23 मार्च 2012

देवनगर के वासी

प्रतिभा सक्सेना
वर्णो मे पूज्य दो परम- वर्ण - एक ' ॐ' - सृष्टि का आदि स्वर ,दूसरा 'श्री- जो सारे सौन्दर्य एवम् समृद्धि को धारण कर हमे धन्य कर रही है को सादर नमन करते हुए मै इस देवनगर की वर्ण-व्यवस्था और वर्ण-व्यवहार की वार्ता-कथा प्रारम्भ करती हूँ.

अपनी वर्णमाला, देवनागरी के अक्षरों की ! कभी ध्यान दिया है आपने ? भरे-पुरे परिवारों का एक पूरा संसार बसा है। स्त्री-पुरुष -बच्चे ,देशी-विदेशी सब मिल-जुल कर रहते हैं। सबकी अपनी आकृति ,अपनी प्रकृति है। आत्म- विस्तार करने की वृत्ति इनमे भी है - मात्राएँ लगाकर ये लोग बड़ी स्वतंत्रता से अपने हाथ पैर फैला लेते हैं, पर अपनी कालोनी में अपनी छतों के नीचे बड़ी सभ्यता से रहते हैं। पति-पत्नी ,बच्चे ,बूढ़े सब तरह के लोग है एक दूसरे से निबाह कर चलने मे विश्वास करते हैं। कभी-कभी अतिक्रमण होते हैं, तू-तू मै-मै भी होती है फिर समझौता कर सब अपने-अपने काम से लग जाते हैं।

सबसे ऊपर महत्वपूर्ण लोगों का निवास है - फिर पाँच पंक्तियों मे, पाँच-पाँच लोग बसे हैं। नीचे की पंक्ति में आठ लोग लाइन से रहते - है यद्यपि उनमे आपस में परस्पर विशेष संबंध नहीं हैं । और तीन लोग संकर है । वैसे तो कालोनी के सब लोग एक दूसरे से जुड़ने मे परहेज़ नहीं करते पर इन तीनो का रूप ही निराला है, इसलिए इन्हे सबसे पीछे डाल दिया गया है।

वी.आई.पी. लोगों की लाइन मे जो सोलह लोग थे अब उनमे से बारह ही दिखाई पड़ते हैं। चार लम्बी-लम्बी दाढ़ी-मूछोंवाले वृद्ध थे, उन्हे अधिकतर वृद्धाश्रम मे भेज दिया जाता है। कुछ का यदा-कदा आगमन होता रहता है । एक हैं ऋषि टाइप के। अक्सर आजाते हैं। पर उनके बड़े भाई और दो जटिल दाढ़ियोंवाले आति वृद्ध लोग कभी दिखाई नहीं पड़ते - लगता है स्वर्ग सिधार गये ! ऋषि अपना प्रतीक - चिह्न यहीं छोड़े रहते हैं जिससे संसार का कल्याण हो सके। वैसे भी ये साधक टाइप के लोग इन लोगों की दुनियाँ में दखल नहीं देते। हाँ, विशेष पर्वों -अनुष्ठानो और संस्कृतमूल के शब्दों का काम उनके बिना नहीं चलता । बाकी के बारह लोग आपस में रिश्तेदार हैं।

अ और आ सगे भाई हैं उनकी छतें पास-पास हैं। दोनों का स्वभाव थोड़ा अलग है। इ और ई उनकी पत्नियाँ हैं, दोनो बहुओं के एक-एक बच्चा है 'उ' और 'ऊ'। दोनो साथ खेलते हैं। शकलें तो देखिए ज़रा , लगता है छोटा बिना कपड़े पहने उठ कर चल दिया और बड़ा भी नंगा-पुतंगा उसके पीछे भागा ! नंग-धड़ंग एक दूसरेके पीछे भागे जा रहे हैं ऊं-ऊँ चिल्लाते ! बड़े रूने हैं। ज़मीन पर लुढ़कते-पुढ़कते रहते हैं ,उनकी मात्राएँ तो हमेशा ज़मीन पर पड़ी रहती हैं। उनकी माएँ छोटी-बड़ी इ ,दोनों देवरानी-जिठानी बहुत व्यस्त रहती हैं। बच्चों को सम्हालती हैं किसी तरह, पर ज़मीन पर घिसटती , लड़कों की मात्राएं सम्हालना उनके भी बस का नहीं है। लोक-भाषावाले इन्हे बड़ा प्यार करते हैं ।बुला-बुला कर पास बिठाए रखते है। उनका प्यारा उ हर जगह चलता है -खातु ,मातु ,सुनु ,जगु और तो और , ओ उन्हें नहीं रुचता। उसे हटाकर उ को चिपकाए रहते हैं जैसे मानो ,जानो ,चलो को -मनु,जनु,चलु बना कर। हमारी कामवाली र से तो बचती है पर उ उसका बड़ा लड़ैता है -खर्च को खच्चु कहती है। बड़ेवाले-ऊ- को भी प्यर करते हैं पर थोड़ा कम। जैसे ,मरयादू यादू भोर को भोरू आदि .। आजकल लोग बड़ा समझ कर ऊ को अधिक मान दे देते हैं - मधु को मधू !

ये जो ए,ऐ है. थोड़े असभ्य टाइप के हैं। जब ये अकेले होते हैं तो और अक्खड़ हो जाते हैं तू-तुकार पर उतर आते हैं। हाँ, जब किसी के साथ आते हैं तो समुचित सत्कार पा जाते हैं। थोड़े झक्की हैं ,पर कभी बड़े सभ्य बन जाते हैं। जब बुलाए जाते हैं तो शान से तुर्रा लगाकर पहुँचते हैं। तब आया -गया को भी आए -गए बना कर सम्मान देने का काम करते हैं । ऐ फिर भी थोड़ा गंभीर है,इसलिए उर्दू-दाँ लोग ऐ का ज्यादा सत्कार करते हैं ,ए को धीरे से चलता कर देते हैं देखिए- 'ऐ ,मुसाफिर' मे। ओ,औ समझदार हैं ,दूसरों की इज़्ज़त करना जानते हैं ।ऊपर के कोने वाले दो घरों के लोगों में जरा नहीं पटती। अ बिन्दी लगाकर मगन हो गया है । नक्शेबाज़ी पर उतरता है तो सिर पर चाँद -तारे लगा लेता है इसके नख़रे देखने लायक होते हैं। पीठ पर दो बिन्दियों का बोझ लादे अः से उसकी जरा नहीं पटती।अक्सर अकेला रह जाता है -अः । छोड़िये उससे कुछ कहने का मन नहीं करता ,भगवान बचाए। दोनो बहुएँ इ,ई जब उसे देखती हैं तो मुँह दबा कर हँसने लगती हैं ।
इसके आगे काफ़ी बड़ी बस्ती फैली है - बड़े कायदे से हरेक के वर्ग को ध्यान मे रखते हुए पँक्तियाँ बनाई गई हैं ।सुनियोजित ढंग से बसाई गई है ये देवनगरी । पाँच पंक्तियों के आगे आठ और तीन ,ग्यारह घर आखिरी छोर तक फैले हुए दिख रहे होंगे ! मिले जुले लोग है -बाद वाले तीन क्षत्रज्ञ जन्म से ही संकर हैं ,कोने मे बसा दिया गया है इन्हें । कुछ विदेशी भी घुस आए हैं उनको मकान नहीं एलाट किये गये । बड़ा इन्फ़ेक्शन फैलाये है कालोनी मे। अंग्रेज़ी शासन का फ़ायदा उठा कर एक तो वी.आई.पी. कालोनी में जा घुसा ,सिर पर टोप लगाए मुँह गोल-गोल करके बोलता है ऑफ़िस और कॉलेज में हमेशा दिखाई देगा ।

दूसरी लाइन के तीन लोगों को पहले छूत लगी ।उस समय की राज भाषा फारसी का असर इन पर आ गया । पहले क,ख,ग पर असर पड़ा - ग के गले मे बुरी तरह ख़राश होगई वह गरगराने ।लगा,ख खाँसी से ग्रस्त हो खखारने लगा , क को कै हो जाएगी ऐसा अंदर से जी होने लगा।इसी वर्ग का घ घुघ्घू की तरह बैठा देखता रहा ,ये नहीं हुआ कि डाक्टर को बुलाये ।परिणाम स्वरूप आगे की लाइनो के दो लोगों तक छूत फैली और च- वर्ग का ज और प- वर्ग का फ भी उसकी चपेट में आगए ।इन लोगों को चिह्नित करने के लिए एक हकीम ने उन्हें नुक्ते दे दिए , जब जरूरत होती है चिपका लेते हैं। कभी तो लगता है कि उन तीनो को नुक्ते लगाए देख इन दोनो को भी शौक चर्राने लगा था ।झ झगड़ालू प्रकृति का ठहरा , ज बेचारा उससे अपनी रक्षा के लिए भी नुक्ता लगा लेता है ।इधर फ़ की लेकप्रियता नुक्ते के कारण इतनी बढ़ गई कि फ को दुनिया ने नकार ही दिया ! लोगों को लगता है फ अशुद्ध है फ़ ,शुद्ध -जबकि बात इससे ठीक उलटी है ।बिन्दी लगाने के शौकीन ड और ढ भी निकले -पर उसे लगा कर ड लड़खड़ाने लगता है,जैसे पाँव के नीचे रोडा आ गया हो । और ढ तो लुढ़क ही जाता है ।और ण के बारे में तो कुछ पूछो मत,बडा नंगा आदमी है-एकदम बेशर्म है।श्लील -अश्लील का कोई विचार नहीं ।हो सकता है नागा साधु हो या दिगंबर जैन संप्रदाय का अनुयायी हो।कभी-कभी अपने रूप में कुछ परिवर्तन कर लेता है -र के साथ दो लंबवत् लकीरें जोड कर नई शक्ल अपना लेता है ।हो सकता है लोगों के कहे-सुने कुछ लिहाज आया हो , या सद्बुद्धि जाग गई हो ।

हाँ , उस विदेशी के आगे हमारा फ उपेक्षा का पात्र बन गया । मेरा भतीजा मेरे पति से कहता है 'फ़ूफ़ाजी' और अंग्रेज़ी मे भी एफ़ यू एफ़ ए लिखता है । मैने कहा,' फ़ूफ़ा नहीं फूफा होता है।' वह बोला ,'अशुद्ध बोल रही हैं बुआ जी ।' उसकी अम्माँ ने हिन्दी मे एम.ए. किया है और मुझसे काफ़ी बाद, उनकी नॉलेज तो मुझसे ज्यादा अप-टू- डेट होनी चाहिये! पर वह भी अपने लड़के को सही समझ रही थी। भाई भी पढ़ा-लिखा है ,मैने उसकी तरफ़ देखा , सोचा शर्म से सिर झुका लेगा । पर वह बेटे को गर्व से निहारे जा रहा था। मेरे कहने पर सिर झटक कर बोला ,'आजकल का ट्रेन्ड यही है।' नई पीढ़ी से भयभीत होगा बेचारा ! फ तो ऐसा त्याज्य हो गया है जैसे उसमे फफूँद लग गई हो ,वैसे अब लोग फ़फूँद कहते हैं। हमारी एक आदरणीया हैं,वे कालेज की सहायिका फूलमती को ' फ़ूलमती' कह कर आवाज़ लगाती हैं ,समझती हैं कि उनने उसे शुद्ध कर दिया , और हम कुछ लोग चुपके-चुपके हँसते कि उसे मूर्ख बना रही हैं ।

मैं लड़कियों को पढ़ाती हूँ ! तो इस सब पर सोच-विचार करने का खूब मौका मिलता है । समाज के सभी वर्गों तक मेरी पैठ हो जाती है क्योंकि लड़कियाँ हर वर्ग की पढ़ने आती हैं।परिवेश और परिवार का प्रभाव भाषा पर पड़े बिना नहीं रहता। लड़कियों के नामो से मै उनके बारे मे बहुत सी बातों का पता लगा लेती हूँ । हर नाम कुछ सोचने-समझने का मौका देता है।एक बार क्लास में उपस्थिति लेते समय नाम आया-' वीना ' मै सोचने लगी यह क्या, न तत्सम ,न तद्भव !'बीना' किसी तरह से शुद्द नहीं - वीणा होता या बीना होता ! कभी-कभी सोच मे लीन होकर मै मुँह से बोल जाती हूँ।
सोचा लड़की से पूछूँ ,' वीना कहाँ है ?' वह नहीं आई थी ।
एकदम मुँह से निकल गया ,' यह तो संकर है !'
उसकी पक्की सहेली रही होगी खड़ी हो गई,' दीदी ,वह ब्राह्मण क्षात्रा है।'
यह तो नया वर्ण निकल आया ,मुझे आश्चर्य हुआ - ब्राह्मण और क्षात्रा ?मैने कहा ,'क्षात्रा नहीं क्षत्रिया कहो।'
मैं विचार कर रही थी पिता ब्राह्मण और माता क्षत्रिय होंगे ,मैने पूछा ,'उसके माता -पिता की इन्टरकास्ट मैरिज है ?'।
लड़की तो आई नहीं थी पर उसके घर ख़बर पहुँच गई।
दूसरे दिन उसकी माता-श्री अवतरित हुईं।
'दीदी जी, काहे बदनाम कर रही हो हमे ?'
'मैं क्यों बदनाम करूँगी ?क्या बात हो गई ?'
वह तो लड़ने पर आमादा हो गई, ' कल आपने उसे संकर कहा ?भरी किलास के सामने कहा हम ठाकुरों की बेटी हैं भाग कर बाम्हन से सादी कर ली ?--जरूर किसी ने उड़ाया होगा ,दुस्मनन की कमी है यहाँ ?असली कनौजिया बाम्हनन की बेटी हैं हम !'
'लड़कियों ने कहा था ब्राह्मण क्षात्रा है ।'
उसकी पक्की सहेली फिर खड़ी हो गई ,'आपने संकर कहा तो हमने बताया था कि ब्राह्मण है ।और इस्टूडेन्ट है तो क्षात्रा तो कहेंगे ही ।'
बड़ा बबाल हो गया उस दिन ! मैंने अपनी बात समझाने की हर तरह कोशिश की लेकिन --छोड़ो अब कहने से क्या फ़ायदा ?
सही और शुद्ध के पीछे मेरी अक्सर ही लोगों से चख-चख हो जाती है।

दूसरे क्लास मे गई तो सोचा इन लोगों को बता दूँ क्षात्र और छात्र मे क्या अन्तर है।मैने मनोरंजक ढंग से शुरू करना चाहा,' क्यों भई, छ मे क्या गन्दगी लगी है ,जो ज़बान पर लाने मे परहेज़ है ?नहाई-धोई लड़कियों को छ बोलते ही छूत लग जाती है?' बोलते-बोलते मै सामने की ओर देख रही थी । एक लड़की को लगा मैं उससे कह रही हूँ। उसने पास बैठी वाली को कोहनी से ठहोका ,वह खड़ी होकर बोली ,' यह तो आज ही सिर धोकर आई है ।'
'अरे ,सिर धोकर क्यों आई है ?'
लड़कियाँ मुँह घुमाकर मुस्करा रही हैं ।
' मुँह घुमा लेंगी पर छ लहीं बोलेंगी,' हाँ,छूत लग जायगी न।'
' ऐसे मे उस तरफ़ बैठती हैं ' एक की आवाज़ आई ।
उसके इशारे की ओर मेरी निगाह गई -एक बेञ्च पर दो लड़कियाँ बैठी सकुचा रहीं थीं ।
वो छ बोल सकती होंगी मैने सोचा, पर उन्हे और द्विविधा में डालना ठीक नहीं समझा।
यह छ है भी थोड़ा छिछोर टाइप का ,हर जगह जा घुसता है और क्ष को निष्कासित कर देता है। स्थानीय लोगों की तो ज़ुबान पर चढ़ा रहता है -अच्छर ,सिच्छा, राच्छस, लच्छिमी हर जगह छछूँदर सी पूँछ लिये हाजिर !अक्सर अपने साथ च को भी चिपका लेता है।च की वैसे है भी चिपकने की आदत!कुछ जरूरत से ज्यादा समझवाले असली छ से भी परहेज़ करते हैं।हमारी एक मित्र हैं ,नाम नहीं बताऊँगी वे बुरा मान जायेंगी , इच्छा को इक्षा कहती हैं।

'ठ ' को तो देखो गठरी बाँधे है , बिल्कुल ठग जैसा।बड़ी जल्दी ठायँ-ठायँ पर उतर आता है।अपने पूर्ववर्ती को कुछ समझता ही नहीं। हरियाणा की औरतें 'उठा ले' को 'ठा ले' बोलती हैं और उनका ठ भी पहले से शुरू हो जाता है -उच्चारण निकलता है -'ठ्ठा ले !',इकट्ठा को कहेंगी 'कठ्ठा' । 'इ' की लोकप्रियता से ईर्ष्या करती होंगी ! सीधे-सादे वर्णों को तो कोई धरे नहीं गाँठता ! इन वर्णों में आपसी लाग- ड़ाँट चलती रहती है।य़ और ज मे खींच- तान मची रहती है,व और ब मे प्रतिद्वंदिता चलती है।बँगला भाषा के प्रभाव से ब बोलने का शौक बढ़ता जा रहा है-वासु को बासु विमला को बिमला वन को बन बोलना फ़ैशन में आगया है। ण और न आपस में उलझते हैं। उधर क और ख एक दूसरे की जगह हथियाने को तैयार रहते हैं । अक्सर ही ख की जगह क आ बैठता है -भूका, जिजमान बस्तु गनेस वगैरा-वगैरा।अब तो व की भ से भी बजने लगी है लोग अमिताभ को अमिताव कहने मे ज्यादा शान समझते हैं या फिर उनके मुँह इतने कोमल होते होंगे कि भ के उच्चारण से छाले पड़ने का डर होगा।

कुछ लोगों को स संदिग्ध लगता है श पर विश्वास है। पर अहिंसावादीलोग श की शक्ति से घबरा कर स को अपना लेते हैं। वे शंकर को संकर मानते है और शब्दों में 'सुसीला',' सुकुल', 'सायद' वग़ैरा का प्रयोग करते हैं।इधर हिंसा वृत्तिवाले संघर्ष को शंघर्ष कह कर समझते हैं कि उसकी भीषणता और बढ़ गई है।हमारी एक प्रभावशाली सीनियर, शासन को साशन कह कर परम संतुष्टि पाती हैं कि उनने शासन की सत्ता मे परिवर्तन कर दिया हैं।क और च वर्गों के कोनेवाले सदस्य ङ और ञ बुलाते ही मदद को दौड़ पड़ते थे । पर नकिया कर बोलने के कारण लोग उनसे बचने लगे ,उनकी जगह ऊपरवाले अं की बिन्दी छुटा कर लगा लेते हैं।

अरे हाँ,ऊपरवाले दंपतियों की बात तो भूल ही गई मै !ये लोग हैं-दो भाई अ,आ और उनकी पत्नियाँ इ,ई । अ और इ दोलो पति-पत्नी बड़े परोपकारी हैं - अ ने तो जीवन ही सेवा में लगा दिया है । बिना कहे ख़ुद मदद को पहुंच जाता है।उसके बगैर तो सारे वर्णों की बोलती बन्द रहती है। उसकी पत्नी 'इ' बहुत सुशील, सुसंस्कृत महिला हैं ।जहाँ बैठती हैं सज जाती हैं। लोगों को वे इतनी अच्छी लगती है कि शौकिया उन्हे बुला कर बिठाए रखते हैं - देखिये- रहिता ,कहिता ,कैशिल्या अहिल्या इनमे हर जगह छोटी बहू इ को बुला कर बैठा लिया गया है?आ और ई की भी राममिलाई जोड़ी है। दोनो तुनक-मिजाज़ !ई तो कुछ ज्यादा ही लम्बी है- शिरोभूषण पहनने की शौकीन! मिजाज़ ऐसा कि,हमेशा चिल्ला कर बोलती हैं । लोग इनसे बचने की कोशिश में रहते हैं।उनके पति 'आ' की भी चीख -पुकार मचाने की आदत है।दोनो हमेशा कुहराम मचाये रहते हैं !


वैसे ऊपर वाले सारे ही लोग हमेशा औरों की मदद के लिये दौड़ते रहते है।मजबूरी में खुद नहीं जा पाते तो अपनी मात्राओं को भेज देते है। बाहरवाले नये लोगों को मात्राओं में भ्रम हो जाता है । इस बारे मे मेरे पति ने अपनी एक अलग ही थ्योरी बनाई है - मात्रा छोटी होने पर, महत्व और आकार छोटा- जैसे चिटी ,चिंटी,च्यूँटी ,चींटी और चींटा इन पाँचों का अंतर देखिये ,चिटी -(छोटी इ है और बिन्दी भी नहीं है)सबसे छोटी, जोआँखो को बड़ी मुश्किल से दिखाई देती हैं। चिंटी -(छोटी इ होते हुए भी इसमे बिन्दी लगी है) जरा सी बड़ीवाली जिसमे दो बिन्दु स्पष्ट दिखते हैं ,तीसरी है च्यूँटी-जैसे किसी ने चिकोटी काट ली हो ,इसी से शब्द ' च्यूँट लेना ' बना है। चींटी-(बड़ी ई के साथ बिन्दी भी है) उससे भी बड़ी जो,हर जगह लाइन बनाये चलती दिखाई देती हैं,अन्त मे चींटा -खूब बड़ा ,ऊँचा-पूरा,उसे आप सब जानते हैं।। लघु और दीर्घ मात्राओं के प्रयोग से सब के रूप स्पष्ट हो गये। 

इसी प्रकार उ और ऊ मे भी उन्होने अंतर किया है । वे रामपुर ,रुद्रपुर मे तो उ लगाते है पर सिंगापुर,को सिंगापूर लिखते है, कहते हैं ,'इतना बड़ा नगर है ,छोटी मात्रा कैसे लगेगी?' ,ऐसे ही नागपूर,कानपूर !शादी के पहले मै शाजापुर मे थी,ये पते मे हमेशा शाजापूर लिखते थे। मैंने कहा इसमे छोटा उ है,कहने लगे,'अरे वाह ! तुम रहती हो ,उस जगह को छोटी कैसे मान लूँ?' मेरा भाई जब लिफ़ाफ़े पर शाजापूर लिखा देखता तो मेरी ओर देख कर खूब हँसता।मैं क्या करूँ ?कोई मै तो इन्हे ढँढने निकली नहीं थी ,तुम लोगों ने खोज निकाला ,अब तुम्हीं निपटो !

खोज की बात पर और बताऊँ -मेरी मित्र है विशाखा ,मेरे पति उसे कहते हैं-विषाख़ा और लिखते भी ऐसे ही हैं- ख के नीचे बाकायदा नुक्ता लगाकर । कहते हैं यही शुद्ध है(उर्दू पढ़े है,शुरू से)।मै तो चुप लगा जाती हूँ इस डर से कि कहीं ये ख़ा के ऊपर भी बिन्दी न लगा दें! ख़ैर , वे विभीषण को भिभीषण कहते और मानते है - वह राक्षसकुल का है व में नहीं भ में भयंकरता होती है। क्या किया जाय सबकी अपनी-अपनी मति!

अपने पड़ोसी के जसोदा को मैने यशोदा करवा दिया ।अब वे जादू को यादू और जंग को यंग कहने लगे, कहते हैं -अगर जशोदा मे ज का य हुआ है तो यहाँ भी होना चाहिये। ऊपर से सबसे कहते-फिरते हैं मैंने बताया है।इधर नीचे की लाइन वाला 'र' पक्का बहुरूपिया है-कभी तुर्रा लगा लेता है कभी ,कमर मे पटके-सा बँधा ,कभी पावों मे अटका ।अरे यह तो बूढ़े बाबा ऋ की भी नकल उतारता है फिर झट् से छोटी इ की ओट ले लेता है।

सबका अपना-अपना स्वभाव ! आपस में खींचातानी और अतिक्रमण होते हैं ,तू-तू मैं-मैं भी चलती है पर फिर सब शान्ति से रहने लगते है। समझ गए है न कि रहना यहीं है,इन्ही सब के साथ !

सज्जनों,वर्ण- व्यवस्था और व्यवहार की चर्चा कर इस समाज को गुमराह करने का मेरा इरादा कतई नहीं है ।मेरा विषय वर्णों से संबद्ध है इसलिये अपनी बात कहना सुझे लोकतंत्र सुलभ अधिकार लगा।आप को लगे इससे वर्णो में दुर्भावना या भेद-भाव उत्पन्न होगा तो कृपया ',सभी वर्ण एक समान हैं जिसके मन में जैसा आये बेधड़क लिखो ' का नारा दे दें !

17 मार्च 2012

वह जुलाई थी या अगस्त


वह जुलाई थी या अगस्त

ठीक ठीक याद नहीं हैं
बस इतना याद है
बारिश हो रही थी
और सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये
घुटनों तक डूबी वह भीग रही थी

सर पे धान के हरे-हरे बिचरों का बोझा,
पांक से लिथड़ी उसकी सुगरपंखी फ्रॉक,
नाक में तार की मुडी हुई नथुनी,
और मेह गिर रहा था हम दोनों के बीच

वह रोपनी का आखिरी दिन था
उसके बाद छोड़ आया सिंगाही
छोड़ आया अपना पानी
छोड़ आया अपनी बोली
छोड़ आया वहीं चौर के शीशम के पेड़ से टंगी अपनी कमीज़

कैलेंडर में साल बदले हैं स्कूल और कॉलेज बदले है
बदले है शहर फटे बनियानो की तरह
जीता रहा हूँ अपने ही देश में विस्थापितों की तरह
जिन्दगी में आई है लडकियां
जैसे आती हैं बरसाती नदियाँ
छप्पर तक बहा के ले गयी हैं
फिर भी बची रह गयी है माँ की दी हुई चूड़ियाँ

उलझा रहा हूँ किताबों के मकड़जाल में
रटता रहा हूँ गणित के दुर्लभ प्रमेओं को
सोचता रहा हूँ आदमी को गुलाम बनाने वाले अल्गोरिथमो के बारे में
टावर ऑफ़ हनोई के बारे में
यूलेरियन सर्किट के बारे में
हेमिल्टोनियन ग्राफ के बारे में
आज ऑफिस से जब घर लौटा हूँ
अकेले बंद कमरे का दरवाजा खोला हूँ
बिस्तर पे लेट के जैसे हीं आँखे बंद की है
तो ऐसा लग रहा है
सर पे धान के बिचरों का बोझा उठाये वह अब भी भीग रही है
और शीशम के पेड़ से टंगी वह कमीज़ अब भी वहीं हिल रही है



सुधांशु


*सिंगाही  - गाँव का नाम

12 मार्च 2012

रूबरू : सत्यजीत रे

अनुवाद एवं प्रस्तुति : संदीप मुद्गल

महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने फिल्में बनाने के अतिरिक्त खुद फिल्म निर्माण प्रक्रिया पर गहराई से विचार किया और लिखा भी है। मानवीय अंतर्संबंधों के मनोवैज्ञानिक पक्षों पर भी सत्यजीत रे की पकड़ अद्वितीय थी, इसके असंख्य प्रमाण उनकी फिल्मों और लेखन में स्पष्ट मिलते हैं। करीब चार दशक लंबे अपने फिल्म निर्माण करियर में उन्होंने अनेक साक्षात्कार भी दिए, जिनसे एक परिपक्व मानवीय सोच-समझ वाले व्यक्ति की झलक मिलती है। इतना ही नहीं, इन साक्षात्कारों का समग्र मूल्यांकन भी अपने आप में एक उच्चकोटि के रचनात्मक कार्य का रूप ले सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रश्नोत्तर के दौरान रे अपने रचनात्मक पहलुओं की परतों को स्वयं एक-एक कर सामने रखते हैं और अन्य रचनाकारों की रचनाधर्मिता का गहरा सामाजिक-राजनीतिक-कलात्मक और मानवीय मूल्यांकन भी कर दिखाते हैं। कहना न होगा कि सत्यजीत रे एक लेखक, फिल्मकार, संगीतकार, चित्रकार होने के साथ-साथ एक गहरे और सकारात्मक आलोचक भी थे, जिनकी भारतीय और विदेशी लेखक और फिल्मकारों के कार्यों पर असाधारण पकड़ थी। कई वर्ष पहले पश्चिमी सिने पत्रिका ‘सिनेस्ट’ को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने अपनी सिनेमाई रचनाधर्मिता से जुड़े अनेक सवालों के जवाब दिए थे।


उसी साक्षात्कार का हिन्दी अनुवाद यहां दिया जा रहा है, जिसमें रे ने बेहद साफगोई से सवालों के जवाब देने के साथ-साथ अपने कार्य से जुड़े कई मिथकों का भी खंडन किया है। प्रस्तुत साक्षात्कार में यदि सत्यजीत रे के रचनात्मक प्रेरक तत्वों की झलक मिलती है तो वहीं उनके राजनीतिक विचारों से भी पाठक रू-ब-रू होता है। एक ओर यदि वह अपनी सीमाओं पर बात करते हैं तो दूसरी ओर कला के क्षेत्र में देशकाल की सीमाएं पाटने की बात भी कहते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि यह साक्षात्कार सिने प्रेमियों को सिनेकला के बारे में सत्यजीत रे की अनुभवी दृष्टि से कुछ नए सूत्र उपलब्ध करा सकेगा।


सिनेस्ट:पाथेर पांचाली ने आपको कैसे बदला। क्या उसके जरिए आपने बंगाल को नए सिरे से समझा था ?

सत्यजीत रे: इसमें दोराय नहीं कि मैंने पाथेर पांचाली के निर्माण के दौरान ग्रामीण जीवन के कई रूप समझे थे। मैं शहर में पला-बढ़ा था, इसीलिए गांव के जीवन का अनुभव मुझे नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों में लोकेशन तलाशने के दौरान और फिर स्थान मिलने के बाद मैंने गांव में अधिक समय बिताया और उसे समझने लगा था। लोगों से बात करना, उनके हाव-भाव, स्थानादि की ध्वनियों के साथ होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया ने हर तरह से मदद की। ऐसा नहीं है कि गांव में पला-बढ़ा व्यक्ति ही ग्रामीण जीवन के बारे में फिल्म बना सकता है, एक बाहरी व्यक्ति की दृष्टि भी उसे गहराई से जानने में सफल हो सकती है।

सिनेस्ट: आपके कार्य पर अन्य प्रभाव किनका रहा ?

सत्यजीत रे: बिभूतिभूषण (अपु त्रयी और अशनि संकेत के लेखक) का मुझ पर बहुत गहरा असर रहा। दरअसल, मैं ग्रामीण जीवन को पाथेर पांचाली पढ़ने के बाद ही समझ सका था। मुझे उनके साथ, गांव और उनके गांव के प्रति व्यवहार के साथ एक तारतम्यता बनने का अहसास हुआ था, यही कारण है कि मैं सर्वप्रथम पाथेर पांचाली बनाना चाहता था। पुस्तक ने मुझ पर गहरा असर छोड़ा था।

इसके अलावा, मैं टैगोर के कार्यों से भी बहुत प्रेरित था जो आमतौर ग्रामीण परिवेश पर केंद्रित नहीं थे। यह भी है कि हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, हमारा सांस्कृतिक स्वरूप, पूर्व और पश्चिम के मिलन का अपना अलग असर रहा था। ऐसा किसी भी उस व्यक्ति के साथ हो सकता था जो भारत के किसी भी शहर में शिक्षा प्राप्त हो और क्लासिकी पश्चिमी साहित्यिक कार्य पढ़ता रहा हो। आखिरकार, पश्चिम के प्रति हमारी समझ किसी भी पश्चिमी व्यक्ति की हमारे देश के प्रति समझ से अधिक गहरी है। हमने पश्चिमी अध्ययन शैली को आत्मसात किया है। पश्चिमी संगीत, कला, साहित्य का भारत में गहरा असर रहा है।

दूसरी ओर, फिल्म मुख्यत एक ऐसा माध्यम जिसका विकास पश्चिम में हुआ है। एक कलात्मक विधा के तौर पर इसकी अवधारणा पश्चिमी है, भारतीय नहीं। इसलिए सिनेमाई माध्यम को समझने के लिए जरूरी है कि पश्चिम और वहां की कला विधाओं को समझा जाए। एक बंगाली लोक कलाकार, या एक आदिवासी कलाकार, सिनेमाई कला विधा को नहीं समझ सकते। इसलिए जिस व्यक्ति का संबंध पश्चिमी शिक्षा से रहा है, वह इस मामले में कुछ आगे जरूर है।

सिनेस्ट: भारतीय समीक्षकों का मत रहा है कि पाथेर पांचाली इस मायने में एक अतिवादी फिल्म रही है क्योंकि उसने भारतीय फिल्म के आर्थिक ढांचे को बदल के रख दिया था। उसने साबित कर दिया था कि बिना स्टूडियो आश्रय के भी फिल्में बनाई जा सकती हैं। क्या सचमुच फिल्म का इतना तात्कालिक प्रभाव रहा था ?

सत्यजीत रे: मुझे ऐसा नहीं लगता। हालांकि दर्शकों और समीक्षकों ने फिल्म को मील का पत्थर माना, लेकिन फिल्मकार उसकी शैली अपनाने को तैयार नहीं थे। ऐसा बहुत बाद में देखने को मिला था। गत कुछ वर्षों में पुणे फिल्म संस्थान से आने वाले फिल्मकारों ने कहा है कि वह पाथेर पांचाली से प्रेरित रहे हैं।

सिनेस्ट: क्या देश से बाहर आपकी फिल्मों को मिली सकारात्मक प्राप्ति से आपको हैरानी हुई थी ?

सत्यजित रे: मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी कोई भी फिल्म, विशेषकर पाथेर पांचाली, को देश या विदेशों में देखा भी जाएगा। सच तो यह है कि यदि आप वैश्विक मनोभावों, संबंधों, संवेदनाओं और चरित्रों को दिखाने में सफल रहते हैं तो आप कुछ हदबंदियों को तोड़कर अन्य लोगों तक पहुंचते हैं।

सिनेस्ट: आपकी सबसे कमजोर फिल्म कौन सी रही है ?

सत्यजित रे: सबसे कमजोर फिल्म ‘चिडि़याखाना’ को कहूंगा। पहली बात तो यह कि विषय मेरी पसंद का नहीं था और परिस्थितिवश मैं उसे बनाने को मजबूर हुआ था। मेरे कुछ सहयोगियों को वह फिल्म बनानी थी, परंतु अचानक उनमें आई आत्मविश्वास की कमी के कारण मुझे बीच में आना पड़ा था।

चिडि़याखाना एक रहस्यकथा (हू डन इट) है और ऐसी कथाओं पर अच्छी फिल्में नहीं बनतीं। मैं ऐसी रोमांचक (थ्रिलर) फिल्म पसंद करता हूं जिसमें आपको खलनायक के बारे में शुरू से अंत तक पता रहता है। हू डन इट कथाओं में नायक गुप्तचर को अंतिम दृश्य में यह बताते हुए हमेशा ऐसी औपचारिकता से गुजरना पड़ता है कि दरअसल क्या हुआ था, कैसे उसे मुजरिम तक पहुंचने के सुराग मिले। यह एक ऐसी कथावस्तु होती है जिसमें मेरी अधिक रुचि नहीं है।

सिनेस्ट: आप अपनी सबसे सफल फिल्म किसे कहेंगे ?

सत्यजित रे: एक फिल्म जिसे मैं पुनः उसी तरह से बनाना चाहूंगा, वह है ‘चारुलता’। ‘अरण्येर दिनरात्रि’ भी एक ऐसी फिल्म है जो मुझे बहुत प्रिय है। बच्चों के लिए बनाई गई फिल्मों में ‘जय बाबा फेलुनाथ’ है। यह बहुत सफल कृति है, इसमें विट है, कुशल फिल्मी दृष्टि है, एक चेहरा है जो संतुष्टि का अहसास देता है और कुछ अच्छा अभिनय भी इसमें शामिल है। मैं संगीतमय फिल्में भी बनाना पसंद करता हूं क्योंकि यह मुझे संगीत रचने का मौका देती हैं। यह आर्थिक दृष्टि से भी सफल रहती हैं, आपको एक खास किस्म का संतोष भी देती हैं। मुझे ‘कंचनजंघा’ भी पसंद है। इसलिए क्योंकि वह मेरा पहला मौलिक स्क्रीनप्ले था और यह एक निजी फिल्म भी है। यह अपने समय से दस-पंद्रह वर्ष आगे की फिल्म थी।

सिनेस्ट: इसकी कथावस्तु खंडित है।

सत्यजित रे: हां। हमारे दर्शकों को एक केंद्रीय चरित्र चाहिए होता है, या केंद्रीय चरित्रों का एक समूह जिसके साथ वह अपनी पहचान मिला सकें, साथ ही एक सीधी-सादी कथावस्तु भी। कंचनजंघा अनेक समूहों की कथा दिखाते हुए आगे-पीछे आती-जाती रहती है। आप समूह एक, दो, तीन, चार से मिलते हैं और फिर पुनः समूह एक, दो, तीन से रूबरू होते हैं। इसका ढांचा बहुत संगीतमय है, परंतु इसे पसंद नहीं किया गया था। इसे बहुत बचकाना प्रतिक्रियाएं मिली थीं। यहां तक कि इसकी समीक्षाएं भी हल्की रही थीं। परंतु अब मुड़कर देखते हुए यह मुझे एक बहुत रोचक फिल्म लगती है।

सिनेस्ट: आपकी फिल्मों में महिला पात्र मजबूत, दृढ़ निश्चयी, परिस्थितिनुसार ढलने वाली और पुरुषों की अपेक्षा अधिक लचीली दिखती है। क्या यह बंगाली सामाजिक इतिहास का ही झरोखा है ?

सत्यजीत रे: ऐसा लेखक की रचना का प्रतिबिंब होता है, लेखक द्वारा पुस्तक में दिए गए विचारों का आईना जिस पर फिल्म आधारित होती है। टैगोर और बंकिमचंद्र के साहित्य में अनेक मजबूत महिला पात्र हैं। परंतु इसमें महिलाओं से जुड़े मेरे अनुभव और व्यवहार की भी झलक रहती है।

सिनेस्ट: वह क्या है ?

सत्यजीत रे: यह कि वह बेशक शारीरिक दृष्टि से पुरुषों जितनी मजबूत न हों, परंतु प्रकृति ने महिलाओं को कुछ ऐसे गुण दिए हैं जो इस कमी की भरपाई करते हैं। वह अधिक ईमानदार, स्पष्ट, और अधिक चरित्रवान होती हैं। मैं हरेक महिला की बात नहीं कर रहा हूं, परंतु केवल उनकी जो मुझे रोचक लगती हैं। जिस महिला को मैं अपनी फिल्मों में दिखाता हूं वह परिस्थितियों से जूझने में पुरुषों से अधिक क्षमतावान होती है।

सिनेस्ट: क्या चारुलता ऐसी ही आदर्श रे महिला है ?

सत्यजीत रे: हां।

सिनेस्ट: ‘जलसाघर’ से शुरू करके ‘शतरंज के खिलाड़ी’ तक आप नई और पुरानी संस्कृतियों के बीच आवागमन जारी रखते हैं, यानी पारंपरिक और आधुनिक के बीच। कई बार मुझे लगता है कि आपका पुरानी संस्कृति और परंपरा की ओर अधिक झुकाव है और नई के प्रति एक तरह का संदेह।

सत्यजीत रे: शतरंज के खिलाड़ी में क्या नया हो रहा है उसके प्रति मैं किसी शक में नहीं हूं। उसमें बहुत स्पष्टता से दिखाया गया है कि सामंती समाज अपने आस-पास की घटनाओं से बिल्कुल कटा हुआ है। हालांकि इन चरित्रों के प्रति मुझे संवेदना है, परंतु यह साफ है कि यह लोग किसी काम के नहीं। परंतु फिर भी मुझे उस जनजीवन और उसके नुमाइंदों को दर्शाने में अधिक रुचि है। आपको चेखव  के ‘चेरी का बगीचा’ में भी यही हालात दिखेंगे और वह मुझे बहुत पसंद है।

बेशक आप सामंतवाद के मृत अश्व को पीटते हुए गालियां दे सकते हैं, परंतु फिल्म के उन चरित्रों के प्रति कुछ भावनाएं जरूर रखते हैं। वह कमजोर हैं, उन डायनासोरों की तरह जिन्हें अंदाजा नहीं कि वह समाप्त होते जा रहे हैं। इस विडंबना में भी कुछ विशेषताएं हैं जो मुझे रोचक लगती हैं।

सिनेस्ट: अधिकांश पश्चिमी समीक्षकों का मानना है कि आपकी छवियों में भारत अंधकारमय और नैराश्यपूर्ण है।

सत्यजीत रे: जन अरण्य एकमात्र फिल्म है जिसके बारे में यह कहा जा सकता है।

सिनेस्ट: परंतु कुछ अन्य को अरण्येर दिन रात्रि भी निराश फिल्म लगी थी।

सत्यजीत रे: मैं उसे निराशा दर्शाने वाली फिल्म नहीं कहूंगा। उसमें कुछ अप्रिय सत्य जरूर चित्रित किए गए हैं, परंतु वह कहानी का अंश हैं, ऐसा सभी फिल्मों के बारे में कहा जा सकता है। आप किसी पश्चिमी फिल्म को पश्चिमी मूल्यों के विरुद्ध निराशा दर्शाने वाली भी कह सकते हैं। आप हमेशा खुशमिजाज फिल्में नहीं बना सकते।

यदि आप ऐसी समस्याओं के बारे में फिल्म बना रहे हैं जिनका समाधान आपके पास नहीं, तो उसमें निराशा की झलक जरूर आएगी। महानगर फिल्म में पति और पत्नी दोनों की नौकरी छूट जाती है। रोजगार है भी नहीं। वह एक दूसरे से दूर होने लगते हैं, दोनों के बीच गलतफहमी जन्म लेती हैं, और अंततः दोनों निकट आते हैं। फिर भी उनके पास नौकरियां नहीं हैं, और स्पष्ट है कि कुछ समय तक ऐसा ही चलेगा, ऐसे में कहीं निराशा की झलक नहीं दिखती।

जन अरण्य मेरी बनाई एकमात्र फिल्म है जिसे कठोर कहा जा सकता है। इसमें दोराय नहीं है। मुझे चारों ओर भयावह भ्रष्टाचार नजर आ रहा था। कलकत्ता में लोग सब जगह उसी पर बात करते थे। सब जानते थे कि मार्ग और भूमिगत रेलमार्ग निर्माण के लिए लाया जाने वाला सीमेंट ठेकेदारों की जेबों में जा रहा था और वह उससे अपने घर बना रहे थे। जन अरण्य ऐसे ही भ्रष्टाचार के बारे में फिल्म है और जिसका समाधान मेरी समझ से बाहर था।

सिनेस्ट: आपने अक्सर कहा है कि आपकी राय में एक कलाकार का समाधान की तलाश या सही और गलत का निर्णय सुनाना उचित, महत्वपूर्ण या जरूरी नहीं होता। आपने स्वयं कोई बड़े बयान नहीं दिए।

सत्यजीत रे: मैंने मृणाल सेन और अन्य किसी की भी तरह स्पष्ट राजनीतिक बयान दिए हैं। जन अरण्य में मैंने एक ऐसी बातचीत को रखा है जिसमें एक कांग्रेसी भविष्य की बात करता है। वह बेकार और झूठी बातें करता है, परंतु उसकी उपस्थिति अपने आप में महत्वपूर्ण है। यदि कोई अन्य निर्देशक वह फिल्म बनाता, तो उस दृश्य को अनुमति नहीं मिलती। परंतु एक निर्देशक क्या कहना चाहता है, इस पर सचमुच में कुछ पाबंदियां होती हैं। आप जानते हैं कि कुछ बयान और चरित्र चित्रणों को सेंसर कभी इजाजत नहीं देता, तो उन्हें क्यों बनाना ?

सिनेस्ट: देश के राजनीतिक हालात को देखते हुए, आपकी राय में एक फिल्मकार की भूमिका निष्क्रिय, दर्शक या एक्टिविस्ट में से क्या होनी चाहिए ?

सत्यजीत रे: क्या आपने ‘हीरक राजार देशे’ देखी है ? उसमें एक दृश्य है जिसमें गरीब लोगों को स्थान खाली कराने के लिए खदेड़ा जाता है। यह उस सत्य का सीधा प्रतिबिंब है जो दिल्ली और अन्य शहरों में इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान हुआ था। हीरक राजार देशे जैसी फंतासी रचना में आप सीधे-सीधे अपनी बात कह सकते हैं, परंतु यदि आप आधुनिक चरित्रों को उकेर रहे हों तो आपको सेंसर के कारण एक सीमा तक ही स्पष्ट बात कह सकते हैं। आप सत्तासीन दल पर सीधे उंगली नहीं उठा सकते। ‘द स्टोरी आॅफ ए चेयर’ नामक फिल्म में ऐसा प्रयास किया गया था और पूरी फिल्म नष्ट कर दी गई। तो आप क्या करेंगे ? आपको समस्याओं का पता है और आप उनसे जूझते भी हैं, परंतु आपको सीमाओं का अंदाजा भी है, वह रुकावटें जिनके आगे आप नहीं जा सकते।

सिनेस्ट: कुछ लोग इसे एक फिल्मकार की सामजिक भूमिका का परित्याग भी कहते हैं। बंगाल के ही कई समीक्षक मानते हैं कि आप राजनीतिक विचारों से दूरी रखते हैं, वह मानते हैं कि आप कहीं आगे जा सकते हैं, लेकिन आपने अपनी सीमाओं को खंगाला नहीं है।

सत्यजीत रे: नहीं, मुझे नहीं लगता कि मैं कहीं आगे जा सकता हूं। सत्ता जैसे लक्ष्यों पर निशाना साधना बहुत आसान होता है। यानी आप ऐसे लोगों पर निशाना साध रहे हैं जिन्हें इसकी परवाह नहीं है। सरकार पर आपकी बात का कोई असर नहीं होगा। तो क्या मतलब है इस काम का ? फिल्में समाज नहीं बदल सकतीं। उनके जरिए कभी ऐसा नहीं हुआ। मुझे ऐसी फिल्म के बारे में बताइए जो समाज में किसी तरह के परिवर्तन का कारण बनी हो।

सिनेस्ट: लेनी राइफेन्स्टह्ाल जैसे फिल्मकारों के बारे में क्या कहेंगे जिसने नाजियों के आर्य मिथक को सामने रखा था, या सर्जेई आइजेंस्टीन जिन्होंने फिल्म को क्रांति के औजार के रूप में इस्तेमाल किया था ?

सत्यजीत रे: आइजेंस्टीन ने ऐसी क्रांति को सहयोग दिया था जो पहले से ही जारी थी। एक क्रांतिकाल के मध्य एक फिल्मकार की भूमिका सकारात्मक हो जाती है, वह क्रांति में कुछ सहयोग कर सकता है। परंतु यदि क्रांति की सुगबुगाहट नहीं है तो आप कुछ नहीं कर सकते।

राइफेन्स्टह्ाल एक मिथक गढ़ने में मददगार थे, नाजी विचारधारा की, और नाजी उस समय बहुत मजबूत थे। उस शुरुआती फासीवादी समय में बौद्धिक वर्ग खुद उलझन में था। टैगोर को यह समझाने का प्रयास किया गया था कि मुसोलिनी कुछ बेहतर करने जा रहा है, उसकी भूमिका सकारात्मक है, परंतु जब तक कि रोम्या रोलां ने उन्हें नहीं बताया था, तब तक वह फासीवादी असर की गहराई नहीं समझ सके थे।

सिनेस्ट: एक फिल्मकार के तौर पर आप अपनी क्या सामाजिक भूमिका देखते हैं ?

सत्यजीत रे: आप ‘प्रतिद्वंद्वी’ में मेरा विचार देख सकते हैं जो दो भाइयों की कहानी है। छोटा भाई नक्सलवादी है। इसमें शक नहीं कि बड़ा भाई छोटे की हिम्मत और विचारों का आदर करता है। फिल्म इस मुद्दे पर स्पष्ट है। परंतु एक फिल्मकार के तौर पर मुझे बड़े भाई में अधिक रुचि है क्योंकि वह अस्थिर चरित्र है। एक मनोवैज्ञानिक बिंदु, एक मनुष्य जो पसोपेश में है, वह मेरी राय में अधिक रुचिकर चरित्र है। छोटा भाई पहले ही अपने आपको एक मुद्दे से जोड़ चुका है। इससे वह एक पूर्णता को प्राप्त चरित्र है और लगभग गैरजरूरी हो गया है। नक्सलवादी मुहिम व्यापक है और एक व्यक्ति के तौर पर उसका अस्तित्व मुहिम में मिल चुका है।

सिनेस्ट: परंतु क्या आप वैचारिक और भावनात्मक व्यवहार के बीच ऐसा अंतर कर सकते हैं ? क्या एक वैचारिक व्यक्ति एक बौद्धिक नहीं होता ? ऐसा द्विभाजन आप किस तरह से करेंगे ?

सत्यजीत रे: इसे न करने की मुझे कोई वजह नजर नहीं आती। एक मुहिम से जुड़ा व्यक्ति उस मुहिम के शीर्षस्थों के निर्देशों पर आश्रित होता है। यदि आप उन शीर्षस्थ चरित्रों को दर्शाएंगे तो वह अधिक रोचक रहेगा। ऐसे में आप नक्सलवादी फिल्म को आइजेंस्टीन की क्रांतिकारी क्रिया स्वरूप दे सकेंगे। परंतु भारत में मौजूदा हालात में आप ऐसा नहीं कर सकते।

सिनेस्ट: ऐसा अनुभव करने वाला मैं एकमात्र व्यक्ति नहीं जो मानता है कि आपका जोर मनोभावों पर अधिक रहता है। राॅबिन वुड ने भी लिखा है कि आप विचारों से अधिक मनोभावों के अनुभवों को उकेरने में अधिक रुचि लेते हैं।

सत्यजीत रे: यह ठीक नहीं है। मेरी फिल्मों में एक मजबूत नैतिक व्यवहार की झलक स्पष्ट दिखनी चाहिए।

सिनेस्ट: क्या यह आपकी धार्मिक पृष्ठभूमि से संबद्ध है जो ब्राह्मो समाज से जुड़ी है ?

सत्यजीत रे: मुझे नहीं लगता। मुझे यह भी नहीं पता कि ब्राह्मो का मतलब क्या है। मैंने चैदह या पंद्रह वर्ष की आयु में ब्राह्मो समाज में जाना भी बंद कर दिया था। मैं यों भी धर्म के संगठित रूप में विश्वास नहीं रखता। धर्म निजी मुद्दा है। मेरे विचार में मेरी फिल्मों में मौजूद नैतिक तर्क उनमें दिखने वाले किसी भी राजनीतिक विचार से अधिक रोचक है।

सिनेस्ट: क्या यह नैतिक विचार बहुत साधारण नहीं है ? ‘पीकू’ में आप बताते हैं कि स्वच्छंदता अनेक समस्याओं को जन्म दे सकती है, बदलते सामाजिक और यौन मूल्यों ने सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को विछिन्न किया है।

सत्यजीत रे : पीकू एक बहुत जटिल फिल्म है। यह एक कविताई बयान है जिसे किसी ठोस आधार तक सीमित नहीं किया जा सकता। फिल्म का एक संदेश है कि यदि कोई महिला विवाहेत्तर संबंध रखती है तो उसका अपने बच्चों के लिए कोमल भावनाएं रखना उचित नहीं, जैसा कि फिल्म में उसके बेटे के लिए। यह दोनों भावनाएं एकसाथ नहीं चल सकतीं। उसे कठोर होना ही होगा। संभवतः यह महिला उतनी कठोर हृदय नहीं है। वह एक पूर्ण बंगाली महिला है। एक यूरोपियन महिला ऐसे मामले में उसके जैसा व्यवहार नहीं करेगी।

सिनेस्ट: चारुलता विवाहेत्तर संबंधों की समस्या को कैसे सुलझाती है ? हमें दिखता है िकवह वापस लौटती है। क्या वह पति से संबंध से विमुख हो चुकी थी या दोनों के बीच फंसी थी...

सत्यजीत रे : वह संबंध से विमुख थी परंतु पसोपेश में भी थी क्योंकि उसका पति अच्छा इनसान था। चारुलता का नजरिया संभवतः सांत्वनापूर्ण था और वह हालात से समझौता करने का प्रयास कर रही थी। उसका पति भी देर से ही सही पर समझता है कि जो हुआ उसमें उसका भी दोष है। इसीलिए फिल्म के अंत में दिखाया जाता है िकवह साथ आएंगे, परंतु समझौता होने में अभी समय लगेगा।

सिनेस्ट: आपके चरित्रों में स्वयं आपकी अपनी कितनी संवेदना निहित होती है ? अशनि संकेत के बारे में पाॅलीन केल ने कहा था, ‘रे ने अपना कुछ अंश गंगाचरण में उडे़ला है, कुछ अपना अपराध बोध, कमजोरी, प्रतिबद्धता।’ क्या यह सही है ?


सत्यजीत रे : समीक्षक यह भूल जाते हैं कि मैं फिल्म किसी के कार्य पर बना रहा हूं जो अन्य रूप में उपलब्ध है। अशनि संकेत में गंगाचरण बिभूतिभूषण के विचारों के निकट है। असली प्रश्न है कि क्या लेखक में अपना कुछ अपराधबोध और कमजोरी है। मैं कथा का रचयिता नहीं हूं। मुझे इसके बीच क्यों घसीटा जाए ?

यह भी सच है कि मैंने उस चरित्र को कुछ ऐसे मूर्त रूप देने का प्रयास किया है जिसमें उसका अस्तित्व और समझ-बूझ उभर कर आती है। मैं गंगाचरण को, उसकी आकांक्षाओं को, उसके व्यवहार, उसकी प्रतिक्रियाओं को समझता हूं। मेरे लिए वह जीवंत, पूर्णतया ईमानदार है, और अंत में उसमें होने वाला परिवर्तन बहुत उद्वेलित करने वाला है, परंतु वह मेरा प्रतिबिंब नहीं है।

सिनेस्ट: क्या आपका मतलब है कि जो लोग उन किताबों को नहीं पढ़ते जिन पर आपकी फिल्में आधारित होती हैं, उन्हें आपकी फिल्मों को समझने या व्याख्या करने में कठिनाई होगी ?

सत्यजीत रे: हां, यदि वह मूल लेखक की ओर बिल्कुल नहीं देखते तो। वह कथावस्तु को एक संपूर्ण कृति के रूप में देखते हैं, फिल्मकार के नजरिए से शुरू से अंत तक, और आमतौर पर यह सही नहीं होता। मैं किसी भी कहानी या उपन्यास का चुनाव ऐसे कुछ तत्वों के आधार पर करता हूं जो मुझे अपील करते हैं। स्क्रीनप्ले लिखते समय थीम में बेशक कुछ परिवर्तन हो, परंतु मूल तत्व वही रहता है। अक्सर स्क्रीनप्ले मूल कथा के आलोचना स्वरूप आकार लेता है। इसीलिए किसी कथा को कई बार पढ़ने के बाद आपको अहसास होता है कि कोई चरित्र विशेष उस तरह का व्यवहार नहीं करेगा जैसा कि लेखक ने चित्रित किया है, इसीलिए कुछ परिवर्तन किए जाते हैं। कहानी पढ़ने और समझने के बाद, मैं उसे छोड़कर आरंभ से शुरू करता हूं। अंत में, यदि मुझे लगता है कि कुछ परिवर्तन जायज हैं तो मैं उन्हें स्थान देता हूं और मूल रचना को भूल जाता हूं।

सिनेस्ट: कुछ समीक्षकों का मानना है कि आप गरीबी का रूमानीकरण करते हैं, और यह भी कि आपकी फिल्मों में गरीबी और करुणा कभी बदसूरत नजर नहीं आती।

सत्यजीत रे: मेरी राय में पाथेर पांचाली में दर्शाई गई गरीबी अपने आप में बहुत क्रूर है। चरित्रों का बर्ताव, उस महिला का वृद्धा से व्यवहार, बेहद बर्बर है। मुझे नहीं लगता कि किसी ने भी परिवार के वृद्धों के बारे में ऐसी बर्बरता दर्शाई है। अशनि संकेत का परिवेश बहुत सुंदर दिखता है और यह एक बिंदु है जो पाउलिन केल उठाती हैं, कि बबीता एक गुडि़या सरीखी दिखती है। दरअसल, उन्हें पता नहीं कि गांव की कुछ ब्राह्मण युवतियां सचमुच बहुत सुंदर थीं।

सिनेस्ट: क्या अशनि संकेत में पढ़ने वाले अकाल के संबंध में यह बिंदु भी नहीं दिखता कि उसमें चटखी धरती या भूखे चेहरे नजर नहीं आते ?

सत्यजीत रे: हां, अकाल के समय ऐसा ही होता है। केवल शहरों में आने के बाद ही यह भी स्पष्ट हुआ था कि अच्छी फसल होने के बाद भी लोग भूख से मर सकते हैं। यही उस अकाल विशेष का बिंदु भी था। फिल्म को रंगीन छवि देने का मेरा मंतव्य भी सीधे लेखक के वर्णन से जुड़ा है - कि प्रकृति अपने में बहुत सुंदर है, भौतिक तौर पर हर वस्तु सुंदर नजर आती है, और, फिर भी, लोग भूख से मर रहे हैं।

सिनेस्ट: आप, फैल्लिनी, कुरोसावा और बर्गमेन ने लगभग एक ही समय फिल्में बनानी शुरू की थीं। कई समीक्षक मानते हैं कि आप पीछे रह गए हैं, यह भी कि आपने फैल्लिनी या बर्गमैन की तरह सौंदर्यबोधात्मक और कथावस्तु से जुड़े जोखिम नहीं लिए हैं। तीस वर्ष के फिल्म निर्माण जीवन के बाद आप अन्य की तुलना में अपने करियर को कहां पाते हैं ?

सत्यजीत रे : मैं सोचता हूं कि मैंने बहुत शुरुआत में ही मैच्योरिटी प्राप्त कर ली थी। एक महीन ढांचे की कथावस्तु के आधार पर अधिकाधिक घनत्व प्राप्त करना ही शुरुआत से मेरी मुख्य चिंता रही है। फिल्म बनाते समय मैं पश्चिमी दर्शकों को दिमाग में नहीं रखता। मैं बंगाल के दर्शकों के बारे में सोचता हूं। उन्हें साथ लेकर चलना ही मेरा प्रयास होता है और इसमें मैं सफल भी रहा हूं। यह जरूर है कि शुरुआत में यह दर्शक बहुत बेतरतीब थे। वह बेमतलब या बेढब बंगाली फिल्मों के जाल में फंसे थे। इसलिए आपको उनके साथ धीमी शुरुआत करनी होती है। कई बार ऐसा होता है कि आप कंचनजंघा या अरण्येर दिनरात्रि जैसी ऊंची छलांग लगाकर उन्हें खो देते हैं।

दर्शकों से जुड़े ऐसे जोखिम बर्गमैन या फैल्लिनी ने नहीं लिए हैं। बर्गमैन सरल हैं, हालांकि वह कभी-कभार बेहद संजीदा और सख्त भी हो जाते हैं और उन्हें कुछ बेहतरीन फोटोग्राफी का सहयोग भी मिलता है। दूसरी ओर लगता है कि फैल्लिनी एक ही फिल्म बार-बार बना रहे हैं। उनकी फिल्मों में एक विशिष्ट किस्म की भव्यता दिखती है, वह भी तब जबकि वह कहानी में उतनी रुचि नहीं दिखाते, और दर्शक उसी भव्यता को देखने जाते हैं।

मैं वैसा कार्य नहीं कर सकता जो बर्गमैन या फैल्लिनी करते हैं। मेरे पास उनके जैसे दर्शक नहीं हैं और उन संदर्भों में मैं काम भी नहीं करता। मुझे ऐसे दर्शक मिलते हैं जिन्हें व्यर्थ कार्य देखने को मिलते रहे हैं। मैंने तीस वर्षों तक भारतीय दर्शकों के लिए काम किया है और इस समय में सिनेमा के प्रति आम समझ नहीं बदली है। कम से कम बंगाल में तो नहीं। आपको ऐसे निर्देशक दिखेंगे जो बेहद मूर्ख, पिछड़े हुए और इतने बेकार है कि यह सोचना तक असहनीय होता है कि उनकी फिल्मों के साथ मेरी फिल्में दिखाई जाती हैं। परिस्थितियों की मजबूरी के कारण मुझे अपनी कहानियां सरल रखनी पड़ती हैं। हालांकि मैं इतना जरूर कर सकता हूं कि अपनी फिल्मों को कुछ नया अर्थ, मनोवैज्ञानिक सुर और आवरण दे सकूं ताकि उसका तैयार स्वरूप अनेक लोगों के लिए अलग-अलग अर्थ रख सके।

*इस लेख के प्रकाशन के लिए  अनुवादक की सहमति आवश्यक है.

5 मार्च 2012

कोसल में विचारों की कमी है

महाराज बधाई हो !महाराज की जय हो |
युद्ध नहीं हुआ-
लौट गए शत्रु |

वैसे भी हमारी तैयारी पूरी थी !
चार अछौहिणी थी सेनाएँ,
दस सहस्त्र अश्व,
लगभग इतने ही हाथी|

कोई कसर न थी !
युद्ध होता भी तो
नतीजा यही होता |

न उनके पास अस्त्र थे
न अश्व,
न हाथी,
युद्ध हो भी कैसे सकता था ?
निहत्थे थे वे |

उनमे से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है !

जो भी हो,
जय यह आपकी है !
बधाई हो !
राजसूय पूरा हुआ,
आप चक्रवर्ती हुए-

वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं
जैसे कि यह-
कोसल अधिक दिन टिक नहीं सकता,
कोसल में विचारों की कमी है!

-श्रीकान्त वर्मा

1 मार्च 2012

लालबत्ती के गिर्द मिलते हैं

लालबत्ती के गिर्द मिलते हैं
जलती बुझती हुई आँखों वाले
उधरे-चिथड़ो में सजीले बच्चे


थमती कारों पे भाग के झट से
दोनों होठों को खींच कानो तक
कांच पर जिस्म छोड़ देते हैं
तंग जिस्मों में ये ढीले बच्चे


रूखे हांथों में उठाये कितने
मैगज़ीनो के मुलायम जत्थे
नामचीं नोवेलों की सस्ती नकलें
वक्त काटने की सौ तरकीबें
रोज़मर्रा के काम की चीजें
नन्ही जेबों से तिजारत करते
कलसती धूप में पीले बच्चे

कभी बसों में जो चढ़ आते हैं
उँगलियों में फंसाए पिठू
उलझी तर्जों को बड़बड़ाते हुए
जी बड़ा बेसुरा सा करते हैं
जब भी गाते हैं सुरीले बच्चे


हफ्ते - दर- हफ्ते हर शनीचर को
तेल के कुन्ड लिए हाथों में
डर दिखाते सइययारों का
शक्ल पर पोते दुआ
लाल काले गोरे नीले बच्चे

किसने लाकर के यहाँ छोड़ दिया
गोया लिख कर के कोई एक मिसरा
किसी शायर ने कर दिया खारिज
ला-मुक्कमल,
अपने माअ'नी को तरसते हुए
लाल बत्ती के गिर्द मिलते हैं
भीगती उम्र में गीले बच्चे

- विनीत राजा
फोटोग्राफ हिन्दू से