आशीष पाण्डेय
पर्वतों पर दूर तक फैली धुंध.....ठंण्डी हवाओं के झोंके और सूरज के धूप की गर्माहट सदियों से लाहौल घाटी में आंख मिचैली खेल रही है। लाहौल घाटी हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले का वह हिस्सा है जहां लाहौली जनजाती के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने इतिहास को जीते चले आए हैं। तमाम कठिनाईयों के बावजूद लाहौलियों के चेहरे पर न तो शिकन है, न कोई थकान। अपनी माटी से गहरे लगाव ने इनके चेहरे पर मुस्कान बिखेरी और अपने हौसले की बदौलत यह कदम-दर-कदम जिंदगी के सफर को तय कर रहे हैं।
सन् 1960 में पंजाब के कांगड़ा जिले से कुछ हिस्सों को अलग करके उन्हें लाहौल-स्पीति के नाम से नये जिले के रूप में हिमाचल प्रदेश से मिला दिया गया। 1991 की जनगणना के अनुसार 13835 वर्ग किमी0 में फैले इस जिले की जनसंख्या 31294 है और जनसंख्या घनत्व 2 व्यक्ति वर्ग किमी0 है।
प्राचीन समय में महाराजा हर्ष की मृत्यु के बाद भारतीय राज सत्ता बिखरने लगी और लाहौल में सामंती व्यवस्था का उदय हुआ। उस समय लाहौल पर कोलोंग, गुमरांग, घांेडला और बारबोग नाम से चार जमिंदार परिवार शासन किया करते थे। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 1000 ईसा पूर्व में कोलोंग परिवारों ने तीन-चार सौ वर्षों तक लाहौल पर शासन किया। परन्तु कोलोंग परिवार का वह शासन स्पीति राजा के अधीन हुआ करता था और बाद में लाहौल भी स्पीति की तरह लद्दाख सल्तनत से जुड़ गया।
बदलते वक्त के साथ सत्ता के कई पड़ावों से गुजरते हुए 1947 में देश की आजादी के वक्त लाहौल का शासन संबंधी काम नायब तहसीलदार देखा करते थे और शासन का मुख्यालय हुआ करता था कोलांग। जब लाहौल-स्पीति को जिला बनाया गया तो कोलोंग को तहसील का दर्जा दिया गया।
लाहौल, हिन्दु और बौद्ध धर्म की सभी विरासत को समेटे सदियों से एकता की अद्भुत मिसाल रहा है। जहां बौद्ध धर्म तिब्बत से आया वहीं दूसरी तरफ हिन्दू धर्म पंजाब के प्रभाव से लाहौल की आबोहवा में घुल गया। लाहौल की पट्टन घाटी में हिन्दु आस्था से जुड़े लोग रहते हैं, जबकि रंगोली और गारा घाटियों में बौद्ध मंत्र गुंजते हैं। पट्टन घाटी में लाहौली जनजाति के लोग शिव और दुर्गा यानी शक्ति की पूजा में विश्वास रखते हैं। लाहौल का अतीत तिब्बत से जुड़ा है और यही वजह है कि इस घाटी में बौद्ध सभ्यता और संस्कृति फलती-फूलती नजर आती है। लाहौली जनजाति के लोगों में बौद्ध धर्म मुख्यतः तीन संप्रदाय प्रचलित है- पहला- न्योंग्मापा, दूसरा- कग्युद्पा और तीसरा- गेलुग्पा। न्यींग्मापा संप्रदाय सबसे प्राचीन है। गेलुग्पा संप्रदाय बौद्ध समाज में पीत संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें लामा लोग पीली टोपी पहनते हैं। कग्युद्पा संप्रदाय भी लाहौली जनजाति के लोगों के लिए आस्था और विश्वास से जुड़ा ज्ञान मूल मंत्र है।
इसके अलावा लाहौलियों की प्रकृति के साथ अद्भुत जुड़ाव है। नतीजन लाहौली जनजाति के लोग प्रकृति की पूजा भी करते हैं। ’सब्दग’ के रूप में जहां ये पर्वतीय चट्टानों की पूजा करते हैं, वहीं गुफाओं की पूजा यह व्राॅग्मों के रूप में करते हैं। इनकी परम्परा में पेड़-पौधों को भी सम्मानीय स्थान दिया गया है। ’फाला’ एक ऐसा ही पेड़ है, जो लाहौली जनजाति में देवता की तरह पूजा जाता है। इनके अलावा लाहौली जनजाति के लोगों के अपने कुल देवता भी होते हैं। यह कुल देवता इनके घर के किसी कोने में पत्थर या खम्भे के रूप में स्थापित होते हैं। अन्य समाजों की तरह लाहौली जनजाति के लोगों में अपने धर्म की मान्यताएं जीवन का सार्वभौमिक सत्य भी है, और आधार भी।
लाहौली जनजाति समाज में जाति व्यवस्था का प्रचलन पुरातन समय से चला आ रहा है। धार्मिक आस्था के लिहाज से लाहौली हिन्दू और बौद्ध परंपरा के अनुयायी है, और इन्हीं दोनों मान्यताओं के अनुसार यहां जाति व्यवस्था का प्रचलन है। यहां जातियों के वर्गिकरण का आधार वंशावली पद्धति यानी उच्च और निम्न जाति व्यवस्था के आघार पर की गई है। उच्च जाति के ताल्लुक रखने वाले ठाकुर, स्वांगला और ब्राह्मण लोग खान-पान और शादी-विवाह जैसे संबंध अपनी ही जाति में बनाते हैं। इन उच्च जातियों में ब्राह्मण वर्ग केवल पट्टन घाटी तक सीमित है और शेष लाहौल में इनकी उपस्थिति नाम मात्र की भी नहीं है। पिछड़ी जातियों में वर्गीकरण का निर्धारण उनके पेशे के आधार पर हुआ है। लाहौली जनजाति समाज में लोहार लोगों को ’डोम्बा’ बुनकरों को ’बेडा’ और ’बारारस’। धरकार को ’वालरस’ कहते हैं। उच्च जनजातियों के खेतों पर मजदूरी करने वाले भूमिहीन मजदूरों को ’हेस्सी’ का नाम दिया गया है।
लाहौली जनजाति में अनेक तरह की भाषाओं का चलन है। बौद्ध और हिन्दू संस्कृति के मुहाने पर बसी लाहौल घाटी की जुबान में भी मिली-जुली खुशबु आती है। करीब आधा दर्जन बोलियों के जरिये अपनी बातों को कहने वाले लाहौली जनजाति के लोगों की प्रमुख भाषाएं भोटी और चिनाली या डोम्बाली हैं। भोटी भाषा, पर तिब्बती भाषा का प्रभाव है वहीं चिनाली या डोम्बाली संस्कृत भाषा की उपज लगती है। इन भाषाओं का प्रभाव भी क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग दिखाई पड़ता है। भोटी भाषा लाहौली की रंगोली और गारा घाटियों में बोली जाति हैं। वैसे इन इलाकों में और बोलियां प्रचलित हैं, जैसे पुनान, हिनान और चिनाली। पट्टन घाटी में मनचाड़ का प्रचलन बहुतायत है।
लाहौल घाटी में घरों का निर्माण और इनकी शैली काॅलोनी की तरह होती है। मकानों का समूह, ब्लाक के जैसा होता है, ताकि बर्फबारी के दिनों में लोगों का जुड़ाव एक-दूसरे से बना रहे। लाहौली जनजाति के लोगांे का घर तीन मंजिल तक बने होते हैं। घर के भूतल का प्रयोग पशुओं के रहने के लिए किया जाता है और इन्हीं कमरों का प्रयोग पशुओं के चारा रखने के लिए भी किया जाता है। घर की उपरी मंजिल का प्रयोग लाहौली परिवार अपने रहने के लिए करते हैं। उपरी मंजिल पर एक भीतरी कमरा होता है, जिसका प्रयोग जाड़े के दिनों ठंड से बचने के लिए होता है। बौद्ध संप्रदाय को मानने वाले लाहौली लोगों के मकानों के उपरी मंजिल पर इनके पूजा का कमरा होते है, जिसे चोखंाग के कहते हैं। लाहौल घाटी के निचले हिस्सों में मकान के निर्माण की शैली लगभग समान होती है, लेकिन इन मकानों में रहने के उपरी घाटी के मकानों की अपेक्षा बड़े, खुले और हवादार होते हैं और इन मकानों में रौशनी के भी बेहतर इंतजाम होते हैं, जो उपरी मंजिल के मकानों में उपरी मंजिल पर बरामदे का होना भी बड़ा जरूरी माना जाता है। इन घरों पर चूने से सफेदी की जाती है और कहीं-कहीं रंगों का प्रयोग भी दिखाई देता है। घर के भीतरी हिस्सों की सजावट लाहौली जनजाति के लोग अपनी परंपरा के अनुसार करते हैं। कमरों की साज-सज्जा में पूजा घर यानी ’चोखाग’ का विशेष स्थान है। ’चोखाग’ में बुद्ध के जीवन और दर्शन से संबंधित तमाम पेंटिगों के साथ-साथ थंका पेंटिग की मौजूदगी अवश्य रहती है।
लाहौली समाज में संयुक्त परिवार की अवधारणा प्राचीन समय से चलती आ रही है। चाहे वह हिंदू समाज हो या बौद्ध समाज। उच्च जनजाति हो या निम्न जनजाति से। सभी परिवार एक ही छत के नीचे रहते हैं। लाहौल के रंगोली और गारा घाटियों में संयुक्त परिवार का प्रचलन हैं। परिवार में न केवल माता-पिता, पुत्र-पुत्री बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची और उनके बच्चे भी एक साथ रहते हैं। पट्टन घाटी में पारिवारिक संरचना थोड़ी अलग सी है। यह परिवार में बड़े लड़के की शादी के बाद पिता घर से संन्यास ले लेता है, और उस घर को त्याग कर दूसरे घर में रहने चला जाता है। संपति उत्तराधिकार के मामले में लाहौली जनजाति भारतीय सभ्यता के काफी करीब नजर आते हैं। लाहौली जनजाति में पिता की मृत्यु के बाद सम्पति को सभी बेटों में बराबर-बराबर बांट दिया जाता है। यदि कोई पुत्रहीन हो तो उसकी मृत्यु के बाद संपति को अन्य भाईयों में बाट दिया जाता है, परन्तु मृत व्यक्ति की पत्नी है तो मृतक की संपत्ति पर उसका अधिकार होता है।
लाहौली जनजाति में सगोत्रीय विवाह नहीं होते परन्तु सजातीय विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। लाहौल की पट्टन घाटी में ब्राह्मण मौसेरी, ममेरी और फुफेरी बहनों से वैवाहिक संबंध नहीं बनाते, लेकिन अन्य जातियों में ऐसे भी विवाहों को मान्यता है। लाहौली जनजाति में तीन प्रकार के विवाह प्रचलित हैं- पहला-मोथे विवाह, दूसरा-कोवांची विवाह और तीसरा-कुंची विवाह। मोथे और कोवांची विवाह लगभग एक जैसे होते हैं और दोनों में माता-पिता की मंजूरी होती है। मोथे विवाह केवल भव्यता के आधार पर कोवांची से भिन्न होता है। कुंची विवाह अन्य घाटियों की अपेक्षा गारा और रंगोली में ज्यादा प्रचलित है। कुंची आधुनिक समाज के प्रेम विवाह के जैसा है, जिसमें लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद करते हों। इसके बाद लड़का, लड़की की सहमती से उसका छद्म अपहरण कर लेता है। बाद में दोनों पक्षों की रजामंदी से लड़के और लड़की का विवाह होता है, जिसे कुंची विवाह कहा जाता है।
विवाह की विधि चाहे मोथे हो या कुंची हो, इनकी पारंपरिक पेय छंग और अराक इसमें जरूर शामिल रहता है। कोवांची विवाह लाहौली समाज का ऐसा विवाह है, जिसमें ज्यादा ताम-झाम नहीं होता। इस विवाह में बहुत ही कम लोग शामिल होते है, और यहां तक की इस विवाह में दूल्हा तक अपनी बारात में नहीं जाता। दूल्हे की जगह उसकी छोटी बहन बारात लेकर जाती है, और शादी के बाद दुल्हन की विदाई करा कर चली आती है। लाहौली समाज में महिलाओं की स्थ्तिी पुरूषों के समकक्ष ही है। महिलाएं केवल घरेलू कामों तक ही नहीं सिमटी होती है, बल्कि यह पुरूषों के साथ खेती-बाड़ी में भी बखूबी साथ देती है और घर के सभी फैसलों में महिलाओं की राय बड़ी मायने रखती है। प्रायः सभी समाज में महिलाओं को गहनों से बेहद लगाव होता है और इस मामले में लाहौली महिलाएं भी कम नहीं होती हैं। ’किरकिस्टी’ इनका खास गहना होता है, जो सोने या चांदी का बना होता है। यह किरकिस्ती इनके सिर की शोभा बढ़ाता है, वैसे सिर पर पहनने वाला एक और गहना इनके बीच काफी लोकप्रीय है, जिसे पोशाल कहते हैं। लाहौली महिलाएं गले में चांदी की जंजीर पहनती है, जिसे 'न्यान्ग्थांग' कहते हैं। इसके अलावा इन नाक और कानों की सुंदरता बढ़ाते हैं ’फुली’ और अलोंग।
लाहौली पुरूष भी उंगलियों में अंगूठी, कानों में मुरकी और गले में क्यांटी पहनने का शौक रखते हैं। लाहौली पुरूषों का पारंपरिक परिधान इनके भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बना है। ऊनी कपड़े का पायजामा, कपड़े का ही गाउन की तरह का कोट, कमरबन्द जैसा पटका, ऊनी सदरी, मोजे, पुआल के जूते और सिर पर गिलगिट जैसी टोपी। लाहौली महिलाएं पायजामा और कुर्ता पहनती हैं। कुर्ते के ऊपर गाउन की तरह ’डुग्पो’ पहनती है, जिसकी लंबाई घुटनों तक होती है और इनके किनारों पर बारीक कढ़ाई होती है। महिलाएं ’डुग्पों’ को कसा रखने के लिए कमर पर पटका भी बांधती है। पैरों में ऊनी मोजे और पुआल के बने जूते होते हैं। जिसे ’पुल’ कहते हैं। भोटी महिलाओं को छोड़कर स्वांग्ला, शिप्पी और लोहार जनजाति की महिलाएं गोल टोपी पहनती हैं।
लाहौली जनजाति के खान-पान में भी भारतीय और तिब्बती परंपरा के असर दिखाई देते हैं। लाहौली लोगों के सुबह के नाश्ते को ’शेमा’ कहते हैं, जिसमें ’थुंग्पा’ नामक व्यंजन खाया जाता है। थंग्पा जौ के भुने हुए आंटे से बनता है। यह शाकाहारी और मांसाहारी दोनों विधियों से बनाया जाता है, फर्क सिर्फ एक है, एक में सब्जी मिली होती है और दूसरे में मांस। लाहौलियों के दोपहर के भोजन को ’छिक्किन’ कहते हैं। ’छिक्किन’ में जौ के भुने हुए आंटे की रोटियों के साथ आलू की सब्जी होती है। आलू लाहौलियों का पारंपरिक खाना नहीं है, लेकिन गुजरते वक्त के साथ आलू ने भी लाहौली थाली में अपना स्थान बना लिया है। छिक्किन खत्म होने के बाद बारी आती है छांछ की। छांछ लाहौली लोगांे के दोपहर के जरूर शामिल होती है। रात के खाने को लाहौलियों ने यंग्स्किन नाम दिया। रात का यह खाना छिक्किन यानी दोपहर के खाने की तरह ही होता। इसमें केवल छांछ को नहीं शामिल किया जाता है। जाड़े के दिनों में इन्हें मांस मिलने में कठिनाई नहीं हो, इसके लिए ठंड आने से पहले ही मांस को सुखा कर रख लेते हैं। मांस के संरक्षण की यह विधि लाहौलियों के परंपरा की विशेषता है।
इसके अलावा इनके खान-पान में दो और महत्वपूर्ण चीजें शामिल होती हैं, जो इनके दैनिक जीवन का हिस्सा तो है ही , साथ ही मेहमानवाजी के लिए भी बखूबी इस्तेमाल होती है मक्खन की नमकीन चाय और जौ से बनी इनकी अपनी बीयर यानी छंग और अराक। मक्खन की नमकीन चाय के साथ-साथ छंग और अराक पीने का कोई निश्चित समय नहीं होता। दिल जब करे बैठ जाए, हाथों में प्याला.....मक्खन की चाय...या छंग ...या अराक।
लाहौलियों की रसोई के बर्तन भी इनके अतीत से वर्तमान तक के सफर दास्तां बयां करते हैं। पुराने समय में लाहौली जनजाति के लोग पत्थरों के बर्तन का प्रयोग करते थे। उन बर्तनों में ’कुंपड’ अपनी विशेष पहचान रखता था। समय के साथ-साथ बर्तनों में भी परिर्वतन आने शुरू हुए और बर्तनों ने पत्थर की बजाय लकड़ी की शक्ल ले ली। लकड़ी के ऐसे ही बर्तनों में 'डांगमों' का प्रयोग नमकीन और मक्खनियां चाय बनाने के लिए किया जाता है।
आज बर्तनों को वर्तमान स्वरूप पत्थर और लकड़ी को छोड़कर धातु का रूप ले चुका है। दुनिया के रंग ढंग में ढलते हुए लाहौली रसोई में भी कांसे, पीतल, अल्यूमिनियम और स्टील के बर्तन दाखिल हो चुके हैं, जो किसी भी घर के लिए सामान्य हैं। परन्तु लाहौली जनजाति के लोगों ने अपनी जीवटता और मेहनत के बल पर पत्थरों से अन्न उपजाया है। लाहौल घाटी में आलू, होय, कुथ, जौ, मेथी और गेहूं की खेती प्रमुखता से की जाती है। लाहौल में केवल बीस फीसदी जमीन ही कृषि कार्यों के लिए है। उनमें जमीनों को भी दो भागों में बाटा गया है। एक तो वह जहां सिंचाई हो सके और दूसरी जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है। लाहौल के लिए मौसम भी एक बड़ी चुनौती है और इस चुनौती का डटकर मुकाबला करते हुए लाहौली एक मौसम में एक ही फसल पैदा कर पाते हैं। खेती के जी तोड़ मेहनत में भी लाहौली गाना-गुनगुनाना नहीं भूलते हैं। फसलों की बुआई हो या कटाई लाहौली झूमते हैं....गाते हैं....और जश्न मनाते हैं।
पशुपालन लाहौली जनजाति का हिस्सा है। लाहौली लोग याक याक, खच्चर, गाय, भेड़ और बकरे -बकरियों का पालन करते हैं। इन पशुओं में भेड़ और बकरियों का प्रयोग मांस प्राप्त करने के लिए किया जाता है। ठंड भरे जाड़े के दिनों में लाहौली जनजाति के लोग जब घरों से बाहर नहीं निकलते, तो उनका पसंदीदा काम होता है कपड़ो की बुनाई। लगभग हर लाहौली घर में हथकरघों पर बुनाई होती है। भेड़ के ऊन से लाहौली लोग अपने पहनावे के लिए गरम कपड़े तैयार करते है।परंपरागत शैली के कपड़े इनकी सभ्यता के भी परिचायक हैं। मनोरंजन और खेलकूद हर किसी समाज का अहम हिस्सा होता है। लाहौली लोगों के मनोरंजन की अपनी खास विधाएं है। इनके खेलों पर भारतीय और तिब्बती परंपरा की विशेष छाप दिखाई देती है। शतरंज की तरह खेले जाने वाला 'त्सोग्बे' लाहौलियों का पसंदीदा खेल है। शतरंज की तरह ही इस खेल में राजा वजीर सिपाही से दिमागी कसरत की जाती है। त्सोग्बे की तरह ही गोटों खेल भी लाहौलियों को खूब रास आता है। पत्थरों की गोटियों से खेले जाने वाला यह खेल भी शतरंज की तरह खेला जाता है।
इंसानी जिंदगी में खुशियों के रंग भरते हैं मेले और त्योहार। लाहौलियों का सबसे पसंदीदा मेला है ’लदर्चा’। यह वार्षिक मेला अपने विविध आयोजनों मसलन पशुव्यापार, नृत्यसंगीत और पारंपरिक वस्तुओं के खरीद-बिक्री का महत्वपूर्ण माध्यम है। भगवान शिव के त्रिलोकनाथ मंदिर के समीप ’पोरी’ मेला आस्था और विश्वास की अमिट छाप लिए हुए है। वहीं ’सिससु’ मेले में बौद्ध मान्यताओं के दर्शन होते हैं। इसके अलावा ’फागली’ और ’हालदा’ पर्व भी लाहौली जनजाति के प्रमुख मेलों में शामिल हैं।
लाहौली समाज में लोग तमाम मुश्किलों को झेलते हुए भी खुश रहना जानते हैं। नृत्य और संगीत से लाहौली जनजाति का लगाव सदियों पुराना है। खुशी का कोई भी अवसर बिना नृत्य और संगीत के अधूरा होता है। लाहौली समाज में स्त्री और पुरूष दोनों ही नृत्य की विधा में पारंगत होते हैं। छंग और अराक, नृत्य संगीत का ऐसा समां बांधता है कि सारी दुश्वारियों को भूल लाहौली लोग नाचते और झूमते हैं। बांसुरी की धुन और नगाड़ो की छाप पर पुरूष और महिलाएं अलग-अलग समूह में ’शेहनी’ नृत्य करते हैं।
लाहौली जनजाति में बौद्ध मान्यता पर आधारित ’छम’ नृत्य भी अपनी खास पहचान बनाये हुए हैं। ’छम’ नृत्य मुखौटा लगा कर किया जाता है। यानी नृत्य करने वाले मुखौटों के द्वारा दूसरे का रूप धारण करके ’छम’ को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इसके अलावा लाहौलियों में ’धुरे’ नृत्य भी खासा प्रचलित है। इस नृत्य में नर्तक अर्द्धगोलाकार और गोलाकार घेरा बना कर आकर्षक नृत्य की प्रस्तुती करते हैं। यह नृत्य मुख्य रूप से गायन पर आधारित है और इसमें वाद्ययंत्रों के संगीत अभाव होता है। इस नृत्य में गायन की शैली इतनी प्रभावशाली होती है कि संगीत नहीं भी होने पर असर नहीं पड़ता ’धुरे’ नृत्य में रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों पर नाट्य नृत्यों की प्रस्तुती की जाती है।

