण चीजें शामिल होती हैं, जो इनके दैनिक जीवन का हिस्सा तो है ही , साथ ही मेहमानवाजी के लिए भी बखूबी  इस्तेमाल होती है मक्खन की नमकीन चाय और जौ से बनी इनकी अपनी बीयर यानी छंग और अराक। मक्खन की नमकीन चाय के साथ-साथ छंग और अराक पीने का कोई निश्चित समय नहीं होता। दिल जब करे बैठ जाए, हाथों में प्याला.....मक्खन की चाय...या छंग ...या अराक।

लाहौलियों की रसोई के बर्तन भी इनके अतीत से वर्तमान तक के सफर दास्तां बयां करते हैं। पुराने समय में लाहौली जनजाति के लोग पत्थरों के बर्तन का प्रयोग करते थे। उन बर्तनों में कुंपडअपनी विशेष पहचान रखता था। समय के साथ-साथ बर्तनों में भी परिर्वतन आने शुरू हुए और बर्तनों ने पत्थर की बजाय लकड़ी की शक्ल ले ली। लकड़ी के ऐसे ही बर्तनों में 'डांगमों' का प्रयोग नमकीन और मक्खनियां चाय बनाने के लिए किया जाता है।

आज बर्तनों को वर्तमान स्वरूप पत्थर और लकड़ी को छोड़कर धातु  का रूप ले चुका है। दुनिया के रंग ढंग में ढलते हुए लाहौली रसोई में भी कांसे, पीतल, अल्यूमिनियम और स्टील के बर्तन दाखिल हो चुके हैं, जो किसी भी घर के लिए सामान्य हैं। परन्तु लाहौली जनजाति के लोगों ने अपनी जीवटता और मेहनत के बल पर पत्थरों से अन्न उपजाया है। लाहौल घाटी में आलू, होय, कुथ, जौ, मेथी और गेहूं की खेती प्रमुखता से की जाती है। लाहौल में केवल बीस फीसदी जमीन ही कृषि कार्यों के लिए है। उनमें जमीनों को भी दो भागों में बाटा गया है। एक तो वह जहां सिंचाई हो सके और दूसरी जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है। लाहौल के लिए मौसम भी एक बड़ी चुनौती है और इस चुनौती का डटकर मुकाबला करते हुए लाहौली एक मौसम में एक ही फसल पैदा कर पाते हैं। खेती के जी तोड़ मेहनत में भी लाहौली गाना-गुनगुनाना नहीं भूलते हैं। फसलों की बुआई हो या कटाई लाहौली झूमते हैं....गाते हैं....और जश्न मनाते हैं।

पशुपालन लाहौली जनजाति का हिस्सा है। लाहौली लोग याक याक, खच्चर, गाय, भेड़ और बकरे -बकरियों का पालन करते हैं। इन पशुओं में भेड़ और बकरियों का प्रयोग मांस प्राप्त करने के लिए किया जाता है। ठंड भरे जाड़े के दिनों में लाहौली जनजाति के लोग जब घरों से बाहर नहीं निकलते, तो उनका पसंदीदा काम होता है कपड़ो की बुनाई। लगभग हर लाहौली घर में हथकरघों पर बुनाई होती है। भेड़ के ऊन से लाहौली लोग अपने पहनावे के लिए गरम कपड़े तैयार करते है।परंपरागत शैली के कपड़े इनकी सभ्यता के भी परिचायक हैं। मनोरंजन और खेलकूद हर किसी समाज का अहम हिस्सा होता है। लाहौली लोगों  के मनोरंजन की अपनी खास विधाएं है। इनके खेलों पर भारतीय और तिब्बती परंपरा की विशेष छाप दिखाई देती है। शतरंज की तरह खेले जाने वाला 'त्सोग्बे' लाहौलियों का पसंदीदा खेल है। शतरंज की तरह ही इस खेल में राजा वजीर सिपाही से दिमागी कसरत की जाती है। त्सोग्बे की तरह ही गोटों खेल भी लाहौलियों को खूब रास आता है। पत्थरों की गोटियों से खेले जाने वाला यह खेल भी शतरंज की तरह खेला जाता  है।
             
इंसानी जिंदगी में खुशियों के रंग भरते हैं मेले और त्योहार। लाहौलियों का सबसे पसंदीदा मेला है लदर्चा। यह वार्षिक मेला अपने विविध आयोजनों मसलन पशुव्यापार, नृत्यसंगीत और पारंपरिक वस्तुओं के खरीद-बिक्री का महत्वपूर्ण माध्यम है। भगवान शिव के त्रिलोकनाथ मंदिर के समीप पोरीमेला आस्था और विश्वास की अमिट छाप लिए हुए है। वहीं सिससुमेले में बौद्ध मान्यताओं के दर्शन होते हैं। इसके अलावा  फागलीऔर हालदापर्व भी लाहौली जनजाति के प्रमुख मेलों में शामिल हैं।

लाहौली समाज में लोग तमाम मुश्किलों को झेलते हुए भी खुश रहना जानते हैं। नृत्य और संगीत से लाहौली जनजाति का लगाव सदियों पुराना है। खुशी का कोई भी अवसर बिना नृत्य और संगीत के अधूरा होता है। लाहौली समाज में स्त्री और पुरूष दोनों ही नृत्य की विधा में पारंगत होते हैं। छंग और अराक, नृत्य संगीत का ऐसा समां बांधता है कि सारी दुश्वारियों को भूल लाहौली लोग नाचते और झूमते हैं। बांसुरी की धुन और नगाड़ो की छाप पर पुरूष और महिलाएं अलग-अलग समूह में शेहनीनृत्य करते हैं।

लाहौली जनजाति में बौद्ध मान्यता पर आधारित  छमनृत्य भी अपनी खास पहचान बनाये हुए हैं। छमनृत्य मुखौटा लगा कर किया जाता है। यानी नृत्य करने वाले मुखौटों के द्वारा दूसरे का रूप धारण करके छमको जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इसके अलावा लाहौलियों में धुरेनृत्य भी खासा प्रचलित है। इस नृत्य में नर्तक अर्द्धगोलाकार और गोलाकार घेरा बना कर आकर्षक नृत्य की प्रस्तुती करते हैं। यह नृत्य मुख्य रूप से गायन पर आधारित है और इसमें वाद्ययंत्रों के संगीत अभाव होता है। इस नृत्य में गायन की शैली इतनी प्रभावशाली होती है कि संगीत नहीं भी होने पर असर नहीं पड़ता धुरेनृत्य में रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों पर नाट्य नृत्यों की प्रस्तुती की जाती है।           

14 नवम्बर 2011

प्रेम


शमशेर बहादुर सिंह

द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूं प्यार
रूप नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूं प्यार
सांसारिक व्यवहार न ज्ञान
फिर भी मैं करता हूं प्यार
शक्ति न यौवन पर अभिमान
फिर भी मैं करता हूं प्यार
कुशल कलाविद् हूं न प्रवीण
फिर भी मैं करता हूं प्यार
केवल भावुक दीन मलीन
फिर भी मैं करता हूं प्यार.

मैंने कितने किए उपाय
किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम
सब विधि था जीवन असहाय
किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम
सब कुछ साधा, जप, तप, मौन
किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम
कितना घूमा देश-विदेश
किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम
तरह-तरह के बदले वेष
किन्तु न मुझ से छूटा प्रेम.

उसकी बात-बात में छल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
माया ही उसका संबल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह वियोग का बादल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
छाया जीवन आकुल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
केवल कोमल, अस्थिर नभ-सी
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह अंतिम भय-सी, विस्मय-सी
फिर भी है वह अनुपम सुंदर.

11 नवम्बर 2011

स्पीति : शब्द,संस्कृति और समाज

आशीष पाण्डेय

हिमालय... जहां चोटियों ने ओढ़ी है, बर्फ की चादर जहां धूप गुनगुनाती...गाती हुई पिघलाती है, इन्हें एक नर्म एहसास के साथ। यह स्पीति घाटी है। हिमालय की गोद में बसी स्पीतियन लोगों की सरजमीं।

स्पीतियन लोगों का एक लंबा इतिहास है, जो वक्त-दर-वक्त इनके साहस और मजबूत इरादे से बनता चला आया है। इनका यह इतिहास सदियों से बर्फ की ठंडी तासीर के साथ-साथ धूप के मखमली छूवन से जवान हुआ है। ऐसी ठंड भरी जगह को अपना ठौर-ठिकाना बनाया स्पीतियन लोगों ने। स्पीति को संसार का जीवाश्म/फासेल गार्डेन भी कहा जाता है। स्पीति की सरहदें एक तरफ तो जम्मू-कश्मीर को छूती है, वहीं दूसरी तरफ स्पीति की सीमाएं खुद को तिब्बत की ड्योढ़ी पर समेट लेती हैं।

इतिहास के आइने में देखें तो स्पीति पर सेन राजा का शासन हुआ करता था। इस दौरान वक्त तेजी से करवटें बदलता रहा और नवीं शताब्दी में तिब्बत साम्राज्य का उदय हुआ, इसके साथ ही एक नई दास्तां शुरू हुई लद्दाख सल्तनत की। महाराजा स्काईद-लदे ने इस सल्तनत की बुदियाद रखी। इसी सल्तनत के तीसरी पीढ़ी के राजा इस्काईद-लदे नी माम्गों ने लद्दाख की सरहदों को बढ़ाते हुए इसमें लाहौल और स्पीति को मिला लिया।

राजा स्काईद-लदे नी माम्गों ने यहां के सेन राजा को स्पीति के तीन गांव दिये और अपने प्रशासक के तौर पर कुछ परिवारों को स्थायी अधिकार दे दिये। आगे चलकर यही प्रशासक  ‘नोनो‘ कहलाए। वैसे अगर देखा जाए तो लद्दाख राजा के अलावा यहां मुगल और पंजाब के राजा रंजीत सिंह भी आए, और शासन किया, लेकिन स्पीतियन लोगों ने किसी की गुलामी ज्यादा दिनों तक नहीं सही।

सन् 1947 में देश की आजादी के बाद यह पंजाब के कांगड़ा जिले का हिस्सा हुआ करता था। सन् 1960 में यह लाहौल- स्पीति नामक नए जिले के रूप में, एक नए प्रदेश यानी हिमाचल प्रदेश के साथ जुड़ा। बाद में स्पीति को सबडिविजन बनाया गया और काजा बना इस सबडिविजन का हेडक्वार्टर। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार 13835 वर्ग किलामीटर में फैले इस जिले की जनसंख्या 31294 थी और जनसंख्या घनत्व 2 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर।

स्पीति यह एक ऐसी घाटी है जहां जिन्दगी जीने के लिए जी-जान से मशक्कत करनी पड़ती है। स्पीतियन लोगों की तकदीर उनके हाथों की लकीरों में नहीं होती बल्कि उनकी तकदीर उन्हें अपनी मेहनत, हौसले और बुद्धम शरणम्  गच्छामी की प्रेरणा से मिलती है। इनके जीवन का मूलमंत्र है भगवान बुद्ध का तप..... ज्ञान और दर्शन।

स्पीतियन लोगों के लिए यह बौद्ध मान्यताएं केवल आस्था और विश्वास ही नहीं, बल्कि उससे बढ़कर उनके रोजमर्रा की जिंदगी है। सदियों से बौद्ध परम्परा की गवाह रही यह स्पीति घाटी अपनी कई मोनेस्ट्रियों के लिए देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपना विशेष स्थान रखती है। यहां कई मोनेस्ट्रियों ऐसी हैं, जिनकी स्थापना सदियों पहले की गई थी। इनमें ताबो, ‘की‘ और धनकर मोनेस्ट्यिां प्रमुख हैं।

ताबो मोनेस्ट्री की स्थापना लगभग दशवीं शताब्दी में राजा येश्हे ओब ने की थी, और अभी बीते वर्षों में यानी सन् 1996 में इस मोनेस्ट्री ने अपने जीवन के 1000 वर्ष पूरे किये हैं। स्पीति की यह मोनेस्ट्री कला और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। सागर तल से करीब दस हजार फीट की उचाई पर स्थित इस मोनेस्ट्री का ऐतिहासिक महल इसलिए भी विशेष है क्योंकि हिंदू और बौद्ध सभ्यताएं एक-दूसरे को जानने के लिए यहां आया करती थीं। इस मोनेस्ट्री के सामने कई छोटी-बड़ी गुफाएं हैं, जो ताबो मोनेस्ट्री के इतिहास की गवाह रहीं हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब सदियों पहले यहां ताबो मोनेस्ट्री का निर्माण नहीं हुआ था। तब दूर-दूर से आये लामा लोगों ने इसी गुफा में रहते हुए ताबो मोनेस्ट्री का निर्माण किया था। मोनेस्ट्री की बनावट पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार है, मोनेस्ट्री के भीतरी दीवारों पर भगवान बुद्ध के जीवन, ज्ञान और दर्शन को थंका चित्रकला द्वारा प्रदर्शित किया गया है। बौद्ध शिक्षा का सदियों से प्रचार-प्रसार कर रही यह ताबो मोनेस्ट्री हमारी अमूल्य और ऐतिहासिक धरोहर है।    
                                                                                                                                                                                                                                                    भगवान बुद्ध सदियों पहले इस भूमि पर आए और भक्ति की ऐसी ज्योत जला गए, जो आज भी स्पीति घाटी को ध्रुव तारे की तरह प्रकाशित कर रही है। कुछ ऐसे ही प्रकाश बिखेर रही है ‘की‘ मोनेस्ट्री। सागर तल से करीब 13500 फीट की उचाई पर काजा सबडीविजन के पास इस मोनेस्ट्री में लगभग 300 लामा अपनी धर्मविद्या और पाली की शिक्षा ले रहें हैं। धर्म के साथ कला का अद्भुत् समायोजन इस मोनेस्ट्री के निमार्ण शैली में दिखाई देती है। मोनेस्ट्री की दीवारों पर भगवान बुद्ध सहित अन्य देवी-देवताओं को दुर्लभ चित्रों और लिपियों के जरिए दर्शाया गया है। यह मोनेस्ट्री इतनी पुरानी है कि इसका निर्माण कब हुआ यह बता पाना बड़ा ही मुश्किल है। धर्म, ज्ञान और दर्शन को जानने के साथ-साथ यहां थंका चित्रकला की विश्वप्रसिद्धि कृतियों को देखा जा सकता है।

वैसे तो पूरी स्पीति घाटी अपने मोनेस्ट्रीयों के लिए प्रसिद्ध है, परन्तु उनमें धनकर मोनेस्ट्री अपनी खास पहचान रखता है। अगर हम धनकर मोनेस्ट्री के बीते इतिहास पर नजर डाले तो सातवीं और आठवीं शताब्दी के मध्य बने किलेनुमा मोनेस्ट्री की बड़ी अनोखी दास्तां है। उस जमाने में स्पीति वासियों के पास आत्मरक्षा की तकनीकें नहीं थी और न ही संचार के कोई साधन।

इसलिए सागर तल से 12774 फीट उंचे इस मोनेस्ट्री में आग जलाकर लोगों को इकठ्ठा करते थे और यहीं छुपकर अपनी जान बचाते थे। अगर आज स्पीति के मूललोग मौजूद है तो इसका श्रेय कहीं न कहीं धनकर मोनेस्ट्री को अवश्य जाता है। यहां भगवान बुद्ध की ध्यानमय मूर्ति और थंका चित्रकला देखने योग्य हैं। इस मोनेस्ट्री से कुछ ही दूरी पर एक सुंदर झील है, जो इसकी आध्यात्मिकता को शिखर की उंचाई प्रदान करता है। यही वजह है कि स्पीतिवासियों के जीवन में बुद्ध का ज्ञान रचा-बसा है।

सीधे और सच्चे हृदय वाले स्पीतियन लोगों की जिंदगी बर्फीली हवाओं के थपेड़ों से गुजरते हुए इसी घाटी में आने वाले कल के सपने देख रही है। सपनों की अपनी जुबां या कहें उनकी अपनी भाषा होती है। ठीक उसी तरह स्पीतियन लोगों की अपनी भाषा है...... ‘भोटी‘। स्पीतियनों की भाषा ‘भोटी’ तिब्बती से इतनी मिलती-जुलती है कि इसे तिब्बतन का दूसरा रूप भी कहते हैं। भोटी लाहौल और स्पीति में समान रूप से बोली जाती है, लेकिन भौगोलिक परिवेश और रहन-सहन में अंतर की वजह से दोनों जगहों की भाषाओं में थोड़ा अन्तर है। पाली भाषा जिसमें मूलतः बुद्ध साहित्य और उपदेशों की रचना हुई है। भोटी भाषा से काफी भिन्न है, लेकिन भोटी भाषा ने पाली मूल के कुछ शब्दों को अपनाया भी है।

समाजिक संरचना के तौर पर स्पीतियन लोगों के गांव बसाने का तरीका भी अपनी तरह का है। घरों से मिलकर गांव बनते है, और कई गांवों को मिलाकर कोठियां बनती हैं। पूरी स्पीति घाटी में पारंपरिक रूप से पांच कोठियां हैं। स्पीतियन समाज की जीवन शैली उन्हें अपने विरासत से मिली है। स्पीतियन लोग जाति व्यवस्था हिन्दू मूल की प्रवृत्ति है और बौद्ध धर्म ऐसे किसी मान्यता के लिए कोई जगह नहीं है। परन्तु सामाजिक स्तर पर वर्ग संरचना जरूर है। वर्ग के तौर पर स्पीतियन लोग दो वर्गों में विभाजित हैं। पहला...उच्च वर्ग और दूसरा...निम्न वर्ग। उच्च वर्ग में भी तीन अलग-अलग स्तर होते हैं...नोनो, खांग्चेन और खांग्चांग।

इनमें नोनो सबसे उच्च दर्जे के होते हैं, जिनके पूर्वज कभी स्पीति पर शासन किया करते थे या यहां के वजीर रहे थे। खांग्चेन उन लोगों का वर्ग है, जो पुराने समय से बड़े मकानों में रहते आये हैं, और इसी तरह खांग्चांग ऐसे वर्ग में आते हैं, जिनके मकान खांग्चेन वर्ग से छोटे होते हैं। इनके मकानों में कौन से बड़े श्रेणी में आते हैं, और कौन से छोटे श्रेणी में, इसका निर्धारण स्पीतियन लोग अपनी परंपरा के आधार पर करते हैं।

निम्न वर्ग में दस्तकार, पेशेवर लोहार और भूमिहीन किसान आते हैं। इन्हें जोव और बेटा कहते हैं। जोव लोग पुश्तैनी रूप से लोहारी का काम करते हैं। वहीं बेटा लोगों का मुख्य पेशा नाच-गाना है। सदियों से इन विरान वादियों को गुनगुना कर गाकर हंसते-हंसाते आए हैं। साल के जिन दिनों में यह अपने पेशे से दूर रहते है, उस समय उच्च वर्गों की खेतिहर मजदूरी पर जीवन यापन करते हैं।

स्पीतियन लोगों के घर, दो से तीन मंजिल के होते हैं। इन घरों को कांगचिंपा कहा जाता है। इन घरों में भूतल का प्रयोग जानवरों को रखने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इस भूतल का प्रयोग उन पशुओं के चारा रखने और ईधन रखने के लिए भी किया जाता है। स्पीतियन परिवार उपरी मंजिल का प्रयोग अपने रहने के लिए करते हैं। इस मंजिल पर तीन कमरे होते हैं और उन कमरों के साथ एक बरामदा भी होता है। यह बरामदा, दरवाजों के जरिए तीनों कमरों के साथ जुड़ा होता है। इन तीनों कमरों में बीच के कमरे का प्रयोग परिवार के सदस्य रहने के लिए करते हैं, जबकि दाहिने कमरे का प्रयोग बतौर पूजा घर के रूप में होता है। स्पीति भाषा में इस घर को ’चापेल’ कहतें हैं। बायें कमरे का प्रयोग, स्पीतियन लोग, भोजन कक्ष के रूप में करतें हैं। घर अगर बड़ा है तो अन्य कमरों का प्रयोग परिवार के सदस्य के रहने के लिए करते हैं। इन घरों को बनाने के लिए स्पीति के लोग बहुत हद तक अपने भौगोलिक परिवेश पर निर्भर रहतें हैं।

घरों को बनाने में लकड़ियों का प्रयोग ज्यादा होता है, क्योंकि लकड़िया इन्हें आसानी से मिल जाती हैं। मगर घर की दीवारों के मामले में स्पीतियन लोगों की सेाच थोड़ी हटकर है। दीवार बनाने के लिए यह पत्थरों का प्रयोग नहीं करते, बल्कि पत्थरों की जगह कठिन परिश्रम से बनाऐ गए ईटों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। इसके पीछे स्पीतियन लोगों का मानना है कि पत्थरों की बजाय ईंटों से बने घर ज्यादा गर्म होतें हैं। इन घरों के लगभग पास ही छोटे घरों का प्रयोग, वह माता-पिता करते हैं, जो अपने बच्चों की शादी-विवाह करके, सारे दायित्वों से, मुक्त हो चुके होते हैं।

स्पीतियन घर, शिल्प और कला के अद्भुत उदाहरण हैं। इनमें नोनो वर्ग के घर, साज-सज्जा में सबसे आगे हैं। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार, विभिन्न रंगों से अपने घर की पुताई कराते हैं और साथ-साथ घरों में प्रयोग हुई लकड़ियों पर सुंदर नक्काशी कराते हैं। चापेल यानी पूजा घर। आस्था और विश्वास का स्थल। स्पीतियन लोग इस कमरे की साज-सज्जा में बौद्ध मान्यताओं का खासा ख्याल रखते हैं। चापेल को घर की महिलाओं द्वारा झूमर और झालर बनाकर, विशेष रूप से सजाया जाता है। इसके साथ ही मोनेस्ट्रियों से लाई गई थंका पेंटिंग से चापेल यानी पूजाघर आध्यात्मिक रूप दिया जाता है।

 सभी स्पीति वासियों के घर पर एक झंडा होता है,जिस पर काले याक की पूंछ बंधी होती है। इसके पीछे यहां के लोगों का यह मानना है कि यह झंडा बुरी नजरों और दुष्ट आत्माओं से इनकी रक्षा करता है। स्पीतियन  समाज में संयुक्त परिवार का प्रचलन है। लेकिन पीढ़ियां जैसे-जैसे जवान होती हैं, परिवार टूट कर बिखर जाते हैं। इसका मूल कारण इनकी अपनी प्रथा मेुं छुपा हुआ है। किसी परिवार में जब सबसे बड़े बेटे की शादी होती है, तो माता-पिता उस बेटे को अपनी सारी जिम्मेदारी देकर स्वतंत्र हो जाते हैं। इसके बाद वह अपने मुख्य घर के करीब ’कांग-छुंग’ में रहने के लिए चले जातें हैं। परिवार के अन्य सदस्य, मसलन छोटे भाई-बहन चाहें तो बड़े भाई के साथ रह सकतें हैं या फिर माता-पिता के साथ भी जा सकते हैं। लेकिन छोटे भाई-बहन इन दोनों जगहों की बजाय बौद्ध मोनेस्ट्री में चले जातें हैं।

स्पीतियन समाज में अधिकांश लामा यानी पुरूष सन्यासी और चेमो यानी महिला सन्यासिनी, ऐसे ही घरों के सदस्य होतें हैं, जो अपने परिवार के बिखरने के बाद भगवान बुद्ध की शरण में आ जाते हैं। स्पीतियन परिवार में महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक है। महिलाएं सामान्य रूप से घर के अंदर और बाहर दोनों जगह समान रूप से काम करती हैं। सिलाई, बुनाई, खाना पकाने के साथ-साथ कृषि कार्यों में भी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पारिवारिक मसलों पर निर्णय लेने का अधिकार तो महिलाओं के पास नहीं होता, परन्तु सभी मसलों पर उनकी राय बहुत अहम होती है। 

वर्ग विभाजन स्पीतियन समाज के आपसी सम्बन्धों और शादी-विवाह में काफी मायने रखती है। मसलन नोनो परिवार की शादियां आज भी नोनो परिवारों में ही होती हैं। मगर नोनो परिवार आज केवल गिनती के रह गए हैं। इसलिए, वह अपने वैवाहिक संबंध, खंाग्चेनों परिवारों में भी बनाते हैं। लेकिन इसमें भी नोनो परिवार अपनी बेटियों की शादी उनके घरों में करते हैं, मगर खांग्चेगों परिवार की बेटियों की शादी अपने परिवार में नहीं करते। खांग्चागों और खांग्चेगों अपनी शादियां अपने-अपने वर्गों में ही करते हैं। स्पीतियन समाज में शादियां दो तरह से होती हैं। एक-जो समाज की रजामंदी से होती है और दूसरा-प्रेम विवाह, जिसे ’खादुम’ कहतें है।

पारंपरिक शादी में युवक और युवती के परिवार ज्यातिषियों से मिलते हैं। उनसे विवाह के बारे में परामर्श करते हैं। इन ज्योतिषियों को स्पीति भाषा में झोया कहतें हैं। इसके बाद युवक का पिता विवाह प्रस्ताव लेकर युवती के माता-पिता से मिलता है। विवाह प्रस्ताव मंजूर होने पर सगाई मानी जाती है। इस रस्म को ’मिंगे और छंग’ कहतें हैं। इस मौके पर पारंपरिक शराब ’छंग’ और ’अराक’ की दावत होती है। इसके बाद निश्चित तारीख को लड़के की बरात, लड़की के घर रवाना होती है। लेकिन इस बारात में सबसे दिलचस्प पहलू यह होता है, कि इसमें दूल्हा और उसका पिता शामिल नहीं होते। बल्कि उनकी जगह बारात को लेकर कोई बुजूर्ग या सुलझा हुआ आदमी जाता है, जिसे ’न्येखॅान’ कहते हैं। यह न्येखान अपने साथ दो वीर, दुल्हन के घर ले जाता है और उनमें से एक वीर, दुल्हन की मां को वैवाहिक प्रमाण के तौर पर देता है। वहीं ’खादुम’ यानी, प्रेम विवाह, समाज और माता-पिता की इच्छा के खिलाफ होता है। प्राचीन समय में, इस तरह के विवाहों का कड़ा विराध होता था, और लड़के-लड़कियों को संपत्ति के अधिकार से भी वंचित कर दिया जाता था। लेकिन बदलते वक्त के साथ इस तरह के विवाहों को भी देर-सवेर मान्यता मिल जाती है।

स्पीतियन समाज में महिलाओं के गहने ऐसे हैं कि विवाहित औरतों और अविवाहित लड़कियों को आसानी से पहचाना जा सकता है। विवाह के बाद औरतें अपने सिर पर चांदी से बने हुए ’बैरख’ पहनती हंै। जिसमें बेशकीमती पत्थरों और फिरोजा की लड़ियां पिरोई जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ अविवाहित लड़कियां फिरोजे को अपने गले में बांधती हैं। इनके गहनों में गउ, पिचुक, दीक्रा, धोंचा और उल्दिक का विशेष चलन है। महिलाएं अक्सर बुरी नजरों से बचने के लिए चांदी से मढ़े या कपड़े से बने ताबीज को पहनती हैं। जिन्हें श्रंुग्वा कहा जाता है। यह कान में कौंदा पहनती हैं और इन्हें युक्जुर भी बहुत पसंद है। ’न्यांग्थंग’ इनके गले का हार होता है और नाक पर सजती है ’फुली’। जब इतना श्रृंगार हो तो भला हाथों की उगलियां कैसे सूनी रहें ? इनकी उंगलियों में सजती है अंगुठियां।

             स्पीतियन पुरूष भी इन अंगुठियों और मुरकियों को पहनने का शौक रखतें हैं। स्पीति के पुरूष, कमरबंद पहनते हैं और इस कमरबंद के साथ वह तरह-तरह की चीजें बांधतें हैं। जैसे....लोहे की पाइप, म्यान में चाकू, जंजीर से बंधा चकमक पत्थर, चम्मच और चाभियों के गुच्छे। स्पीतियन पुरूष और महिलाओं के कपड़े, वातावरण के अनुसार होतें हैं। पुरूष अपने पारंपरिक पहनावे पहनते हैं, सर पर छोटी टोपी, कुर्ता-पायजामा, चोंगा, कमर पर कपड़े या चमड़े का कमरबन्द और पैरों में मोजे-जूते होतें हैं। वहीं महिलाएं खंजक पहनतीं हैं, जो बिल्कुल कोट की तरह होता है, इस खंजक  के उपर यह लोक्पो पहनतीं हैं। ढीला कुर्ता-पायजामा के साथ-साथ सुरमच भी इनके पहनावे का अहम हिस्सा है। यह सुरमच घाघरे की तरह होता है। इसके अलावा भीषण ठंड से बचने के लिए लंबा चोंगा, कपडे़ का कमरबंद और पैरों में मोजे- जूते पहनतीं हैं।

स्पीतियन लोगों का खान-पान, इनके भौगोलिक परिवेश के आधार पर होता है। खान-पान का यह तरीका काफी हद तक, तिब्बती खान-पान से मिलता हुआ नजर आता है। इनके खाने में सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन और शाम का खाना शामिल है। सुबह के नाश्ते को ’केन’ कहते हैं। यह शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों प्रकार का होता है। थुंग्पा में अगर सब्जियां हैं तो शाकाहारी और मांस मिला है तो मांसाहारी। दोपहर के भोजन को ’शोड’ कहा जाता है। दोपहर के खाने में, जौ के सत्तू के साथ-साथ उबले आलू और सब्जियों का प्रयोग भी करते हैं। इसके साथ ही ’सुमेकेसी’ यानी रोटी को भी अपनी थाली में शामिल करतें हैं। दोपहर का खाना शाकाहारी भी हो सकता है और मांसाहारी भी। ’शोड’ यानी दोपहर के भोजन के बाद, छाछ परोसने का इनका रिवाज भी बहुत पुराना है। स्पीतियन लोग रात के खाने को ’गान-गाल कहतें हैं। इसमें ’काल्हु’ यानी मेथी की रोटियों के साथ सब कुछ दिन के खाने के जैसा ही होता है। रात में केवल छांछ नहीं होती। छांछ की जगह ले लेती है, छंग या अराक, जो इनकी पारंपरिक शराब होती है। इस छंग या अराक को केवल रात के खाने के साथ ही नहीं लिया जाता बल्कि पर्व-त्योहार, शादी-विवाह, उत्सव और त्योहार पर भी यह जम कर पी जाती है। इन खानों के अलावा मक्खनियां चाय इनके खान-पान का अहम हिस्सा है। यह चाय इनके दैनिक जीवन का हिस्सा है, वहीं दूसरी तरफ मेहमान नवाजी के लिए मेहमान नवाजी के लिए भी यह मक्खनिया चाय बहुत जरूरी है। इस चाय को बनाने के लिए लकड़ी के विशेष बर्तन का प्रयोग किया जाता है। जिसे ’डोंग्मो’ कहतें हैं। 

स्पीतियन लोग अपने लिए चाय की खेती खुद ही करतें हैं। मक्खन की इस चाय का स्वाद मीठा और नमकीन दोनों तरह का होता है। पुराने समय में चाय मीठा बनाने के लिए शहद का प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब शहद की जगह चीनी या गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है। स्पीतियन लोगों में चाय का सिलसिला सुबह से शुरू होता है और देर रात तक चलता रहता है। दरअसल, ठंड भरे मौसम में यह चाय इनके शरीर में, पानी की उचित मात्रा को बनाये रखती है। यही वजह है कि स्पीतियन लोग चाय के खासे शौकीन होतें हैं। इनके खाने में सबसे विशेष व्यंजन है, ’मोग-मांग’ और ’क्यारी’। यह दोनों व्यंजन माँसाहारी और लगभग एक जैसे होते हैं। मोग-मंाग आंटे की छोटी-छोटी गोलियों जैसी होती हैं, जिनमें मांस भरा होता है। इन्हें पकौड़ियों की तरह सूखा और शोखे में डुबो कर खाते हैं। उसी तरह क्यारी भी चावल की छोटी-छोटी गोलियों जैसी होती हैं, और इनके भीतर भी मांस भरा होता है। इसे भी पकौड़ियों की तरह सूखा या शोखे में डूबो कर खाते हैं।

कृषि स्पीतियन लोगों के लिए व्यवसाय तो नहीं, परन्तु जीविका चलाने के लिए, एक जरिया जरूर है। स्पीतियन समाज में ज्यादातर कृषक उच्च वर्गों से ही आते है। खेतों पर नोनो, खांग्चेनों और खांग्चागों वर्ग का ही कब्जा रहा है। लेकिन यह लोग स्वयं खेती-बाड़ी का काम नहीं करते। यह बेटा वर्ग के लोगों से खेती का काम कराते हैं, और उन्हें इसके लिए मजदूरी देते हैं। साल के कुछ महीने जब मौसम ठीक हो तो यहां जौ, गेंहू, मेथी और सरसों के साथ-साथ सब्जियों की अच्छी पैदावार होती है। स्पीतियन लोग प्राचीन समय से कामगार पशुओं को पालते आए है। जरूरत दूध की हो या माल ढोने की या फिर खेतों के लिए खाद की, यह पशु इनकी सारी जरूरतों को पूरा करते हैं। यहां ठंड ऐसी है कि हड्डियों तक को जमा कर रख दे और इससे बचने के लिए चाहिए, उन और यह भी पशुओं से मिलता है। इसलिए अपनी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, यह याक, गाय, खच्चर, गधा, भेड़ और बकरियों को पालतें हैं। इनके खेतों को जोतने के लिए यह लोग याक और गाय के मेल से बने नरे संकर का प्रयोग करतें हैं।

स्पीतियन समाज में चिकित्सा की पद्धति अतिप्राचीन और प्राकृतिक है। स्पीति घाटी अपने कई तरह के आर्युवेदिक जड़ीबूटियों के लिए जाना जाता है। सिबाथन और आईबैक जैसे कई ऐसे पौधे हैं जो बिमारियों को दूर करने में सहायक होतें हैं। स्वास्थ्य संबंधी शिकायत होने पर लोग चिकित्सक से मिलते हैं, जो इन्हें प्राकृतिक रूप से तैयार की गई दवाओं को मंत्रों के साथ देते हैं। इन दवाओं को देते समय चिकित्सक बिमारी को ध्यान में रखते हुए मंत्र बोलतें हैं, ताकि बिमारी जल्द दूर हो सके।

                 स्पीतियन लोगों की परंपराओं ने अतीत से वर्तमान तक एक लंबा सफर तय किया है। स्पीतियन समाज में व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद चोरटन बनाने की परंपरा है। यह चोटरन एक स्तूप होता है जिसे मृत  व्यक्ति की याद में बनवाया जाता है। अपनों की याद को एक स्तूप के जरिए संजोने की यह परंपरा बुद्ध सभ्यता का जीता-जागता उदाहरण है। इसके अलावा स्पीतियन लोगों का अंधविश्वास पर भी इतना गहरा  विश्वास है कि इस समाज में जादू-टोना और तंत्र विद्या का भी अच्छा खासा चलन है। ताना-माना यानी जादू-टोने का प्रयोग आमतौर पर बिमारी में ही किया जाता है। ऐसा माना जाता है, कि बिमार व्यक्ति पर बुरी आत्मा का साया है और उसे ठीक करने के लिए तांत्रिक तंत्र-मंत्र के साथ कर्मकाडों का भी सहारा लेतें हैं।

स्पीतियन लोगों के हाथों का हुनर देखने से ऐसा लगता है, कि ये सही मायने में कला के पुजारी हैं। ’किल्टा’ यानी ऐसी टोकरी जिसे पीठ पर बांधकर सामाप ढोने के लिए प्रयोग किया जाता है। इस किल्टे को यह अपने हाथों से बनाते हैं। इनकी कला की एक और मिसाल है फूला, घास से बने जूतों को फूला कहतें हैं। जिसके तलवे भेड़ या बकरे की खाल से बनाये जाते हैं। यह जूते पैरों को बेहद गर्म रखते हैं और बर्फबारी के समय पैरों को फिसलने नहीं देते।

स्पीतियन लोगों को कपड़े के रंग-रोगन में भी खासी महारत हासिल है और इनके कपड़ों के रंगाई की धूम तिब्बत तक फैली है। हथकरघे लगभग सभी स्पीतियन लोगों के घरों में होते हैं। ठंड के दिनों में जब घरों से निकलना मुश्किल होता है, तो इन करघों पर यह बुनाई का काम करते हैं। इनके बुने हुए सूती और उनी कपड़ों की मांग अन्य जगहों पर अच्छी-खासी मांग है।  

थंका पेंटिंग..... स्पीतियन समाज की एक महत्वपूर्ण कला, जिसने विश्व में अपनी विशेष पहचान बनाई है। थंका पेंटिंग मूलतः, नेपाली कला है, जिसे स्पीतियन समाज ने तिब्बत से प्रभावित होकर, अपना बना लिया। थंका केवल पेंटिंग नहीं है, बल्कि यह बौद्ध धर्म की आस्था, विश्वास और मूल्यों से जुड़ी हुई है। थंका पेंटिंग, सूती कपड़े और कैनवस पर बनाई जाती है। चटक रंगों के सुंदर समन्वय से भगवान बुद्ध के जीवन दर्शन और ज्ञान के साथ-साथ कई तरह की धार्मिक कथाओं को पेंटिंग के जरिए दर्शाया जाता है। धार्मिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए इन पेंटिगों का बखूबी प्रयोग किया जाता है। थंका पेंटिंग को बौद्ध मोनेस्ट्री में या फिर स्पितियन लोगों के पूजाघर यानी चापेल में लगाया जाता है। काल चक्र, ध्यान बुद्ध, बुद्ध जीवन यात्रा और यात्रा थंका पेंटिंग मोनेस्ट्री में लामा और चेमों ही बनाते हैं। सदियों से मोनेस्ट्री में फलती-फूलती आई यह कला आज भी अपने सफर को जारी रखे हुए है।

 संसार की हर बात से बेखबर स्पीतियन लोगों की जिंदगी में पर्व और मेले खुशियों का पैगाम लाते हैं। झूमना...नाचना ...गाना-जिंदगी के हर गम को ’छंग’ और ’अराक’ की दावतों में उड़ाना। यही खासियत है इन मेलों,  त्योहारों की और स्पीतियन लोगों की। यह मेला इनकी जिंदगी का सुनहरा पहलू तो है ही साथ ही इनके व्यापार का जरिया भी, इनका सबसे विख्यात मेला लादरचा किब्बेर के पास हर साल मनाया जाता है। यह मेला पशु व्यापार का भी सबसे बड़ा मेला है। इस मेले में गाय, खच्चर, गधे, भेड़ के अलावा याक तक की खरीदारी की जाती है। तरह-तरह के सामानों से सजी-धजी दूकानें, लोगों की चहल-पहल और सबके चेहरे पर मुस्कान.......यही है लादरचा मेले की शान। स्पीति घाटी में ज्यादातर, मेले और पर्व, मोनेस्ट्रियों से जुड़े हैं। इनमें सिस्सु, जिगजेद और गटोर पर्व प्रमुख है। ताबो मोनेस्ट्री में हर चौथे साल मनाये जाने वाला ’चख्र पर्व’ विश्व प्रसिद्ध है। दुनियाभर से लोग इस मेले में शामिल होने के लिए स्पीति घाटी पहुंचते हैं।


सरगम की सुरों पर थिरकते पैर और वादियां गूंजती है, स्पीतियन लोगों के लोकगीतों से। स्पीतियन समाज को गीत-संगीत में इतनी रूचि है, कि इनका एक इस गीत-संगीत को सदियों से कर्म की तरह पूजता है। ’बेटा’ वर्ग की पुश्तैनी परंपरा है....नृत्य, गीत और संगीत। बेटा वर्ग सात अलग-अलग नृत्यों में माहिर माने जाते हैं। इनमें गार, जाब्रू, मुकनार और दानवी नृत्य प्रमुख है। गार नृत्य महिलाए और पुरूष दोनों ही अलग-अलग करते हैं, लेकिन जाब्रू एक ऐसा नृत्य है, जिसे महिलाएं और पुरूष मिलकर एक साथ करते हैं। वहीं ’मुकनार’ नृत्य को महिलाए और पुरूष समूहों में अलग-अलग करते हैं। ग्रुथोर पर्व पर, लामाओं द्वारा किये जाने वाला, दानवी नृत्य अपने तरह का खास नृत्य है, जिसमें लामा दुष्ट आत्माओं का मुखौटा पहने हाथों में खुखरी लिए करते हैं। मुखौटा पहन कर एक और नृत्य किया जाता हैं, जिसे ’छम’ कहते हैं। यह नृत्य मोनेस्ट्रीयों में लामाओं के द्वारा किया जाता है। नृत्यों में प्रयोग होने वाले मुखौटों को भी लामा लोग स्ंवय तैयार करते हैं। छम एक धार्मिक नृत्य है और इसमें बौद्ध धर्म की विभिन्न कथाओें का समावेश देखा जा सकता है। स्पीतियन समाज के इन नृत्यों को खोवो, बांसुरी और नगाड़़ा जैसे कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों की सहायता से किया जाता है।

यह स्पीति घाटी है, वक्त के झरोखे से देखें तो यह आज भी वैसी ही है, जेसी सदियां पहले। इसी तरह स्पीतियन लोग, आज भी वैसे ही हैं, जैसे सदियों पहले थे। अपनी परंपरा को गाते-गुनगुनाते, जिंदगी के ताने-बाने पर आने वाले कल का ख्वाब बुनते सीधे-सच्चे स्पीतियन लोग और उनसे गुलजार यह स्पीति घाटी।

10 नवम्बर 2011

काश स्टीव जॉब्स हमारे बाप होते

स्टीव जाब्स का निधन हो गया. अगर इस देश में गुलामी की आदत रगों में न दौड़ रही होती तो बस इतनी सी खबर ही थी. लेकिन देश में जिसे राष्ट्रीय मीडिया कहा जाता है, या माना जाता है या स्वंभू बने हुए राष्ट्रीय मीडिया में ये बाप के मरने जैसा दुखांत सीन था. काफी सारे न्यूज पेपर ने अपने पन्ने रंग डाले. हैडलाईंस बनाने के लिये अपने पूरे दिमाग और क्षमताओं का इस्तेमाल किया. संपादकीय से लेकर बीच के कई-कई पेज रंगे गएं. टीवी चैनलों ने किस कदर का रोना रोया ये देखकर किसी को भी रोना आ सकता था. ये नंगे राष्ट्रीय मीडिया का रूदन था। उस राष्ट्रीय मीडिया का जिसने अपने कंधें पर इस देश के लिए सही गलत सोचने की जिम्मेदारी संभाल रखी है.

अमेरिकी राष्ट्रपति को दुख हुआ या नहीं लेकिन मनमोहन सिंह को दुख हुआ है. मनमोहन सिंह लाटरी से बने प्रधानमंत्री है. उनके गले में प्रधानमंत्री का हार उनकी आम जनता से दूरी के चलते डला है. सोनिया गांधी जानती है कि पूरी कोशिशों के बावजूद जो शख्स अपनी मातृभाषा यानि पंजाबी राष्ट्रभाषा यानि हिंदी नहीं सीख पाया वो देश की हजारों जातियों में बंटी जनसंख्या का नायक कैसे बन सकता है.

यानि इतिहास में एक बड़े गुलजारी लाल नंदा के तौर पर दर्ज हो जाएंगा. ऐसे प्रधानमंत्री को हर साल हजारों बच्चों की अकाल मौत पर दर्द नहीं होता. दुख नहीं होता. किसान भूख से मर रहे है. आत्महत्या कर रहे है. रोज अखबार में कई पन्नों पर सड़कों पर मारे गये लोगों के बच्चों की बेबस सी फोटो दिखती है. किसी पर प्रधानमंत्री को दर्द नहीं हुआ. एक लाख साठ हजार लोगों एक्सीडेंट में सड़कों पर दम तो़ड़ते है कभी प्रधानमंत्री का दर्द नहीं दिखा.

लेकिन ये विषय से भटकना हुआ. बात स्टीव जॉब्स की है. एक ऐसा आदमी जो भारत के बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखता हो. ऐसा आदमी जिसे प्रधानमंत्री भारत रत्न न दे पाएं लेकिन भारत की तरक्की में एक मददगार माने.

अब जरा सच देखें. मीडिया एक झूठ के बादल की तरह हो रहा है जो रोज सिर्फ झूठ रच रहा है. और सौ बार बोला गया झूठ सच में तब्दील हो रहा है. स्टीव जॉब्स ने जो भी बनाया कंपनी के मुनाफे के लिए बनाया. उस आदमी ने भरपूर कीमत वसूली अपने आविष्कारों की. हमारे देश ने हर मोबाईल को पैसा देकर खऱीदा. हर चीज पर पैटेंट का पैसा दिया. उसने ऐसी कोई चीज नहीं बनाईँ जो हमारे देश के किसी गरीब आदमी को रोटी हासिल करने में मदद दे. सिर्फ आईफोन जैसी चीजों से दुनिया नहीं चल रही है. ये दर्द उन्हीं बेशर्म लोगों का और दलाल मीडिया का है जिसको 32 रूपये रोज कमाने वाला गरीब नहीं दिखता. लेकिन 32 हजार का आईफोन खरीदने वाले के जरा से दर्द पर पेट में मरोड़ उठ जाती है. ऐसे में सिर्फ एक ही बात कही जा सकती है कि ये मीडिया देश के लोगों का नहीं स्टीव जाब्स जैसों की आवाज जिंदा रखने के लिए है.

9 नवम्बर 2011

लेकिन...


संदीप मुदगल

कवि, लेखक और निर्देशक गुलजार मूलतः फिल्मकार नहीं हैं। इस तथ्य से बेशक कुछ लोग एकमत न हों, लेकिन यह सच है कि गुलजार के अंदर से बुनियादी तौर पर एक कवि झांकता है जो गद्य में भी कुछ दखल रखता है। बतौर फिल्मकार वह हिन्दी सिनेजगत से जुड़े जरूर लेकिन उनका मूल तत्व फिर भी लेखन ही रहा। इस तथ्य को कुछ इस तरीके से भी समझा जा सकता है कि सिनेजगत में उन्होंने अपनी पारी की शुरुआत जिन फिल्मकारों के साथ की थी वह भी बौद्धिक बिरादरी से संबंध रखते थे। बिमल राय की ‘बंदिनी’ में उन्होंने सबसे पहले गीत लिखे थे। बंदिनी भारतीय मुख्यधारा सिनेमा की उन गिनी-चुनी छवियों में से है जो अपने समूचे कलेवर में पारंपरिक साहित्यिक मानदंडों (!) से बहुत दूर नहीं है।

फिल्म में शामिल गीत भी लोकशैली का गहन भावनात्मक आभास लिए हुए दिखते हैं। इन गीतों की शालीनता और सौम्यता अपनी कहानी आप कहती है। वह गीत असल में एक फिल्म के गीत न होकर कथा में दिए गए कुछ ठहराव हैं जो दर्शक को कहानी के पूर्ववर्ती घटनाक्रमों पर उस दौरान कुछ सोचने पर बाध्य करते हैं। इसे कुछ यूं भी कह सकते हैं कि बंदिनी में गीत पहले से चली आ रही संवेदनात्मक प्रक्रिया को और रफ्तार देते हैं जिसके बाद दर्शक खुद को आगे के संभावित घटनाक्रम के लिए भावनात्मक तौर पर और मजबूत करता है या पाता है। अतः गुलजार का सिनेजगत में पहला कदम रचनात्मक दृष्टि से बहुत समृद्ध रहा था, परंतु यह शुरुआत एक कवि के बतौर थी।

गुलजार ने बतौर निर्देशक कई स्मरणीय फिल्में बनाई हैं। हिन्दी मुख्यधारा सिनेमा में 1970 के बाद जो एक दिमागी दिवालियापन देखने को मिला है, उसके बीच यदा-कदा कुछेक ऐसे फिल्मकार आते रहे हैं जिनकी एक-दो सफल आॅफबीट छवियां देखने के बाद एक भेड़चाल सी चली है। ऐसा ही कुछ गुलजार के साथ भी हुआ था। ‘मेरे अपने’, ‘परिचय’, ‘खुशबू’, ‘मौसम’ जैसी फिल्मों की सफलता के बाद उन्हें लगभग ‘असाधारण’ फिल्मकार मान लिया गया था। दरअसल, इसके पीछे हिन्दी मुख्यधारा सिनेजगत में बेहिसाब फैली हुई मूलभूत कमियां झांकती दिखती हैं जिसमें पटकथा लेखकों या वृहद तौर पर लेखक जगत के प्रति वितृष्णा का भाव रहा है। हिन्दी साहित्य के जितने दिग्गज लेखक बंबइया सिनेमा पहुंचे, उनमें से अधिकांश को निराश होकर वापस लौटना पड़ा था, यह सच भी किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में साहित्यजगत का हिन्दी मुख्यधारा सिनेमा से संबंध कटा रहा था। यह तथ्य हाॅलीवुड या यूरोपीय सिनेमा के बिल्कुल विपरीत है जहां की अधिकतर नामी फिल्में उतनी ही मशहूर साहित्यिक कृतियों पर रही हैं। यहां उनके नाम गिनाना वाजिब नहीं होगा क्योंकि कोई भी सिनेप्रेमी इस तथ्य से वाकिफ होगा।

बहरहाल, गुलजार ने अपने फिल्म निर्माण काल में एक प्रयास जारी रखा था, वह था एक सौम्य और भावनात्मक कथावस्तु पर अपनी फिल्म केंद्रित करना। वैसे उनकी पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ आगामी कई गैंगवाॅर फिल्मों का आधार भी बनती दिखी, लेकिन उसके बाद उनका फिल्मकार अपने मूल तत्व को पहचानता हुआ चलता दिखाई दिया और यह उनकी खुशकिस्मती थी कि उन्हें अपने तरह के सिनेमाई सृजन के लिए आर्थिक जुगाड़ भी जुटता गया। जहां तक याद पड़ता है उनकी तमाम फिल्मों में इक्का-दुक्का को छोड़कर अन्य कोई घोषित या अघोषित तौर पर किसी साहित्यिक कृति पर आधारित नहीं है। इसके बावजूद, उनकी कुछ फिल्मों का कलेवर साहित्यिक पृष्ठभूमि लिए दिखता है तो अन्य कुछ हल्का-फुल्का मनोरंजन परोसती हैं।

‘लेकिन’ एक ऐसी फिल्म रही है जो मनोरंजन और गंभीरता का नपा-तुला सम्मिश्रण है। वैसे इसमें गंभीरता का तत्व अधिक हावी है और वह भी अलौकिकता की छटा लिए हुए है। रबीन्द्रनाथ टैगोर की एक कहानी पर यह आधारित है। लता मंगेशकर ने इसे बनाया था तो जाहिर है संगीत की इसमें प्रधानता होनी चाहिए। फिल्म में हृदयनाथ मंगेशकर का संगीत ही उसे हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ संगीत प्रधान फिल्मों में शुमार कर देता है। 

फिल्म में यदि कथा तत्व अपनी तरह का अनोखा है तो संगीत भी। शास्त्रीय एवं लोक संगीत का इतना व्यापक इस्तेमाल बहुत कम फिल्मों में याद पड़ता है। इस दृष्टि से यह फिल्म हिन्दी सिनेजगत की सबसे बड़ी संगीत प्रधान फिल्मों में से एक गिनी जा सकती है। फिल्म की कथावस्तु में संगीत को स्थान बहुत खूबसूरती के साथ दिया गया है। एक ओर अगर लगता है कि इसके रहस्यवादी कथानक में संगीत महज एक सहायक तत्व होगा तो वहीं दूसरी ओर संगीत के बिना इसकी कल्पना करनी मुश्किल हो जाती है। संगीत फिल्म का प्रधान तत्व ही नहीं बल्कि एक पात्र सरीखा दिखता है। इसका स्थान फिल्म में कुछ इतना गहरा है कि वह लगभग पात्रों की पृष्ठभूमि की गहराई के बराबर दिखता है।

फिल्म एक भटकती आत्मा की कहानी है जो एक युवक को जब-तब मिलती है और कुछ कहे बिना उससे कुछ मदद चाहती है। प्रेत आत्माओं के इस कथानक को भी मानने या न मानने वालों के अलग-अलग विचार सुने गए हैं, परंतु मुख्य पात्रों विशेषतः नायिका (भटकती प्रेतात्मा) के चरित्र की पृष्ठभूमि को सविस्तार दर्शाया गया है। फिल्म का यही एक चरित्र है जिसका बचपन से युवावस्था में मृत्यु तक का समूचा चित्रण दिखता है, जो अपने आप में पटकथा का अनोखा अंश है। 

दरअसल, फिल्म केवल इतनी ही नहीं है, उसमें अलौकिकता (मैटाफिजिक्स) पर हल्की-फुल्की दृष्टि भी डाली गई है। जन्म-पुनर्जन्म को लेकर कुछ प्रश्न हैं और उनके कुछेक जवाब भी हैं, लेकिन फिर भी बहुत कुछ अनकहा रह जाता है, जो अनिवार्य है। जन्म-पुनर्जन्म से जुड़े प्रश्नों के उत्तर संभवतः अस्पष्टता के पैराए में ही हो सकते हैं। जाहिर है, इस पूरी बहस से अधिकांश लोग एकमत नहीं होंगे, इसीलिए ‘लेकिन...’ विशेष पसंद के दर्शकों के लिए है।

फिल्म एक समय की नवाबी शान-शौकत के अवशेषों को समेटने के सरकारी प्रयास से शुरू होती है। कथानक में तब नए मोड़ आते हैं जब भी नायिका नायक से मिलती है। एक जीवित व्यक्ति के किसी मृत आत्मा से मिलने के बाद उस पर जो असर हो सकता है, वह नायक के साथ होता है। नायक समीर की भूमिका में विनोद खन्ना का अभिनय बुरा तो नहीं पर औसत से अधिक नहीं कहा जा सकता। इसका कारण है विनोद खन्ना की छवि, जो एक ‘ही मैन’ की रही है। वह डरने का अभिनय करने के दृश्यों में भी ‘डरे हुए’ से नहीं लगते। दूसरी ओर नायिका यानी प्रेतात्मा की भूमिका में डिंपल कापड़िया भी औसत से कुछ ही ऊपर दिखती हैं। हिन्दी फिल्मों में आमतौर पर अभिनय का सामान्यतः निचले स्तर के होने का कारण अभिनेताओं का ‘प्रशिक्षणहीन’ होना रहा है। मंच पर प्रशिक्षित कुछ कलाकार भी हिन्दी सिनेजगत में ‘दोहराऊ प्रणाली’ के शिकार हो बैठे हैं। इसमें अगर पूरी तरह से उनका कसूर नहीं है तो काफी हद तक है भी, जिन कारणों पर बात करना यहां बेमानी होगा।

बहरहाल, ‘लेकिन...’ मूलतः एक उलझन को सुलझाने का प्रयास है, जिसमें उसके पात्र और दर्शक अंततः उलझ कर ही रह जाते हैं, परंतु फिल्म, इस तरह के कथानक के प्रेमियों के बीच अपना गहरा असर छोड़ती है, कुछ दृश्यों में उन्हें काफी हद तक खौफजदा कर देने तक! इसका मुख्य कारण फिल्म का निर्देशन है, जो असाधारण तो नहीं, परंतु कथावस्तु के हिसाब से काफी परिपक्व नजर आता है। गुलजार का निर्देशन मूलतः सीधा और सरल रहता है, यहां भी कुछ ऐसा ही मामला है, लेकिन उनकी अन्य फिल्मों के मुकाबले यहां निर्देशकीय परिपक्वता के प्रयोग अधिक नजर आते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महल के पुराने और नए स्वरूप का फिल्मांकन, जिसमें उसके कारागार से जुड़े दृश्यों का खासतौर पर जिक्र करना जरूरी है। नए व जर्जर कारागार और पुराने समय की उस जेल कोठरी की साम्यता को बनाए रखने की कोशिश के पीछे की मेहनत खुद-ब-खुद नजर आती है। जेल कोठरी के दृश्य रहस्यवादिता से भरे हैं। वहां पहुंचकर दर्शक अपने आप कुछ निष्कर्ष निकालने को प्रेरित होता है। बशर्ते, वह एक सीमा से अधिक नहीं सोच पाता।

यहां एक और बात कहनी जरूरी है। स्वर्गीय मणि कौल ने ‘दुविधा’ का निर्माण किया था जो यथार्थवादी और आॅफबीट दृष्टि से बनाई गई थी। उसी कथा पर बरसों बाद अमोल पालेकर ने ‘पहेली’ बनाई जो मुख्यधारा को केंद्र में रखकर बनी थी। अनजाने में ही सही, ‘लेकिन...’ में यह दोनों तत्व एकसाथ दिखते हैं। एक ओर इसके प्रमुख पात्र नामी-गिरामी कलाकार हैं तो वहीं संगीत की दृष्टि से यह नितांत आॅफबीट है। हालांकि, यह इतनी बड़ी वजह नहीं कि इस पर अलग से बहस हो, फिर भी सिनेमाई पक्ष के तौर पर इस दिशा में कुछ प्रश्न उठते ही हैं।

भटकती प्रेतात्माओं पर यूं तो पूरब और पश्चिम में कई फिल्में बन चुकी हैं, जिनमें से अधिकांश में एक रहस्यवादी और अलग-थलग से पड़े परिवेश (रेगिस्तान या कोई अनजान-अनाम स्थान) का इस्तेमाल होता रहा है। अब सवाल यह है कि आत्माएं ऐसे दूर-दराज के इलाकों में ही क्यों भटकती हैं, भीड़ भरे शहरों में क्यों नहीं ? ‘द सिक्स्थ सैंस’ में मनोज ‘नाइट’ श्यामालान ने बड़े शहर में आत्माओं से ही एक किशोरवय बालक के साक्षात्कार दिखाए थे, परंतु उन्होंने उन आत्माओं को भटकाया नहीं था, वह उनके जरिए एक पक्ष सामने रखना चाहते थे। वह खुद आत्माओं के अस्तित्व से इनकार नहीं करते (उनके अपने शब्दों में)। तो क्या यह समझा जाए कि शहरी और गांव-देहात की प्रेतात्माओं में कुछ फर्क होता है या भटकना पूरब की प्रेतात्माओं की नियति है और वहीं पश्चिम की प्रेतात्माएं एक ‘सभ्य जगत’ और अपनी हालत पर दार्शनिक नजरिए से विमर्श करने की क्षमता रखती हैं। यह प्रश्न जरूर कुछ गहरी सिनेमाई पड़ताल मांगता है!

6 नवम्बर 2011

डर अभी बाकी है...

बलात्कार की घटना, छेड़खानी का प्रयास, दहेज़ की मांग, दहेज़ के कारण हत्या, पति द्वारा पिटाई और ना जाने कितनी ऐसी ख़बरें. जिनसे देश भर के अखबार रोज भरे रहते हैं. लेकिन ये घटनाएं केवल छोटे शहरों और कस्बों तक सीमित नहीं हैं. बल्कि देश की राजधानी दिल्ली और  अन्य बड़े शहर जहां सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर रहती है वो भी ऐसी घटनाओं से रोज शर्मसार होते हैं. 

क्या आप दिल्ली में रहती हैं? क्या आप महिला हैं? अगर हां तो सावधान! क्योंकि देश की राजधानी अब बलात्कार की राजधानी बन चुकी है. दिल्ली अब शरीफों और दिल वालों की दिल्ली नहीं. क्योंकि शहर पर  दरिंदों की नजर है. ये  बात हम नहीं कह रहे बल्कि सरकारी आंकड़े कह रहे हैं. ये तस्वीर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से साफ हुई है. 

महिलाओं को लेकर कई बार चिंताएं व्यक्त की जाती हैं और नई-नई नीतियां बनाई जाती हैं. पुलिस महिला सुरक्षा के नए-नए दावे करती है. पर ये बातें जमीनी हकीकत से दूर हैं. सच्चाई यह है कि महिलाएं आज भी सुरक्षित नहीं है. कम से कम साल 2010 के क्राइम रेकॉर्ड्स को देख कर तो यही लगता है. साल 2010 के दौरान महिलाओं के खिलाफ अपराध 4.8 फीसदी बढ़ा. कुल 2,13,585 मामले दर्ज किए गए जबकि साल 2009 में 2,03,804 मामले दर्ज किए गए थे. 

साल 2010 के क्राइम रिकॉर्ड पर नजर डालें तो देश के 35  बड़े शहरों में राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित है. साल 2010 के आंकड़ों के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी में 414 बलात्कार के केस दर्ज किए गए. जो कि देश के बड़े 35 शहरों में नम्बर एक पर है. ये वही राष्ट्रीय राजधानी है जिसकी मुख्यमंत्री एक महिला हैं और जिसकी पुलिस सदैव आपके साथ रहती है. दूसरे नम्बर पर देश की कॉमर्शियल कैपिटल मुंबई है वहां 194 बलात्कार के केस दर्ज किए गए.  

एनसीआरबी के मुताबिक देश के 35 बड़े शहरों में महिलाओं के खिलाफ हुए कुल अपराधों में 23 प्रतिशत अकेले दिल्ली में हुए हैं. जबकि मुंबई के हिस्से 10.8 प्रतिशत बलात्कार के केस हैं.   

किडनेपिंग के मामले में भी दिल्ली पीछे नहीं है साल 2010 में राष्ट्रीय राजधानी में 1422 केस दर्ज किए गए. जो देश के बड़े 35 शहरों का कुल 37.7 प्रतिशत हिस्सा है. दहेज़ हत्या के मामले में भी राजधानी दिल्ली पीछे नहीं है. राजधानी में  पिछले साल 112 महिलाओं की दहेज़ के कारण हत्या की गई है. जबकि घरेलू हिंसा और पति द्वारा किए गए अपराधों के 1273 मामले दर्ज किए गए. 

राष्ट्रीय राजधानी की तुलना में देश की कॉमर्शियल कैपिटल मुंबई भी पीछे नहीं रही. वहां के आंकड़े भी शर्मसार करने वाले हैं. पिछले साल मुंबई में  146 महिलाओं को किडनेप किया गया, 21 की दहेज़ हत्या हुई जबकि 312 मामले घरेलू हिंसा जिसमें पति और घर वालों द्वारा हिंसा के थे दर्ज किए गए. 

बलात्कार के मामले में 91 केसों के साथ पुणे तीसरे नम्बर पर है. जबकि मध्यप्रदेश के जबलपुर में 81 और इंदौर में 69  मामले सामने आए. साइबर सिटी बंगलूरू में रेप के 65  मामले दर्ज किए गए. राज्यों के मामले में मध्यप्रदेश में 3,135 बलात्कार के केस दर्ज किए गए. जो कि देश में नम्बर एक है. दूसरे नम्बर पर ममता दीदी का राज्य पश्चिम बंगाल रहा. पश्चिमबंगाल में 2,311 मामले दर्ज किए गए. जबकि  असम 1,721,महाराष्ट्र 1,599, उत्तर प्रदेश 1,563, चंडीगड़ 1,012 छत्तीसगढ़1,025, बिहार 795  और आंध्र प्रदेश में 1,362  मामले दर्ज किए गए. 

कुल अपराधों के मामले में देश में साल 2010 में अपराध के मामलों में साल 2009 के मुकाबले पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है. दहेज हत्या में मामलों में  0.1 प्रतिशत बढोतरी हुई जबकि देश में प्रतिदिन130 महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं. 

एनसीआरबी के ये आंकड़े महिलाओं की सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़ा करते हैं. साथ ही उन दावों की भी पोल खोलते हैं जिनमें महिला सुरक्षा की बात कही जाती है. ये आंकड़े देश की सुरक्षा एजेंसियों पर बड़ा सवालिया निशान हैं. 

ये वो आंकड़े हैं जो पुलिस फाइलों में दर्ज हैं. इन आंकड़ों में अभी और भी बढोतरी हो सकती है क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं  जिन्हें समाज के डर से महिलाएं या उनसे जुड़े परिवार छुपा जाते हैं और जो पुलिस की क्राइम फाइल में दर्ज नहीं हो पाते. ऐसे में महिलाओं की सुरक्षा को और पुख्ता करने और महिलाओं के प्रति समाज को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है. 

इसके लिए ठोस और कारगर सरकारी नीति के साथ-साथ थोड़ा सा सामाजिक बदलाव की आवश्यकता है. और साथ ही बदलते वक्त के साथ अपनी सोच में भी बदलाव की आवश्यकता है. जरुरत है हम अपनी बंधे-बंधाए सामाजिक बंधनों को तोड़ें और अपनी बहू-बेटियों और मांओं के लिए एक सुरक्षित माहौल तैयार करें. जिससे वो भयमुक्त माहौल में सांस ले सकें.

2 नवम्बर 2011

अगर कहीं मैं तोता होता


अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?
होता,'फिर' क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम

रघुवीर सहाय