20 मई 2012

ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे

इस शहर-ए-खराबी में गम-ए-इश्क के मारे
ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे

ये हंसता हुआ लिखना ये पुरनूर सितारे
ताबिंदा-ओ-पाइन्दा हैं ज़र्रों के सहारे

हसरत है कोई गुंचा हमें प्यार से देखे
अरमां है कोई फूल हमें दिल से पुकारे

हर सुबह मेरी सुबह पे रोती रही शबनम
हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे

कुछ और भी हैं काम हमें ए गम-ए-जानां
कब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे

हबीब जालिब

5 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ और भी हैं काम हमें ए गम-ए-जानां
    कब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे

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  2. लाजबाब ग़ज़ल है , हबीब जालिब जी की, कुछ और ग़ज़ल रविंदर गोयल सर से पढने को मिला अच्छा लगा ;
    आपका शुक्रिया हबीब जी की एक और ग़ज़ल कई लिय;

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