
लालबत्ती के गिर्द मिलते हैं
जलती बुझती हुई आँखों वाले
उधरे-चिथड़ो में सजीले बच्चे
थमती कारों पे भाग के झट से
दोनों होठों को खींच कानो तक
कांच पर जिस्म छोड़ देते हैं
तंग जिस्मों में ये ढीले बच्चे
रूखे हांथों में उठाये कितने
मैगज़ीनो के मुलायम जत्थे
नामचीं नोवेलों की सस्ती नकलें
वक्त काटने की सौ तरकीबें
रोज़मर्रा के काम की चीजें
नन्ही जेबों से तिजारत करते
कलसती धूप में पीले बच्चे
कभी बसों में जो चढ़ आते हैं
उँगलियों में फंसाए पिठू
उलझी तर्जों को बड़बड़ाते हुए
जी बड़ा बेसुरा सा करते हैं
जब भी गाते हैं सुरीले बच्चे
हफ्ते - दर- हफ्ते हर शनीचर को
तेल के कुन्ड लिए हाथों में
डर दिखाते सइययारों का
शक्ल पर पोते दुआ
लाल काले गोरे नीले बच्चे
किसने लाकर के यहाँ छोड़ दिया
गोया लिख कर के कोई एक मिसरा
किसी शायर ने कर दिया खारिज
ला-मुक्कमल,
अपने माअ'नी को तरसते हुए
लाल बत्ती के गिर्द मिलते हैं
भीगती उम्र में गीले बच्चे
- विनीत राजा
फोटोग्राफ हिन्दू से
मार्मिक चित्रण..
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut badhiya
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