संध्या जब होती जाती सघन
सहसा सरसराती तृण गुल्मों में
दामिनी की चपलता सी
गुज़र गयी जो कृतछाया
सपनों के ऊपर से मेघों के पार
मुरझा गयीं लाजवंती की शिराएँ
उमेठ कर सारे भय भुजंग
जगा गयी कच्ची नींद से
सिहरन सी हड्डियों में उलीच कर
उपह गयी जो रहस्यमय छाया
ग्रस गयी अंतरतम गहनतर
वह मधूलिका माया
चल कर फिर नींदों में ही उन्मन
उठ कर नदी के कूल से
छोड़ कर सारे मंदिर बगीचे
खेतों की पगडंडिया पकड़ कर
लौट आता हूँ घर की ओर
सहसा जब रुद्ध हो जाते हैं पग द्वंद्व
सुन कर सुदीर्घ फुत्कार
भरे हुए चिंगार मोटी आँखों में
प्रश्नात्मक भंगिमा में टीले सा
खड़ा है बड़े डील वाला
काला कठोर महिष
डर कर सहम कर
भित्तियां वीथियों की पकड़ कर
चल रहा चुपचाप मैं
सांस रोके जमा हुआ खून लिए नसों में
भित्तियों के पीछे से
कुंहकती है कोई, ठुनक ठुनक कर
रोती है राग बांध कर
एक बायमत
टोकती है उलझे उद्विग्न स्वरों में
सुन कर पदचाप मेरे
पूछती है कई तीखे प्रश्न गहन
तेज सधे क़दमों से
भटकता भागता गिरता पड़ता
सँकरी कोलियों में गाँवों के
अनजाने अचीन्हे मोड़ पर
सूत की गांती बाँधे
बैठी है जो दंतटुटी भकोल
मार देती है टोना
खोल देती है पहेलियों की पोटली
देती है सियाल-सिंघी पिलपिली सी
साहिल के काँटों से
गोध देती है हाथों में
तंत्र गुप्त राज-चिन्ह
भर देती है सम्मोहन आँखों में, तारों में, रात में
मूक सन्न निरुत्तरित हो
लौट आता हूँ आँगन कर चौखट पार
लिए कोई गहन अंतर्द्वंद्व
लादे पीठ पर कोई अगोचर छाया-बोझ
दीये की पीली रोशनी में
बुन रहा संत्रास नये
उन्माद-ग्रस्त सा अवचेतन
पर बंडेरियों पर अटकी है
जो मीठी सी नींद परी
फुसलाती है रच कर
स्निग्ध स्वप्न बिम्ब
शुष्क शरीर में उठती गिरती
गीली रागिनियाँ फेनिल उर्मियाँ
उठते हैं जाग्रत ज्वलंत सुसुप्तावस्था के
अदम्य आदिम इच्छाप्रेत
अजरा के मधुर स्वर्णिम स्वप्न
कट जाती है रात नींद स्वप्न धुंध
मरियल कांतिहीन क्लांत सा
दिन चढ़ता है आँखों पर
पीली सी परछाई लिए
हुलकता है नयनतारा कोटरों से
देखने को आईने में आत्मबिम्ब
उधर पिघलती हुई दोपहर में
उठते हैं रिक्त खलिहानों में
धूल के प्रगल्भ हौल
इधर कोई भोंकता है पंजरियों में मेरे
लोहे के मोटे भोथरे सुए
अथाह दर्द में टूटता जाता है यह शरीर
क्षीण होती जाती है काया
संदिग्ध सा अस्तित्व लिए
खुद को ही खाने लगती है यह देह
और पीली होती जाती है मेरी छाया
तब करने को गहन पड़ताल
खोजने को वह अतीन्द्रिय अनुभूति
छूने को वह प्रेत आत्म बिम्ब
भटकता हूँ पहाड़ों पर चीड़ों की घाटियों में
झीलों में झरनों में झांकता हुआ
खोजता वह गुरुतर आत्मद्वन्द्व
आवेशित सा चलता उन्मन
विपुल विक्षोभ मथते मन अंतःकरण
चुभते हैं पैरों में ईर्ष्या पाषाण
डँसते हैं समस्त जुगुप्सा सरीसृप
जमीन में दबे हुए कच्छप किल्विष
कुंठा के कवच पहने सर उठा कर रेंकते हैं
उभरे हुए वल्मीकों के नुकीले ढूह फोड़ कर
उड़ रही हैं दीमकों की टोलियाँ
बुझ रही है हवा नदी के कूल पर
जल रही है मूक मिट्टी
उड़ती आती चिरायंध सी गंध
आसमान साधे है
एक स्तब्ध-गहन-अगड़-धत्त सा मौन
देखती है नदी चुपचाप
रूंधे गले से बह रहा है पवन मौन
मूक मिट्टी देखती अवसन्न
गीली चांदनी बैठी ओस की पीठ पर
छनती है खूब महीन
नदी मुझे पुकारती है, डंसती है
मैं देखता हूँ उसकी गहरी नाभि में
अपना नीला चिरयुवा बिम्ब
एक सूरज प्रचंड सा नदी में गहरी डुबकी लगाता है
छपाक घुप्प बुडूप बुडूप
एक बुलबुला बुदबुदा गया
और रात मुरझा जाती है
दबे रह गए समस्त विद्रोह के स्वर
गुम्फित रह गए समस्त सारे विचार आरोह
छोड़ कर सारे स्वप्न इसी धरा पर
उड़ जाती है आत्मा तज कर यह देह
यम-न्याय-नियम-दंड के सोंटों से पिट कर
बंधी हुई अभिशप्त यह आत्मा
जा बैठती है पुराने बड़हड विटप पर
बसते यक्ष किन्नर प्रेत पिशाच जहाँ पर
अधमुये आत्मा वाले अधकटे शरीरों वाले
लूले लंगड़े पंगु
गले हुए ठूंठ अंगों वाले
ढूंढते विटप की कोटरों में
रौरव नरक द्वार
रेंग कर पंकिल सुरंगों से
चला आता हूँ अनूठे लोक में
समय के बहाव से अक्षुण
देश की परिधि के पार
सभ्यता के इस पार भटक आता हूँ
देखता हूँ गूढ़ रहस्य संस्कृति के
समाज के अनगढ़ जटिल यंत्र
जाज्वल्य भास्वर प्रश्न
मंदिरों के पिछवाड़े में
खोदता नुकीली खान्तियों से
गहरे खंदक दफ़नाने को
कई जिन्दा मिथक, जाग्रत इतिहास
घोर घनघोर अधोर पीठ में
होते गहन मंत्रोच्चार
बैठे ब्रम्हराक्षस हजार
देते हवन अंगूठों का
ध्वजा गाड़ कर प्राचीरों पर
गुरुकुलों के अन्दर प्रांगणों में
हो रही है कीमियागरी
गढ़ रहे हैं तत्व, तथ्य, नया मनगढ़ंत व्याकरण
रच रहे धर्मसूत्र ध्यानलीन बटुकराक्षस
भक भव्य सुवर्णाभ राज प्रसादों में
अटके हैं नीले मेघ गवाक्षों पर
मखमली परदों के पीछे सज रहे हैं रंगमहल
मांझे हुए रेशम से बुने हुए ऐन्द्रजालिक अन्तःपुर
हो रहे हैं द्धयूत चौसर रस काम क्रीड़ा विहार
बैठे सिंहासनों पर गरबीले रोबदार कटपूतन
रच रहे हैं नये सत्ता सूत्र संतरण
सज रहे हैं खड्ग फरसे बरछे भाले ढाल
बुन रहे हैं युद्धों के नये भूतजाल
अलंकृत हो रही है रजनी कर अधुनातन श्रृंगार
हाटों के चाकचिक्य में
रत्न जटित देह बैठे हैं बिकने को तैयार
गुलाबी अट्टालिकाओं की दमकती गद्दियों पर
लेटे, खोदते खुजलाते अपनी देह
गिनते सुवर्ण पणक बंद कर दीवारों में कागजात
मीठी नींद में उंघते उतराते प्रवर मैत्राक्ष
जोत रहे हैं धूसर बंजर खेत पथार
काट रहे हैं मिट्टी चटियल टीलों से
रीन्ध कर अपने स्वेद कणों से
तपाकर कर आंच में अपनी पका रहे मृदभांड
ढो रहे हैं चुप चाप भारी पालकी में
बोझिल सदियों की परम्पराएँ वृषभ स्कंधों पर
भून रहे हैं सूखे धान
गर्म तपती रेत में उदरों के
धो रहे हैं देह अपनी काली भैंसों के साथ
बढे हुए केशों वाले टेढ़े नाखूनों वाले चैलाशक
खा रहे हैं जो दाने बीन कर लीदों से
नोंच कर चूहों के रोम गुर्दे जिगर
उधेड़ कर चमड़ी मरी हुई गायों की
ओढ़ कर हिकारत की मैली चादर
मार कर आत्मा अपनी
ढो रहे हैं माथे पर पंकिल पुरीष
बांध कर कमर में ढोल झाड़ू
पीट रहे हैं आत्मा अपनी
चाटते जूठे पत्तल पंचकीलक
कूट रही है ढेंकी रात भर
धान में मिला कर अपने भाग्य
बाँध कर पीठ से भुतहे अंकुर
खौलाती है नादों में बगावत के धानठोक रही गोयठे बूढ़ी दीवारों पर
- दीपांकर
गहन घन उदास
लेटी रहती शाखों पर यामिनी
बिखेर कर उलझे कुंतल जाल
और तपती है यह देह
अबूझ सी उष्णा में
पानी नदी का चढ़ आता पहाड़ों पर
स्याह आसमान में
उग आयी सांवली बदरिया
पीले चाँद का झुमका पहन कर
और पसीजता जाता आसमान
मंद मंथर
ऐंठता फिर झंकृति बन रागिनी
बहता मेरुओं में
बन कर उत्तप्त आर्द्र स्वर
जलती ज्वाला ज्वाला के अन्दर
उठती लपटें तीव्र उर्ध्व
चूम कर सारे दीप्त पर्ण
लपकती गहन शून्य ओर
पिघल कर बह जाता मैं
दूर तक जाता पसर
चीर कर नींदों के अंतर
बहती है एक नदी
नदी के अन्दर ही अन्दर
उठते हैं मीठे स्वप्न हौल
भुबक भुबक भुभक भुभक
रेंगते तिरते फिसलते
मखमली अमराई में
रेशमी परदों में लिपटे
निष्पंद देह में
उठते डूबते समस्त उद्दीपन
तैलचित्रों में लरजते
स्वर्णिम अमरत्व के सिंहासन
चुभते तारों के बीच
चिरयौवना आकाशगंगा में
उठता है एक आदमी
आदमी के अन्दर
नयी चेतना लिए
नया शरीर धरे
साँसों की ठंढी छाया में नहा कर
सूजे हुए सपने लेकर
पानी की सीढ़ियों पर पग रख
उतर आता है धीरे धीरे
अबूझ अनदेखे अकल्पित तिलिस्म में
मूक दीवारें जहाँ खड़ी मौन, अविचल
बंद हैं परछाईयों में
गुप्त गहन राज यंत्र
दीवारों में दबी हुई कुंजियाँ संदूकों की
सिसकती हैं बाहर आने को
दबे हुए फरसे सुबकते हैं
नया धार पाने को
नयी सान के पानी के लिए चिहुँकते हैं
दीवारों में चिने हुए सारे कंकाल
खांसते हैं पेडुओं की खांचों से
गहरे ढीठ पीत खंखार
चाटते हैं पालतू सरीसृप
सूंघते हैं दरारों से
रिसती जिन्दा ताजी गंध
आतुर बैठे घात लगाये
लपलपाते जीभ लम्बी
पीने को उष्ण रूधिर
दहाड़ते हैं गहन नाद
घिग्घियाँ बाँध कर सिकुड़े सिमटे
शैवालों की झुरमुटों के पीछे छिपे
झींगुरों के कृष्ण भीत झुण्ड
कराहते हैं दारुण राग
सूख जाते हैं प्राण
लेटी रहती शाखों पर यामिनी
बिखेर कर उलझे कुंतल जाल
और तपती है यह देह
अबूझ सी उष्णा में
पानी नदी का चढ़ आता पहाड़ों पर
स्याह आसमान में
उग आयी सांवली बदरिया
पीले चाँद का झुमका पहन कर
और पसीजता जाता आसमान
मंद मंथर
ऐंठता फिर झंकृति बन रागिनी
बहता मेरुओं में
बन कर उत्तप्त आर्द्र स्वर
जलती ज्वाला ज्वाला के अन्दर
उठती लपटें तीव्र उर्ध्व
चूम कर सारे दीप्त पर्ण
लपकती गहन शून्य ओर
पिघल कर बह जाता मैं
दूर तक जाता पसर
चीर कर नींदों के अंतर
बहती है एक नदी
नदी के अन्दर ही अन्दर
उठते हैं मीठे स्वप्न हौल
भुबक भुबक भुभक भुभक
रेंगते तिरते फिसलते
मखमली अमराई में
रेशमी परदों में लिपटे
निष्पंद देह में
उठते डूबते समस्त उद्दीपन
तैलचित्रों में लरजते
स्वर्णिम अमरत्व के सिंहासन
चुभते तारों के बीच
चिरयौवना आकाशगंगा में
उठता है एक आदमी
आदमी के अन्दर
नयी चेतना लिए
नया शरीर धरे
साँसों की ठंढी छाया में नहा कर
सूजे हुए सपने लेकर
पानी की सीढ़ियों पर पग रख
उतर आता है धीरे धीरे
अबूझ अनदेखे अकल्पित तिलिस्म में
मूक दीवारें जहाँ खड़ी मौन, अविचल
बंद हैं परछाईयों में
गुप्त गहन राज यंत्र
दीवारों में दबी हुई कुंजियाँ संदूकों की
सिसकती हैं बाहर आने को
दबे हुए फरसे सुबकते हैं
नया धार पाने को
नयी सान के पानी के लिए चिहुँकते हैं
दीवारों में चिने हुए सारे कंकाल
खांसते हैं पेडुओं की खांचों से
गहरे ढीठ पीत खंखार
चाटते हैं पालतू सरीसृप
सूंघते हैं दरारों से
रिसती जिन्दा ताजी गंध
आतुर बैठे घात लगाये
लपलपाते जीभ लम्बी
पीने को उष्ण रूधिर
दहाड़ते हैं गहन नाद
घिग्घियाँ बाँध कर सिकुड़े सिमटे
शैवालों की झुरमुटों के पीछे छिपे
झींगुरों के कृष्ण भीत झुण्ड
कराहते हैं दारुण राग
सूख जाते हैं प्राण
लरजते हैं भयावह तिक्त बधिर मूक स्वप्न
सहसा सरसराती तृण गुल्मों में
दामिनी की चपलता सी
गुज़र गयी जो कृतछाया
सपनों के ऊपर से मेघों के पार
मुरझा गयीं लाजवंती की शिराएँ
उमेठ कर सारे भय भुजंग
जगा गयी कच्ची नींद से
सिहरन सी हड्डियों में उलीच कर
उपह गयी जो रहस्यमय छाया
ग्रस गयी अंतरतम गहनतर
वह मधूलिका माया
चल कर फिर नींदों में ही उन्मन
उठ कर नदी के कूल से
छोड़ कर सारे मंदिर बगीचे
खेतों की पगडंडिया पकड़ कर
लौट आता हूँ घर की ओर
सहसा जब रुद्ध हो जाते हैं पग द्वंद्व
सुन कर सुदीर्घ फुत्कार
भरे हुए चिंगार मोटी आँखों में
प्रश्नात्मक भंगिमा में टीले सा
खड़ा है बड़े डील वाला
काला कठोर महिष
डर कर सहम कर
भित्तियां वीथियों की पकड़ कर
चल रहा चुपचाप मैं
सांस रोके जमा हुआ खून लिए नसों में
भित्तियों के पीछे से
कुंहकती है कोई, ठुनक ठुनक कर
रोती है राग बांध कर
एक बायमत
टोकती है उलझे उद्विग्न स्वरों में
सुन कर पदचाप मेरे
पूछती है कई तीखे प्रश्न गहन
तेज सधे क़दमों से
भटकता भागता गिरता पड़ता
सँकरी कोलियों में गाँवों के
अनजाने अचीन्हे मोड़ पर
सूत की गांती बाँधे
बैठी है जो दंतटुटी भकोल
मार देती है टोना
खोल देती है पहेलियों की पोटली
देती है सियाल-सिंघी पिलपिली सी
साहिल के काँटों से
गोध देती है हाथों में
तंत्र गुप्त राज-चिन्ह
भर देती है सम्मोहन आँखों में, तारों में, रात में
मूक सन्न निरुत्तरित हो
लौट आता हूँ आँगन कर चौखट पार
लिए कोई गहन अंतर्द्वंद्व
लादे पीठ पर कोई अगोचर छाया-बोझ
दीये की पीली रोशनी में
बुन रहा संत्रास नये
उन्माद-ग्रस्त सा अवचेतन
पर बंडेरियों पर अटकी है
जो मीठी सी नींद परी
फुसलाती है रच कर
स्निग्ध स्वप्न बिम्ब
शुष्क शरीर में उठती गिरती
गीली रागिनियाँ फेनिल उर्मियाँ
उठते हैं जाग्रत ज्वलंत सुसुप्तावस्था के
अदम्य आदिम इच्छाप्रेत
अजरा के मधुर स्वर्णिम स्वप्न
कट जाती है रात नींद स्वप्न धुंध
मरियल कांतिहीन क्लांत सा
दिन चढ़ता है आँखों पर
पीली सी परछाई लिए
हुलकता है नयनतारा कोटरों से
देखने को आईने में आत्मबिम्ब
उधर पिघलती हुई दोपहर में
उठते हैं रिक्त खलिहानों में
धूल के प्रगल्भ हौल
इधर कोई भोंकता है पंजरियों में मेरे
लोहे के मोटे भोथरे सुए
अथाह दर्द में टूटता जाता है यह शरीर
क्षीण होती जाती है काया
संदिग्ध सा अस्तित्व लिए
खुद को ही खाने लगती है यह देह
और पीली होती जाती है मेरी छाया
तब करने को गहन पड़ताल
खोजने को वह अतीन्द्रिय अनुभूति
छूने को वह प्रेत आत्म बिम्ब
भटकता हूँ पहाड़ों पर चीड़ों की घाटियों में
झीलों में झरनों में झांकता हुआ
खोजता वह गुरुतर आत्मद्वन्द्व
आवेशित सा चलता उन्मन
विपुल विक्षोभ मथते मन अंतःकरण
चुभते हैं पैरों में ईर्ष्या पाषाण
डँसते हैं समस्त जुगुप्सा सरीसृप
जमीन में दबे हुए कच्छप किल्विष
कुंठा के कवच पहने सर उठा कर रेंकते हैं
उभरे हुए वल्मीकों के नुकीले ढूह फोड़ कर
उड़ रही हैं दीमकों की टोलियाँ
बुझ रही है हवा नदी के कूल पर
जल रही है मूक मिट्टी
उड़ती आती चिरायंध सी गंध
आसमान साधे है
एक स्तब्ध-गहन-अगड़-धत्त सा मौन
देखती है नदी चुपचाप
रूंधे गले से बह रहा है पवन मौन
मूक मिट्टी देखती अवसन्न
गीली चांदनी बैठी ओस की पीठ पर
छनती है खूब महीन
नदी मुझे पुकारती है, डंसती है
मैं देखता हूँ उसकी गहरी नाभि में
अपना नीला चिरयुवा बिम्ब
एक सूरज प्रचंड सा नदी में गहरी डुबकी लगाता है
छपाक घुप्प बुडूप बुडूप
एक बुलबुला बुदबुदा गया
और रात मुरझा जाती है
दबे रह गए समस्त विद्रोह के स्वर
गुम्फित रह गए समस्त सारे विचार आरोह
छोड़ कर सारे स्वप्न इसी धरा पर
उड़ जाती है आत्मा तज कर यह देह
यम-न्याय-नियम-दंड के सोंटों से पिट कर
बंधी हुई अभिशप्त यह आत्मा
जा बैठती है पुराने बड़हड विटप पर
बसते यक्ष किन्नर प्रेत पिशाच जहाँ पर
अधमुये आत्मा वाले अधकटे शरीरों वाले
लूले लंगड़े पंगु
गले हुए ठूंठ अंगों वाले
ढूंढते विटप की कोटरों में
रौरव नरक द्वार
रेंग कर पंकिल सुरंगों से
चला आता हूँ अनूठे लोक में
समय के बहाव से अक्षुण
देश की परिधि के पार
सभ्यता के इस पार भटक आता हूँ
देखता हूँ गूढ़ रहस्य संस्कृति के
समाज के अनगढ़ जटिल यंत्र
जाज्वल्य भास्वर प्रश्न
मंदिरों के पिछवाड़े में
खोदता नुकीली खान्तियों से
गहरे खंदक दफ़नाने को
कई जिन्दा मिथक, जाग्रत इतिहास
घोर घनघोर अधोर पीठ में
होते गहन मंत्रोच्चार
बैठे ब्रम्हराक्षस हजार
देते हवन अंगूठों का
ध्वजा गाड़ कर प्राचीरों पर
गुरुकुलों के अन्दर प्रांगणों में
हो रही है कीमियागरी
गढ़ रहे हैं तत्व, तथ्य, नया मनगढ़ंत व्याकरण
रच रहे धर्मसूत्र ध्यानलीन बटुकराक्षस
भक भव्य सुवर्णाभ राज प्रसादों में
अटके हैं नीले मेघ गवाक्षों पर
मखमली परदों के पीछे सज रहे हैं रंगमहल
मांझे हुए रेशम से बुने हुए ऐन्द्रजालिक अन्तःपुर
हो रहे हैं द्धयूत चौसर रस काम क्रीड़ा विहार
बैठे सिंहासनों पर गरबीले रोबदार कटपूतन
रच रहे हैं नये सत्ता सूत्र संतरण
सज रहे हैं खड्ग फरसे बरछे भाले ढाल
बुन रहे हैं युद्धों के नये भूतजाल
अलंकृत हो रही है रजनी कर अधुनातन श्रृंगार
हाटों के चाकचिक्य में
रत्न जटित देह बैठे हैं बिकने को तैयार
गुलाबी अट्टालिकाओं की दमकती गद्दियों पर
लेटे, खोदते खुजलाते अपनी देह
गिनते सुवर्ण पणक बंद कर दीवारों में कागजात
मीठी नींद में उंघते उतराते प्रवर मैत्राक्ष
जोत रहे हैं धूसर बंजर खेत पथार
काट रहे हैं मिट्टी चटियल टीलों से
रीन्ध कर अपने स्वेद कणों से
तपाकर कर आंच में अपनी पका रहे मृदभांड
ढो रहे हैं चुप चाप भारी पालकी में
बोझिल सदियों की परम्पराएँ वृषभ स्कंधों पर
भून रहे हैं सूखे धान
गर्म तपती रेत में उदरों के
धो रहे हैं देह अपनी काली भैंसों के साथ
बढे हुए केशों वाले टेढ़े नाखूनों वाले चैलाशक
खा रहे हैं जो दाने बीन कर लीदों से
नोंच कर चूहों के रोम गुर्दे जिगर
उधेड़ कर चमड़ी मरी हुई गायों की
ओढ़ कर हिकारत की मैली चादर
मार कर आत्मा अपनी
ढो रहे हैं माथे पर पंकिल पुरीष
बांध कर कमर में ढोल झाड़ू
पीट रहे हैं आत्मा अपनी
चाटते जूठे पत्तल पंचकीलक
कूट रही है ढेंकी रात भर
धान में मिला कर अपने भाग्य
बाँध कर पीठ से भुतहे अंकुर
खौलाती है नादों में बगावत के धान
उल्टे पैरों वाली कीच्चिन
फिर थक कर कोसती है
अपनी योनि अपना यौवन
बैठ कर इनारों के काईदार मुंडेरों पर
खींचती है रात भर जल कलश
जम्हाईयाँ लेती बासी बेमजा जिन्दगी पर
जो झल रही है चंवर
वह बायमत
कर रही हमाली रात दिन
पाने को अपना सौभाग्य
अपना आभरण
मांग रही है सूनी गोद भरने को
बिलखते हुए भटकती है
सिसकती है सुबकती है
भूसों से भरी अटारियों पर
मलगुजी घूंघट खींचे
खखनती है कोई बाँझ भकोल
दबी सारी हूकें दबे सारे स्वप्न
जागती जलती चिनकती नींदों में
उठते हैं दुरूह सशंकित प्रश्न बिम्ब
पूछते हैं उलटबंसियाँ
शिरीष की टहनियों से लटके बूढ़े बेताल
कुढ़ कर उस इतिहास बोध पर
ढो रहा जो मरी हुई जाहिल परम्पराएँ
अपनी झुकी हुई पीठ पर लादे
गहरी सत्ता का आतंक
मार गया है काठ जिसकी आत्मा को
घिस रहा है देह अपनी
चौखटों पर मंदिरों के
मौत के सन्नाटे वाली
अधमरी नींदों में कर रहा जो
सतत प्रदक्षिणा प्रतिमाओं की
समझे हुए सच का वह अनजाना दबाव
हीरक बना गया ऋत तरल मति मेरी
लेटी हैं रूढ़ियाँ अधमुई सी
मंदिरों की सीढ़ियों पर
लांघे उन्हें कौन
कौन बदले मूर्तियाँ गर्भ गृहों की
कैसे गढ़े नये देवता
प्रश्न गुरुतर कार्य दुष्कर
बेड़ियाँ पहने जो हैसियत है मेरी
छटपटा कर खीज कर अपने ऊपर
घुट कर खदक कर
खोजती है जड़ें अपनी
खोदती है प्राक-इतिहास की मरी हुई शिराएँ
नये समीकरण नए आयाम नयी विमायें
कब तक उतारूँ ऋण
उस एहसान का
भरता रहूँ कब तलक वह सूद
रिश्तों का उलझनों का
सहता रहूँ कब तक वह पारंपरिक गर्व बोध
लटकता रहूँ कहाँ तक
जिन्दा गोश्त की बोरियों सा
चल रही जो क्रांति की धारा कोई
लेकर चल रहे मशाल तेज झंझावातों में जो
फूंक कर प्राण मिट्टी में भी
बढ़ रहे हैं जो जिन्दा जुलूस
तोड़ कर अचेतन के भयावह कारागार
दे रहे दीर्घ पुकार
मुक्त हो अपने चेतना मोहन-गृह से
अभय हो जाता हूँ मैं भी
उस लोकगंगा में नहा कर
एक अज्ञात छाया टुकड़ी
खोज रही जो गुप्त द्वार
दुर्भेद्य दुर्गों के
छिप कर अंतर-वीथियों से
पैठ जाती है राज-प्रासाद में
अनभिज्ञ प्रहरी बेसुध द्वारपाल
अन्तःपुर की दीवारों से रिसते हैं षड्यंत्रों के अंतर्श्राव
सुन कर समझ कर समस्त यंत्र-तंत्र
मोहन मारण उच्चाटन मंत्र
आन्तरिकाओं में भूलता भटकता
उतर आता हूँ ताहखानों में
ढेर सारे प्रेत पिशाच
सड़ रहे हैं सदियों से जो बंदीगृहों में
भोग रहे हैं राजद्रोह राजदंड
बरसों से जल रही जो आग है
लिख रही है ज्वलंत गीत आँखों के गूमड़ों में
काल कोठरी की दीवारों पर
छन रही है रात भर स्मृति चिन्ह
ललकार कर शौर्य अपना
धिक्कार कर सत्ता की प्रभुता
विच्छिन्न कर सारी लौह श्रृंखलाएं
फूंक कर आजन्म परम्पराएँ
जीत लाते हैं समस्त दिशाएं
बढ़ता जाता है जुलूस
और बढती जाती है क्रांति की भागीदारी
सत्ता की हिस्सेदारी में
पड़ जाती है दरार
रचे जाते हैं नये न्याय नियम संगठन
होता है जीर्णोधार
मिलती है मुक्ति कलंकित इतिहास से
पर अतृप्त रह जाता हूँ मैं
पारितोषिकों को मान कर प्रारब्ध
खा कर संतोष मोदक
राज्य सेवा धर्म लीन
बना रह गया मैं
गुरुसेवक राजसेवक स्वयंसेवक
घिस रहा यह आत्मा फिर किसी अज्ञात मुक्ति के लिए
अतृप्त रह गया कोई और छाया झुण्ड
जो बुन रहा षड़यंत्र है
किसी नयी अंतर क्रांति का
महलों से दूर
पहाड़ी मंदिरों की ओट में
रच जा रहे हैं पुनर्जागृति के गीत
फंस कर रह गयी जो राज-लिप्सा आत्मा में
खोजती है नये गुप्त द्वार गुफा मंदिरों में
किसे कहें विश्वासघात
उस महात्वाकांक्षा को जो सच की पक्षधर है
जो बिफर उठती है अन्याय देख कर
जो देखती है स्वप्न महलों के
नये इतिहास के लिए पुलकती है
तड़पती है नए आदर्शों के लिए
याकि चुकाते रहें सूद उपकार का
बैठ कर उकडू सत्ता के बुलबुले के अन्दर
कोसते रहें अपना भाग्य
भव्य राज-प्रसादों के चाक-चिक्य में
विन्यस्त है एक गहन दबाव
बौनी हो जाती है मेरी प्रतिभा
सत्ता का एक धीमा प्रभुत्व
एक सधी हुई दबिश, रक्त के धब्बे
और एक शैतानी साजिश
रचते हैं कूट संकेत चिन्ह
टूटती जाती है यह आत्म संघर्ष रत आत्मा
कि कोई पीटता है सांकल अंतरपट के
अंतर्मन का कवच भेद कर
चली आती है वह सत्ता की देवी
सजा कर स्वर्णिम स्वप्न पलकों पर
गूंथ कर कीर्ति अलकों में
झाँक कर मेरी राज हवस में
चुरा लेती है मेरा मन
अग्निगर्भा वह ग्रस लेती है चिंतन
रात के पिछले प्रहर में
लिए रुनझुन पायलों की झंकार
लांघ जाती है स्वप्नों को वह मोहिनी
छू कर गुलाबी नाखूनों को
दिखाती है श्वेत धवल बक चिन्ह
बताती है मेरी गहरी हथेली का रंग
समझाती है करतल में
ग्रहों के पर्वतों का विस्तार
इंगित करती है रेखाओं पर
उगे वृत्त वलय त्रिकोण
बिंदु मेखलाओं के संकेत चिन्ह
पकड़कर मणिबंधों की हरी शिराएँ
उतर आती है रूधिर में
नदी की लहर चाल सी उठती गिरती
बहा ले जाती है स्वप्न वाटिकाओं में
गिनती है रात भर मेरी दाहिनी ओर के तिल
लेप कर त्रिवलियों में चन्दन
खोजती है नाभि में वामावर्त शंख चिन्ह
सोंट कर शरीर स्निग्ध ताप में
कानों में कुछ कह कर
लगा कर गांठें अंतर्मन पर
लुप्त हो जाती है वह विपथगामिनी
नींदों में गिरते चढ़ते बार बार
उकसा जाती है फिर वही
अस्मिता के तीव्र प्रश्न
वर्चस्व के धीमे समीकरण
स्वर्णाक्षरों में नामांकन
बलिदान का मूल्यांकन
भींच कर मुट्ठियाँ अपनी
होकर दृढ प्रतिज्ञ स्थित प्रज्ञ
पकड़ कर इतिहास वलय
लेकर खड्ग रज्जु, नवदल के संग
प्रविष्ट कर प्रांगणों में मंदिरों के
फांद कर अलंकृत तोरण द्वार
उतर कर गलियारों में
लपक कर लांघ जाता चोटियाँ
उखाड़ लाता हूँ स्वर्ण कलश
हर्मिका पर लगे छत्र ध्वज
खोद कर गर्भ गृहों को
निकाले जाते हैं स्थापित देवता
और गला कर बेड़ियाँ दासता की
पिघला कर सारे इतिवृत्त अयस्क
गढ़े जाते हैं नये देवता
राज प्रासादों के भव्य आहातों में
गलियारों में पकड़ कर कीर्ति स्तंभों
के गढ़े हुए मोखे माप कर जोख कर
एक एक कदम घुस आता हूँ
रंग शयन कक्ष में
रत्न खचित दीवारें, झीने महीन परदे
सुलगा जाते हैं अंतर के समस्त आकांक्षा द्वार
लेटा हुआ वर्तमान ओढ़ कर
सुखद भविष्य की नींदों में लीन
वह निश्छल गूढ़ सत्तारूढ़
हनता हूँ जिसे आँखें मूँद कर
अपनी आत्मा को समझा कर
नया भविष्य गढ़ने
नया इतिहास रचने
एक ही झटके में
कर धड़ से अलग सर
खींचता हूँ दीर्घ नीरवता के उसांस
अपनी अधमरी आत्मा में
झांकता है सरकटा चाँद
संकीर्ण वातायनों से
क्षेत्रकों में दूर तक उठते हैं
अग्नि के भीषण हौल व्याल
उद्धत हैं गढ़ने को नये प्रमेय
समस्त परिवर्तनकामी छायाकृतियाँ
अन्दर ही अन्दर भारी सा हुआ मैं
गीली नमक की बोरियों सा रिसता हुआ
उतर आता हूँ खोखले चबूतरों पर
बैठ कर रक्त रंजित सीढ़ियों के सिंहासन पर
जलती हुई आत्मा लिए
गंदली पीली छाया लिए
बोझल देवत्व लिए
बन जाता हूँ मैं
गुरुहंता राजहंता चक्रमस्तक
ग्लानिभक्षक गजलोचन राजराक्षस
अनगढ़ विमाओं में छीलता रीन्धता
नये न्याय नियम उदाहरण
करता झूठी प्रभुता का प्रदर्शन
बनवाकर नये कीर्ति स्तम्भ
खुदवाकर नये कीलाक्षर वृत्तखंडों में
बंधी हुई आत्मा लिए
खोदता हूँ उखड़ती साँसों में
अपनी बू अपनी घिन निरंतर
कहाँ छू पाता हूँ वो आदर्श जिनके लिए
बदल डाला यह प्रारब्ध तोड़ डाले सारे नियम
रच दिए नए व्याकरण
कब उठ पता हूँ अपनी नज़रों में
जिनके लिए बुन डाले समस्त जाल गहन
पीस डाले अस्थि पिंजर
पिघला कर यह देह अपनी
बना डाले स्वर्ण आभरण
कूंथता हुआ अपनी ही जिद में
अपने भंवर में अपनी लहर में
भटकता अनंत योनियों में निरंतर
रगड़ता भाल बलिवेदियों पर
खोजता फिर नये अर्थ जीवन के
खोजता फिर नये मार्ग मुक्ति के
गाता नये मुक्तक आत्मा के
भवचक्र में फंसा रह गया फिर
बन गया मैं
आत्म-रिक्त आत्म-क्षत आत्म-च्यूत
आत्म-छ्ली राजराक्षस
अद्भुत! अभी और पढ़ने पड़ेगी यह कविता..फुर्सत में।
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut badhiya ....saab maza aa gaya....
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट " जाके परदेशवा में भुलाई गईल राजा जी" पर आपके प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । नव-वर्ष की मंगलमय एवं अशेष शुभकामनाओं के साथ ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक अच्छी रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ | compressed it.. please...
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