29 फ़रवरी 2012

ऊँचाई

मै वहाँ पहुँचा
और डर गया

मेरे शहर के लोगो
यह कितना भयानक है
कि शहर की सारी सीढ़ियाँ मिलकर
जिस महान ऊँचाई तक जाती है
वहाँ कोई नहीं रहता!

-केदारनाथ सिंह

14 फ़रवरी 2012

अपनी स्वतंत्रता की खातिर

बुन कर गहन षड़यंत्र
खोद कर गहरे गड्ढे गबड़े गह्वर 
ढँक कर पत्तों से पुआलों के छलावे से 
हरी घास से लीप पोत कर
बैठा है ताक में बहेलिया बन कर
जो सभ्य समाज
फाँस लेता है मुझे
गरिष्ठ लौह जालों में
पीट कर भालों से, चाबुकों से सोंट कर
पालतू बना देता है मुझे
बाँध कर दीर्घ वृत्तों में
भीमकाय लौह स्तंभों के गिर्द
सामंतों के खलिहानों में
मंदिरों के प्रांगणों में
बना देता है तमाशे की चीज


चुपचाप सहता हूँ मैं
उनकी लाठियाँ उनके बरछे उनकी गालियाँ
वो बताते हैं कि यह अनुशासन है
यही नियमन है ऐसे ही न्याय हैं
कि मैं सभ्य बनूँ
संयमित रहूँ
अनुशासित बनूँ
नियमों में ढलूँ


पर मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात
कि मैं स्वतन्त्र विचरण करता था
जंगलों में बीहड़ों में
मेरा भी परिवार है कहीं फूलों की घाटियों में
मुझमें भी उठते हैं कामना के ज्वार
मैं भी पाना चाहता हूँ
प्रियतमा का प्यार
पीना चाहता हूँ सत्ता रूपसी की छाँव


कभी कभी बढ़ाना चाहता हूँ कदम
इस बंधी हुई परिधि के पार
मैं भी कहना चाहता हूँ अपनी बात अपनी आह पुकार
पर वो कहते हैं कि
मेरे पास एक सभ्य भाषा नहीं है
जीने का कोई ढांचा, सलीका नहीं है
मैं अनगढ़ हूँ मेरे पास वो संस्कृति नहीं है
कि मैं रूढ़ हूँ ,ढक हूँ


बहने लगता है कानों से मेरे पिघला हुआ गुबार
आँखों में बहती है वेदना की मोटी धार
तब तोड़ देता हूँ मैं बंधी हुई सारी बेड़ियाँ सदियों की
छेद देता हूँ परम्पराओं की भोथरी ढाल
भटकता हूँ उन्मथित व्यथित अतिक्रांत क्रुद्ध हो कर
अपनी स्वतंत्रता की खातिर


नहीं सहन कर पाते हैं जो सत्ता सामंत
छोड़ देते हैं मुझ पर कुलीन कुलक लम्बग्रीव ऊँट
जो चबा डालते हैं मेरे कान
पालतू कुत्तों की टोलियाँ
भून्कती है बाजारों में मुझ पर
लुलकारते हैं बैठे चाटुकार
चुनौती देता है मुझको यह तंत्र
परखता चाहता है मेरा संबल मेरी सहिष्णुता मेरी जिजीविषा


फिर क्रुद्ध हो निरुपचार
उखाड़ लेता हूँ वो हाथ
जो भोंकते हैं नुकीले गजबांक
मगज के गहनतम तहों तक
बन कर ढीठ सत्ता के पीलवान


घुस कर संस्कृति के परिसरों में, सरोवरों में, मंदिरों में
रौंद देता हूँ सारे खिले हुए कमल
जो पीकर रक्त पंकिल मिट्टी का 
इठलाते हैं उन्ही पर
रच कर स्वांग ढोंग पवित्रता का
चिढाते हैं मुझे अघोर कह कर
दलित कह कर
दमित बना कर
उठा कर सूंढ़ अपनी हवाओं में
विजयी मुद्रा में
देख कर नीला निरभ्र आकाश
मुस्काता हूँ
बुनता हूँ नए स्वप्न भविष्य के 
गढ़ने को नए उपमान संस्कृति के
नए समाज की नींव के लिए 
नए इतिहास के लिए .......


दीपांकर कौंडिल्य

7 फ़रवरी 2012

पांगी

आशीष पाण्डेय

हिमालय की बर्फीली चोटियों से हर रोज सूरज निकलता है पांगी घाटी को देखने के लिए। सूरज की मखमली छूवन और बर्फ की ठंड़ी हवाओं से गुनगुनाती-गाती पांगी घाटी कुदरत का करिश्मा है। वर्षों से खुद को सहेजे-खुद को समेटे ये पांगी घाटी आज भी अपने जीवन को ऐसे जी रही है, मानो भूत, भविष्य और वर्तमान एक ही जगह मिल गए हो- ये पंगवालों की पांगी घाटी है।

हिमाचल प्रदेश के 12वें जिले के रूप में चंबा अपनी खास पहचान रखता है। चंबा को हिमाचल के ताज में लगे नगीने के रूप में जाना जाता है। इस जिले की लम्बाई और चौड़ाई दक्षिण-पश्चिम से उत्तर पूर्व में 70 मील और चौड़ाई  दक्षिण से उत्तर पश्चिम में 50 मील है। चंबा जिले की निचली घाटी दो छोटी घाटियों में बँटी है। रावी घाटी में बसी है मनमोह पांगी जबकि चेनाब घाटी में चंबा लाहौल। हिमालय को तीन बर्फीली श्रेणियों में बाटा गया है, जिसमें पहली श्रेणी है बाहरी हिमालय यानी धौलाधार श्रेणी, इसे चंबा परिक्षेत्र भी कहा जाता है। दूसरी श्रेणी मध्य हिमालय यानी पांगी परिक्षेत्र और तीसरी श्रेणी यानी आंतरिक हिमालय इसे जांस्कार श्रेणी भी कहा जाता है।

पंगवालों की यह धरती जाड़े के 4-5 महीने पूरी दुनिया से कटी रहती है। मौसम की तमाम दुश्वारियों  के बावजूद पंगवाल यहां सदियों से रहते चले आये हैं। चंबा जिले के इस छोटे से उत्तरी परिक्षेत्र पांगी में जीवन कितनी कठिनाइयों से गुजरता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुराने समय में चंबा राज्य के जिन कर्मचारियों की नियुक्ति इस क्षेत्र में होती थी, उन्हें वेतन के अलावा अंतिम क्रिया-कर्म का विशेष खर्च भी दिया जाता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य प्रशासन का मानना था कि जो भी व्यक्ति पांगी प्रशासनिक कार्यों के लिए जाता था, उसके जीवित वापसी की उम्मीद कम ही रहती थी। ठीक उसी  तरह पांगी को यातना क्षेत्र के तौर पर भी जाना जाता था, और यही वजह थी कि पुराने जमाने में भयंकर अपराधियों के साथ-साथ राजनैतिक अपराधियों को बतौर सजा पांगी भेज दिया जाता था, यह क्षेत्र बिल्कुल वैसे ही था जैसे काले पानी की सजा के लिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह। पांगी जब चंबा राज के अधीन क्षेत्र हुआ करता था, तो उसमें चंबा से पांगी चिठ्ठी पंहुचने वाले डाकिये को बतौर पारिश्रमिक एक अशर्फी  दी जाती थी, डाकिये को अशर्फी की अदायगी उसके कठिन परिश्रम और हिम्मत के लिए दी जाती थी।

किसी भी समाज में धर्म आस्था और विश्वास से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू होता है। पांगी के पंगवालों का समर्पण हिन्दू सभ्यता-संस्कृति में है। दसवीं शताब्दी में महाराजा वर्मन के काल में चंबा विष्णु का प्रभाव नगण्य था। पंगवाल मुख्यतः शिव की पूजा करते हैं। शिव के रूद्र रूप और लिंग रूप की पूजा करने वाले पंगवालियों का इतिहास भी प्रभु शिव के साथ जुड़ा हुआ है। 700.पू. में महाराजा मेरूवर्मन ने कई शिव मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें मनिमहेष शिव का मंदिर प्रमुख है। प्रभु शिव की पूजा पंगवालियों के दिनचर्या में शामिल है, परन्तु रविवार को प्रभु शिव  की पूजा विशेष तौर पर की जाती है।


पंगवालियों की पांरपरिक पूजा में नाग देवता का प्रमुख स्थान है। पांगी घाटी में लगभग हर जगह हर गांव में नाग देवता के मंदिर पाये जाते हैं। पत्थर पर उकेर कर बनाये गये नाग देवता के आस-पास सर्पों की आकृति बनी होती है और उनके पास ही प्रभु शिव  का प्रतीक त्रिशूल भी होता है। इन मंदिरों के आगे शेर की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं।

हिन्दु धर्म के विभिन्न देवी-देवताओं के साथ-साथ पंगवालियों में प्रकृति पूजन का भी विशेष महत्व है। वर्षा के देवता स्वरूप इंद्र और जल स्वरूप प्रभु वरूण के अलावा नाग वर्षा के देव स्वरूप की पूजा की जाती है। इनके अलावा पंगवालों के हर घर के अपने कुलदेवता भी होते हैं। इन्हें कुलजकहते हैं। इन कुलदेवताओं के पूजा-पाठ की पद्धती पंगवालियों की अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति पर आधारित है। धूप के धुंए में...नागाड़ों की थाप पर घंटियों की आवाज और इन सबके बीच शंख का नाद इनके पूजा में शामिल आवश्यक भाग है। पंगवालियों के पूजन विधि में पशुओं की बली के साथ-साथ शराब को भी प्रसाद के तौर पर चढ़ाया जाता है।

पंगवाली समाज में जातिगत व्यवस्था हिन्दूमान्यताओं के अनुसार है। पंगवालियों में ब्राहम्ण, क्षत्रिय, हाली, लोहार, डाकी, मेघ और अर्या से लेकर कई अगड़ी और पिछड़ी जातियां पायी जाती हैं। पांगी घाटी में मुख्यतः ब्राहम्ण, क्षत्रिय के साथ-साथ पिछड़ी जातियों का समावेश दिखाई पड़ता है, परन्तु वैष्य जाति जो कि मुख्य रूप से व्यवसाय या व्यापार पर आश्रित रहने वाली होती है। पांगी घाटी में नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि पंगवालियों का व्यवसाय से सीधा कोई जुड़ाव नहीं था। हिन्दू मान्यताओं के आधार पर वंशानुगत जातिव्यवस्था का प्रभाव पांगी घाटी में पूर्णतः प्रचलित अवधारणा है। भाषाई आधार पर पंगवालों की विकास यात्रा ने तमाम पड़ावों को पार किया है। इनकी यह  भाषाई यात्रा संस्कृत से शुरू होती है और बाद में हिन्दी, ऊर्दू और अंग्रेजी भाषाएँ इसमें मिलकर ऐसा संगम बनाती है, जिसमें पहाड़ी असर के साथ-साथ गंगा-जमुनी सभ्यता भी नजर आती है। पंगवाली घाटी में क्षेत्रीय स्तर पर धाली, मुंशी और बुनोशी जैसी भाषाओँ का व्यापक प्रभाव है। समय परिवर्तन के साथ जैसे-जैसे सभ्यताएं बदलती रहीं वैसे-वैसे भाषाओँ में बदलाव आते रहें। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और शायद यह बात पंगवाली सदियों से जानते आ रहे हैं।

भौगोलिक संरचना के आधार पर पंगवालियों के गांव पहाड़ियों के आस-पास ही बसे होते हैं। घाटी के निचले क्षेत्रों में जहां गांवों की बसावट सघन होती है, वहीं पहाड़ों की ढ़लानों पर घरों की संख्या सीमित हो जाती हैं। पंगवालियों के घर दो से तीन मंजिले के होते हैं। इन घरों में भूतल का प्रयोग पहाड़ी परिपति के आधार पर पशुओं के रहने के लिए और उनके चारे-पानी रखने के लिए किया जाता है। इस भूतल को कोठ कहते हैं।

घर की पहली मंजिल का प्रयोग पंगवाली परिवार अपने रहने के लिए करते हैं। इनके घरों में पहली मंजिल के छत के साथ बरामदा भी होता है। पहली मंजिल को पंगवालियों ने बुखारी का नाम दिया है। आमतौर पर इसके घरों में खिड़कियों का अभाव होता है, लेकिन रसोई के धुएं की निकासी के लिए चिमनियां जरूर बनी होती हैं। पंगवाली अपने घरों के निर्माण के लिए पत्थरों का प्रयोग करते हैं और घरों की दीवारें काफी मोटी होती है, ताकी भारी हिमपात के स्थिति में भी घरों की मजबूती बनी रहे। घर को सीलन से बचाने के लिए और घरों को जलरोधी बनाने के लिए भोजपत्रों को छत पर बिछाने की परंपरा पंगवालियों को अपने अतीत से मिली है।

घरों का निर्माण शुभ मुहूर्त में किया जाता है। यह शुभ मुहूर्त ब्राहम्ण के बताये दिनों के अनुसार होता है। घर के शिलान्यास से लेकर उसको बनाने के लिए आवश्यक लकड़ियों के इंतजाम तक पंगवाली विषेश मुहूर्त में करते है। इस दौरान उत्साह के साथ-साथ उत्सव का माहौल रहता है। यह उत्साह और उत्सव का माहौल रहता है। यह उत्साह और उत्सव इसलिए होता है कि इनके समाज में एक नया घर जुड़ रहा होता है।

शिलान्यास को पंगवाली भाषा में मन्याद रखना कहते हैं। मन्याद रखने के समय भवन की नींव में सोना, चांदी, फूल और सरसों के दाने के साथ लुचि के टूकड़े को कटोरे में भरकर नींव में रखा जाता है। जंगल से लकड़ियों की चुनाई के रस्म को नियास कहते हैं। नियास के दौरान ग्रामीणों का समूह जंगल जाता है और घरों में प्रयोग होने वाली लकड़ियों को काट कर लाता है। मकान के गृहप्रवेश को बधाई मनाना कहते हैं। इस दिन पंगवाली परिवार नये घर रहने के लिए प्रवेष करता है। इस मौके पर नाच गाने के साथ पीने-पिलाने का लम्बा दौर चलता है।

विकास की बहती बयार अब पांगी घाटी तक भी पहुंचने लगी है और इसी असर है कि पांगी घाटी के दुर्गम इलाकों तक बिजली पहुंच चुकी है। मगर फिर भी घरों को रौशन करने के लिए पंगवाली देवदार के सूखे तैलीय हिस्से को जलाते हैं। इसे जगनी कहते हैं।

पंगवाली जनजाति में परिवारिक संरचना भी हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ही होती है। परिवार का मुखिया पिता को माना जाता है। संयुक्त परिवार की अवधारणा लिए पंगवाली परिवार एक ही छत के नीचे अपनी जिंदगी गुजारते हैं और एक ही चूल्हे का पका खाना खाते हैं। परिवार में छोटे-बड़ों का स्नेह सम्मान और प्यार ही पंगवाली परिवार की मजबूत नींव है, जिसके आधार पर ही इसकी पारिवारिक संरचना टिकी रहती है। परिवार के किसी भी फैसले में पिता का निर्णय अंतिम और प्रधान होता है परन्तु पिता के फैसले में घर वालों की रजामंदी भी शामिल रहती है।

उत्तराधिकार के मामले में पंगवाली जनजाति पैतृक आधार को प्रमुखता देते हैं। पंगवालियों में उत्तराधिकार मामला दो प्रमुख स्थितियों में सामने आता है। पहला- जब पिता का देहान्त हो जाए, इस स्थिति में परिवार के बड़े पुत्र को मालिकाना हक चला जाता है। दूसरा जब पिता वृद्ध हो और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाता हो। उत्तराधिकार की इन सारी स्थितियों में पिता के अधिकार बड़े पुत्रों के हाथों में चले जाते हैं। हिन्दु मान्यताओं के अनुसार संयुक्त परिवार की अवधारणा लिए पंगवाली परिवार सुख-दुख को एक ही छत के नीचे गुजारते हैं। 

पंगवाली परिवार में दादा यानी पिता के पिता को दादू, दादी को दादी, ताऊ यानी पिता के बड़े भाई को बड़बाऊ, चाचा यानी पिता के छोटे भाई को मधबाऊ, पोते यानी बेटे के बेटे को पोत्रू, पोती यानी बेटे के बेटी को पोत्री, बुआ यानी पिता की बहन को फूफी और फूफी के पति को फुफेर आदि कहा जाता है।
पंगवाली जनजाति में विवाह की कई पद्धतियां प्रचलित हैं। उन पद्धतियों में मुलागी विवाह, पिथ-चुक विवाह, मोडयाली विवाह, सता-बता विवाह और कमाश विवाह प्रमुख हैं। मुलागी विवाह, वर और कन्या पक्षों की रज़ामंदी से होता है और इसे सामाजिक विवाह का दर्जा प्राप्त है। वहीं पिथ-चुक विवाह लड़के और लड़की के आपसी सहमती से अपहरण द्वारा होता है। इसे प्रेम विवाह की संज्ञा दी जाती है। इस विवाह में लड़का, लड़की का छद्म अपहरण कर लेता है और बाद में दोनों वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं। वहीं मोडयाली विवाह में वर कन्या से विवाह करने के लिए कन्या के पिता को धन देता है। समाजिक दृष्टि से मोडयाली विवाह को सम्मानजनक स्थिति तो नहीं प्राप्त है, परन्तु पंगवाली समाज में इस विवाह का भी चलन है। पंगवालियों में ही होने वाला सता-बता विवाह, ऐसा विवाह  है जिसमें वर को कन्या से विवाह के लिए कन्या के पिता के यहां सेवा-कार्य करना पड़ता है। सता-बता विवाह और कमाश विवाह मुख्यतः पंगवालियों की अपनी परंपरा की उपज है। पंगवालियों में विवाह की बुनियादी सहमती को पिल्लम सगाई को फिक्की और गठबंधन को क्षाकी कहते हैं। विवाह की सारी रीतियां लगभग हिंदू विवाह के समान ही हैं। विधवा विवाह को भी पंगवाली समाज में मान्यता प्राप्त है, ऐसे विवाह को टोपी लाना कहते हैं। पति की मृत्यु के एक वर्ष बाद उसकी विधवा स्त्री को किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह करने की स्वतंत्रता होती है।

पंगवाली समाज में स्त्री और पुरुष को समान अधिकार हैं। महिलाओं की स्थिति इस समाज में सम्मानजनक है। महिलाएं घर की आधारशिला होती है, घरेलू कामों के अलावा कृषि संबंधी कार्यों में भी महिलाओं की विशेष भागिदारी होती है। घर के फैसलों में महिलाओं की सहमती का भी विशेष ख्याल रखा जाता है। गहनों से पंगवाली महिलाओं को खासा प्रेम है गहने सस्ते हो या महंगे गहने बेशकीमती होते हैं, क्योंकि गहने रूप की सुंदरता को और भी निखारते हैं। पंगवाली महिलाओं के ज्यादातर गहने चांदी के बने होते हैं। इसके अलावा कुछ गहने पत्थरों और सिक्कों से भी बने होते हैं। पंगवाली महिलाओं में सिर और पैरों में गहने पहनने की न तो परम्परा है और न ही चलना इस समाज में महिलाएं ज्यादातर गहने कान, नाक, गले और हाथों में ही पहनती हैं। कानों में कारू पहना  जाता है, यह बालीनुमा बनी है, और इसकी संख्या 8 से 10 तक होती है। कानों में ही संगली भी पहनी जाती है जो जंजिरनुमा होती है, वहीं कर्णफूल भी कानों की षोभा बढ़ाते हैं। पंगवाली महिलाएं नाम कुरू पहनती हैं और गले में मोतीदाना, डोडदाना के साथ-साथ जंतर भी पहनती हैं।

पंगवाली महिलाएं और पुरुष दोनों ही हाथों में अंगुठियों और कानों में मुरकियां पहनते हैं। अंगुठियों और मुरकियों के अलावा पुरुषों में गहनों का कोई खास चलन नहीं है। पंगवाली  पुरुषों का पहनावा इनके सभ्यता और संस्कृति का परिचायक है। पंगवाली पुरुष घुटनों तक लम्बे कोट के साथ पत्तू से बने पायजामें पहनते हैं। यह कमर पर कमरबन्द जैसा फटका भी बांधते हैं जिसे भम्मिन कहते हैं। पैरों में पुआल के जूते ठंड से इनके पैरों की रक्षा करते हैं। वहीं महिलाएं पूरी बांह की कमीज पहनती है, जिसे कामेरी कहते हैं, और इस कामेरी के साथ पायजामें पहनती हैं, जिसे चालन कहते है। महिलाएं भी पैरों में पुआल से बने जूते पहनती हैं, भीषण ठंड से बचने के लिए महिलाएं कंबल को एक खास अंदाज से ओढ़ती हैं, जिसे जोली कहा जाता है।

पंगवाली दिन में तीन बार भोजन करते हैं, जिन्हें कलेऊ, रिहानी और बेहल कहते हैं। कलेऊ यानी सुबह का नाश्ता, रिहानी यानी दोपहर का भोजन और बेहल यानी रात का खाना। भौगोलिक वातावरण में कड़ाके की ठंड की वजह से पंगवाली लोग शाकाहार के बजाय मांसाहार को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। मगर दिन के भोजन यानी रिहानी में मांसाहार का प्रयोग कम ही करते हैं। सुबह के नाश्ते कलेऊ में पंगवाली लोग जौ के सत्तू को बिना भूने या पकाये ही, छांछ की तरह पानी घोल कर पीते हैं। दोपहर के भोजन यानी रिहानी में रोटी सब्जियों के साग या मांस के साथ खाया जाता है। पंगवाली भाषा में रोटी को घोघा के नाम से पुकारते हैं, सब्जियों का उपयोग रोजमर्रा की जिंदगी में होता है, इसलिए पंगवाली अपने घर के आस-पास ही सब्जियों की खेती कर लेते हैं। इन सब्जियों में फूलगोभी, पत्तागोभी, गाजर और फली जैसी सब्जियां शामिल हैं। रात के खाने में पंगवाली लोग रोटियों के साथ मांस या फिर सब्जियां ही पसंद करते हैं, परन्तु रात की सब्जियां या मांस को शोरबेदार तरीके से पकाया जाता है। खाना पकाने के लिए यह घलेल या अखरोट के तेल का प्रयोग करते हैं।

पंगवालियों में  चाय का शौक भी बड़े जोरदार तरीके का है, इसके साथ ही वह चोगा पेड़ की छाल से बना काढ़ा भी बड़े शौक से पीते हैं। यह चाय और काढ़ा नमकीन भी हो सकते हैं और मीठे भी। पंगवालियों की परंपरा में शराब पीने का दस्तूर भी शामिल है, शराब का चलन स्त्रियों और पुरुषों में समान रूप से है। पंगवाली रोजमर्रा की जिंदगी में पीने-पिलाने का शौक तो रखते ही है, लेकिन पर्व-त्योहार, शादी और अन्य मौकों पर भी शराब का चलन बहुतायत है। पंगवाली अपने पीने के लिए शराब, बियर, अराक खुद घर में ही बनाते हैं, इसके लिए ये गेहूं, जौ, इलो आदि का प्रयोग करते हैं।

पंगवालियों के रसोईघरों में प्रयोग होने वाले बर्तन धातु से बने होते हैं, इनमें तवा, कढ़ाई, लहेथ, कलछुल आदि प्रमुख हैं। इसके साथ ही इनके रसोई में पीतल की तसलू भी होती है, पंगवाली घरों में मिट्टी के बर्तनों का भी प्रयोग होता है, पानी रखने के लिए या दूध रखने के लिए पंगवालियों की पहली पसंद है मिट्टी के बर्तन। पुराने समय में पंगवाली लकड़ी के बर्तनों का भी प्रयोग करते थे, जो आज से समय में इतिहास बनते जा रहे हैं, इन बर्तनों में चान, चबुंगर और दुहान जैसे बर्तन प्रमुख हैं। चंबुगर बांस से बनता है, जबकि चान बकरे की खाल से बनता है और यह लकड़ी के फ्रेम से मढ़ा होता है। बदलते दौर के साथ पंगवाली रसोई में आधुनिक तरीके के बर्तन भी अपनी दखल बना चुके हैं।
          
कृषि कार्य और अन्न उपज के मामले में भी पंगवालियों  ने काफी प्रगति की है। भौगोलिक नजरिये से पांगी घाटी पहाड़ी और पथरीली है, लिहाजा खेती के लायक जमीन की तो कमी है, परन्तु मेहनती पंगवाली लोग कम जमीन में अच्छी उपज पैदा करते हैं। पंगवाली पैदा की फसलों को बेचते नहीं बल्कि उसे संग्रहित कर खाने-पीने में प्रयोग लाते हैं। गेहूं और मक्का यहां मुख्य फसले हैं, इसके साथ ही जौ, चीन, फुल्लन, कुथ, आलू, तम्बाकू, बे्र, सुइल और कोद्रा की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। खेती के मामले में पंगवाली गहरी सोच समझ रखते हैं। पंगवालियों के कृषि कार्यक्रम चरणबद्ध तरीके से चलते हैं। जाड़े के दिनों में पांगवाली गेहूं के साथ अन्य फसलों की भी पैदावार करते हैं। कृषि कार्यक्रमों में पंगवाली प्राकृतिक विधि का प्रयोग करते हैं, जैसे भूमि की उर्वरा क्षमता बढ़ाने के लिए यह पशुओं के लीद को प्रयोग में लाते हैं, इससे भूमि की उपज क्षमता भी बनी रहती है और पैदावार भी अच्छी रहती है। खेत जोतने से लेकर फसलों की कटाई तक सारी विधियां पंगवालियों की पारंपरिक है और आज भी उनकी कृषि पद्धति चलती आ रही है।

पंगवालियों में पशुपालन की तीन मुख्य वजहें है- पहला खेतों की जुताई और उनके लिए खाद के इंतजाम, दूसरा दूध और मांस के लिए और तीसरा ठंड से बचने के लिए ऊन की आवष्यकता होती है, जो पशुओं से ही प्राप्त होती है, याक और बैल के मेल से संकर प्रजाति के चूरू का उपयोग खेतों की जुताई और लीद के लिए किया जाता है, भेड़ और बकरी इनके लिए दूध, मांस और ऊन की कमी पूरी करते हैं। इसके अलावा पंगवालियों में मधुमक्खी पालन का खासा रिवाज है, इसके लिए पंगवाली घर के आस-पास की जगह चुनते हैं। मधुमक्खी को पालने और उनसे शहद प्राप्त करने की विधी पंगवालियों की अपनी परंपरा से मिली है, शहद से औषधि और सौंदर्य प्रसाधन की कई सामग्रियों का निर्माण होता है, पांगी घाटी कई बहुमूल्य औषधि वनों की खान है, और इन  औषधियों को पहचानने की क्षमता पंगवालियों की पैतृक है। तिला, धूप, कुथ, कारू से शिलाजीत तक मिलने वाली जड़ी-बूटियां भी पंगवालियों के आय का महत्वपूर्ण साधन हैं।

बुनकरी की कला पंगवालियों में पारंपरिक रूप् से घर-घर में होती है, स्त्री-पुरुष दोनों ही बुनकर की कला में माहिर होते हैं। लगभग सभी घरों में हथकरघा जरूर होता है। पंगवाली भेड़ों से ऊन उतारकर उन्हें कात कर धागा बनाते हैं, इसके बाद उन धागों की रंगाई-सुखाई करके करघे पर चढ़ाया जाता है। भेड़ों से ऊन निकालने और उनकी रंगाई-सुखाई गर्मियों के मौसम में ही कर लिया जाता है, क्योंकि जाड़े के दिनों ये कार्य संभव नहीं होते। जाड़े में तो सिर्फ इनकी बिनाई होती है क्योंकि जाड़े के दिनों में भारी बर्फबारी की वजह से पांगी घाटी जीवन बिल्कुल ठहर सा जाता है। पंगवाली अपने घरों में कैद हो जाते है, और समय का सदुपयोग करने के लिए हथकरघे पर बिनाई का काम करते हैं। इस दौरान पंगवाली कम्बल से लेकर पत्तूपट्टी और अन्य ऊनी कपड़े बनाते हैं।

चित्रकारी भी पंगवालियों की विषेश कला है। चित्रकारी की यह कला विषेश रूप से महिलाओं के हाथों का हुनर है, जाड़े के समय मनाया जाने वाले जुकरू पर्व तो खासकर चित्रकारी से ही संबंधित है, इस अवसर पर घरों की महिलाएं दीवार के एक कोने में रख कर उनकी पूजा करती हैं।

पांगी घाटी की भौगोलिक परिस्थितियां इतनी विकट है कि यहां बसने वाले पंगवाल लोग बाकी दुनिया से कटे रहने के लिए मजबूर है। लिहाजा अपने मन-बहलाव के लिए इन्होंने तरह-तरह के तरीके को इजाद किया है। मेला उनका ऐसा ही तरीका हे, जिसे वे जात्रा कहते हैं। पंगवालियों में एक लोकनृत्य भी है, जिसे वे जात्रा कहते है, परन्तु यह नाम भी जात्रा मेले के कारण पड़ा है। अधिकतर जात्रा मेले का आयोजन देवताओं के नाम पर किया जाता है। इनमें त्रिलोकनाथ, देवी, शक्ति, मलसाना, बलीन सिंहवान और नाग प्रमुख हैं।

नये जमाने में भी पंगवाली लोकगीतों की मिठास वैसी है, जैसे वर्षों पहले रही होगी। पांगी घाटी का चप्पा-चप्पा इन लोकगीतों से गूंजता रहता है। पंगवालियों को केवल मौका मिले और मनमोहक वादियों में गूंजने लगते हैं, लोकगीतों के सुर। पंगवाली इन लाकगीतों को समूह में भी गाते हैं और अकेले भी। त्योहारों और पर्वों पर तो ये लोकगीत वाद्ययंत्रों के साथ गाये जाते है, परन्तु रोजमर्रा की जिंदगी में पंगवाली बिना साज के इन लोकगीतों को गुनगुनाते हैं। मानव मन की शायद ही ऐसी कोई भावना हो, जिसे पंगवाली लोकगीतों में जगह न मिली हो। आम आदमी के सुख-दुख, प्यार-वियोग, आशा-निराशा सब कुछ इन लोकगीतों में मौजूद है।

जात्रा में लोगों का एक-दूसरे से मिलना-मिलाना, खाना-पीना, नाचना और झूमना तो होता ही है, साथ ही यह एकता और सौहार्द का भी प्रतीक माना जाता है। कुछ जात्राएं बड़े स्तरों पर आयोजित होती हैं, जैसे फूल जात्रा, उनोनी जात्रा, ईवान जात्रा और दैखन जात्रा। इनमें फूल जात्रा विशेष है क्योंकि इसमें फूल यानी आपसी मेल-मिलाप को बढ़ावा दिया जाता है। पंगवालियों में समय-समय पर पर्व और त्योहार भी मनाया जाता है और वह भी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार। पंगवाली जन्माष्टमी और शिरवाल यानी शिवरात्रि जैसे पर्व बड़े धूमधाम से मनाते हैं। पंगवालियों के पर्व त्योहार बहुत कुछ हिन्दुओं के जैसे ही हैं, परन्तु इसके साथ परंपरा और क्षेत्रीयता का अद्भुत संगम भी देखने को मिलता है।

पंगवालियों में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई कर्मकांड और रीतियां प्रचलित हैं। बच्चे के जन्म के पहले, तीसरे, पांचवें, सातवें और नौवे महीने में होने वाला नामकरण संस्कार हिन्दू मान्यताओं के अनुसार ही होता है, इसके अलावा मुंडन संस्कार को भी पंगवालियों में आवश्यक माना जाता है। मृत्यु संस्कार में भी पंगवाली हिन्दू विधि-विधान के कर्मकांडो को मानते दिखाई पड़ते हैं। मृत व्यक्ति को जमीन पर लिटा कर उसके मुंह में गंगाजल डालने की रीति हिन्दू सभ्यता की ही देन है।

जिस तरह से पंगवाली लोकगीत पंगी घाटी में गूंजते रहते ठीक वैसे ही इनके लोकनृत्य की थिरकन से सारी पांगी घाटी झूमने लगती है। पंगवाली लोकनृत्यों में विविधता तो नहीं है, परन्तु इनके नृत्यों में तरह-तरह के परिधानों और महिलाएं दोनों ही नृत्यों में भाग लेते हैं। पंगवालियों में एकल और सामूहिक दोनों प्रकार की नृत्य शैलियाँ प्रचलित हैं। अक्सर नृत्य का गायन भी होता है, और वाद्ययंत्रों से संगीत की झनकार भी गूंजती है। जात्रा और धूरे ही कुछ ऐसे ही लोकनृत्य है जो कि इन्सान को सम्मोहित कर लेते हैं।