
व्यंग मत बोलो |
काटता है जूता तो क्या हुआ
पैर में न सही
सर पर रख डोलो |
व्यंग मत बोलो |
अन्धों का साथ हो जाये तो
खुद भी आँखें बंद कर लो,
जैसे सब टटोलते हैं
राह तुम भी टटोलो |
व्यंग मत बोलो |
क्या रखा है कुरेदने में,
हर एक चक्रव्यूह भेदने में ,
सत्य के लिए
निरस्त्र टूटा पहिया ले
लड़ने से बेहतर है
जैसी है दुनिया
उसके साथ हो लो |
व्यंग मत बोलो |
कुछ सीखो गिरगिट से
जैसी शाख वैसा रंग
जीने का यही है सही ढंग
अपना रंग दूसरों से अलग पड़ता है तो
उसे रगड़ धो लो |
व्यंग मत बोलो|
भीतर कौन देखता है
बाहर रहो चिकने,
यह मत भूलो
यह बाज़ार है
सभी आये हैं बिकने,
राम-राम कहो
और माखन-मिश्री घोलो |
व्यंग मत बोलो |
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
(पेंटिंग रविन्द्र नाथ टैगोर की)
बोलना घातक है, मुँह न खोलो।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज का दौर तो ऐसा ही है !
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