17 मार्च 2012

वह जुलाई थी या अगस्त


वह जुलाई थी या अगस्त

ठीक ठीक याद नहीं हैं
बस इतना याद है
बारिश हो रही थी
और सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये
घुटनों तक डूबी वह भीग रही थी

सर पे धान के हरे-हरे बिचरों का बोझा,
पांक से लिथड़ी उसकी सुगरपंखी फ्रॉक,
नाक में तार की मुडी हुई नथुनी,
और मेह गिर रहा था हम दोनों के बीच

वह रोपनी का आखिरी दिन था
उसके बाद छोड़ आया सिंगाही
छोड़ आया अपना पानी
छोड़ आया अपनी बोली
छोड़ आया वहीं चौर के शीशम के पेड़ से टंगी अपनी कमीज़

कैलेंडर में साल बदले हैं स्कूल और कॉलेज बदले है
बदले है शहर फटे बनियानो की तरह
जीता रहा हूँ अपने ही देश में विस्थापितों की तरह
जिन्दगी में आई है लडकियां
जैसे आती हैं बरसाती नदियाँ
छप्पर तक बहा के ले गयी हैं
फिर भी बची रह गयी है माँ की दी हुई चूड़ियाँ

उलझा रहा हूँ किताबों के मकड़जाल में
रटता रहा हूँ गणित के दुर्लभ प्रमेओं को
सोचता रहा हूँ आदमी को गुलाम बनाने वाले अल्गोरिथमो के बारे में
टावर ऑफ़ हनोई के बारे में
यूलेरियन सर्किट के बारे में
हेमिल्टोनियन ग्राफ के बारे में
आज ऑफिस से जब घर लौटा हूँ
अकेले बंद कमरे का दरवाजा खोला हूँ
बिस्तर पे लेट के जैसे हीं आँखे बंद की है
तो ऐसा लग रहा है
सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये वह अब भी भीग रही है
और शीशम के पेड़ से टंगी वह कमीज़ अब भी वहीं हिल रही है



सुधांशु


*सिंगाही  - गाँव का नाम

7 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ दृश्‍य दिमाग से कभी नहीं हटते ..
    बहुत सुंदर प्रस्‍तुति !!

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  2. बहुत सुन्दर रचना -जहाँ अस्तित्व-बोध पाया वहाँ से दूर आकर बहुत कुछ घेरता है पर आत्म का हिस्सा नहीं बन पाता !

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