इस शहर-ए-खराबी में
गम-ए-इश्क के मारे
ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे
ये हंसता हुआ लिखना ये पुरनूर सितारे
ताबिंदा-ओ-पाइन्दा
हैं ज़र्रों के सहारे
हसरत है कोई गुंचा
हमें प्यार से देखे
अरमां है कोई फूल हमें दिल से पुकारे
हर सुबह मेरी सुबह पे
रोती रही शबनम
हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे
कुछ और भी हैं काम
हमें ए गम-ए-जानां
कब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे
हबीब जालिब
umda ghazal baantne ke liye thanku bhaiya
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - बामुलिहाज़ा होशियार …101 …अप शताब्दी बुलेट एक्सप्रेस पधार रही है
प्रत्युत्तर देंहटाएंकुछ और भी हैं काम हमें ए गम-ए-जानां
प्रत्युत्तर देंहटाएंकब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे
लाजवाब ग़ज़ल है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंलाजबाब ग़ज़ल है , हबीब जालिब जी की, कुछ और ग़ज़ल रविंदर गोयल सर से पढने को मिला अच्छा लगा ;
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपका शुक्रिया हबीब जी की एक और ग़ज़ल कई लिय;